Analysis: यूपी में दूसरे चरण की वोटिंग में BJP का पलड़ा भारी, कांग्रेस नहीं बन पा रही है चुनौती

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए दूसरे चरण का मतदान 18 अप्रैल को होना है. इस चरण में उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर भी वोटिंग होनी है. क्या है इन आठ सीटों का हाल, जानिए यहां...

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 17, 2019, 10:53 AM IST
Analysis: यूपी में दूसरे चरण की वोटिंग में BJP का पलड़ा भारी, कांग्रेस नहीं बन पा रही है चुनौती
प्रतीकात्मक
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 17, 2019, 10:53 AM IST
उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण में आठ सीटों पर होने वाले चुनाव में मथुरा और आगरा पर सबकी नजर है. मथुरा में ग्लैमर का तड़का लगा है तो फतेहपुर सीकरी राज बब्बर के नाते चर्चा में है. इन आठ लोकसभा सीटों पर मुकाबला रोचक होता जा रहा है. आठ में से चार सीटें आरक्षित हैं और दो सीटें हाई प्रोफाइल हो गई हैं. इन सीटों के राजनीतिक समीरकण की बात करें तो फतेहपुर सीकरी, नगीना और हाथरस को छोड़ बाकी सीटों पर मुकाबला बीजेपी बनाम गठबंधन ही दिख रहा है. आरक्षित सीटों में नगीना को छोड़कर कांग्रेस चाहकर भी ऐसे उम्मीदवार नहीं उतार पाई, जो मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकें या गठबंधन को फायदा पहुंचा सकें.

मथुरा


मथुरा की लड़ाई अब जाट बनाम जाट होती जा रही है. गठबंधन की ओर से आरएलडी उम्मीदवार नरेंद्र सिंह, पार्टी अध्यक्ष अजीत सिंह के नाम पर जाट वोट मांग रहे हैं. वहीं बीजेपी उम्मीदवार हेमा मालिनी की ओर से उनके पति धर्मेंद्र जाट वोटों पर दावा ठोक रहे हैं. फिलहाल इस हाई प्रोफाइल सीट पर भी मुकाबला बीजेपी बनाम गठबंधन ही दिख रहा है. इस सीट पर मुस्लिम और जाट अगर मिल जाएं तो किसी को भी पटखनी दे सकते हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में आरएलडी के जयंत चौधरी ने इसी भरोसे अपनी सीट नहीं बदली, लेकिन तब मुस्लिम और जाट दोनों बंट गए थे. ऐसे में एसपी-बीएसपी के साथ गठबंधन के सहारे आरएलडी 2019 में इस सीट पर जाट-मुस्लिम गठजोड़ के दम पर हेमा मालिनी को पटखनी देना चाहती है.

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कांग्रेस उम्मीदवार महेंद्र पाठक मुकाबले में आने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन अभी तक वे उसे त्रिकोणीय बनाते नहीं दिख रहे हैं. लेकिन पाठक यदि ब्राह्मण वोट काटते हैं तो फायदा आरएलडी उम्मीदवार को होगा. बीजेपी को यहां राष्ट्रवाद, प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और हेमामालिनी के ग्लैमर पर पूरा भरोसा है.

फतेहपुर सीकरी
फतेहपुर सीकरी ने पिछले दो लोकसभा चुनावों में ग्लैमर और हाई प्रोफाइल उम्मीदवारों को नकार दिया है. ऐसे में कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर के सामने बड़ी चुनौती है. 2009 में लोकसभा सीट बनने के बाद से ही फतेहपुर सीकरी चर्चा में रही है. 2009 में राज बब्बर यहां ग्लैमर लेकर आए थे. वहीं 2014 में अमर सिंह, लेकिन दोनों को हार का समना करना पड़ा. इस बार बीजेपी ने जहां अपने सीटिंग सांसद बाबू लाल का टिकट काटकर राजकुमार चाहर को मैदान में उतारा है. वहीं गठबंधन ने बाहुबली नेता गुड्डू पंडित पर दांव लगाया है. राज बब्बर कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से एक बार फिर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. यानी मुकाबला हाई वोल्टेज होने से साथ-साथ त्रिकोणीय दिख रहा है.

नगीना
पश्चिमी यूपी की नगीना सुरक्षित लोकसभा सीट पर इस बार त्रिकोणीय मुकाबला है. 2014 में मुस्लिम मतों के बिखराव और मोदी लहर के चलते भाजपा ने यह सीट जीती थी, लेकिन इस बार आपसी अंतर्कलह उसके लिए बड़ी चुनौती है. सबसे ज्यादा छह लाख मुस्लिम वोट वाली इस सीट पर चुनावी हार-जीत मुस्लिम मतों के मतदान के प्रतिशत और उनके बिखराव से तय होगी. बीजेपी ने इस बार वर्तमान सांसद यशवंत पर ही दांव लगाया है, लेकिन पार्टी से बगावत कर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं ओमवती ने बीजेपी की राह मुश्किल कर दी है. ओमवती के मजबूत होने से मुस्लिम वोटों में बिखराव ही मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहा है. सुरक्षित सीट होने के कारण गठबंधन के सबसे मजबूत दलित वोट बैंक का बिखराव तय है. ऐसे में गठबंधन उम्मीदवार गिरीश चंद्र अल्पसंख्यक वोट बैंक पर सबसे ज्यादा भरोसा कर रहे हैं. उनकी कोशिश इस वोट बैंक को बिखरने से रोकने की है.

अमरोहा
अमरोहा लोकसभा सीट पर मुकाबला आमने-सामने का दिख रहा है. कांग्रेस के कद्दावर नेता राशिद अल्वी के बैक-फायर ने गठबंधन उम्मीदवार कुंवर दानिश अली की राह आसान कर दी है. साढ़े पांच लाख मुस्लिम मतदाताओं वाली इस सीट पर अब सीधा मुकाबला बीजेपी के कंवर सिंह तंवर बनाम दानिश अली रह गया है. कांग्रेस उम्मीदवार सचिन चौधरी इस सीट के राजनीतिक गणित पर बहुत प्रभाव नहीं डाल पा रहे हैं.

हाथरस
हाथरस 1991 के बाद से बीजेपी की परंपरागत लोकसभा सीट रही है. 2009 के लोकसभा चुनावों को छोड़ दें तो बीजीपी यहां से कभी नहीं हारी. हालांकि कल्याण सिंह की टिकट बंटवारे में अनदेखी इस बार लोध वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है. इस बार बीजेपी ने यहा सीटिंग सांसद राजेश कुमार दिवाकर का टिकट काटकर राजवीर सिंह दिलेर को मैदान में उतारा है. दिवाकर के टिकट का फैसला पर्चा दाखिल करने के अंतिम दिन लिया गया. इससे साफ है कि सीटिंग सांसद का टिकट काटने का फैसला इतना आसान नहीं था.

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एसपी-बीएसपी गठबंधन से एसपी के दिग्गज नेता रामजी लाल सुमन मैदान में हैं. कांग्रेस ने यहां त्रिलोकी राम दिवाकर को मैदान में उतारा है. बात करें चुनावी समीकरण की तो यहां भी लड़ाई बीजेपी बनाम गठबंधन ही दिख रही है. कांग्रेस उम्मीदवार लगातार कोशिश के बाद भी चुनाव को त्रिकोणीय नहीं बना पा रहे हैं.

आगरा
आगरा की लड़ाई भी इस बार रोचक होती जा रही है. बीजेपी ने इस बार आगरा के कद्दावर पार्टी नेता और एससी एसटी कमीशन के अध्यक्ष रमाशंकर कठेरिया को इटावा भेजकर राज्य सरकार में मंत्री एसपी सिंह बघेल को मैदान में उतारा है. बघेल के जाति प्रमाण पत्र को लेकर कई बार विवाद हो चुका है. कांग्रेस ने इस सीट से प्रीता हरित को मैदान में उतारा है. गठबंधन की ओर से इस सीट पर बीएसपी उम्मीदवार मनोज कुमार सोनी हैं.

शहरी आबादी वाली इस सीट पर 2014 के चुनाव में बीजेपी को एसपी-बीएसपी दोनों दलों से ज्यादा वोट मिले थे. ऐसे में बीजेपी इस सीट को लेकर आश्वस्त है, लेकिन आलू किसानों और बंद होती फैक्ट्रियों को मुद्दा बनाकर एसपी-बीएसपी गठबंधन यहां बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. यानी यहां भी मुकाबला आमने-सामने का है.



पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के प्रभाव वाली बुलंदशहर और अलीगढ़ लोकसभा सीट पर भी मुकाबला आमने-सामने दिख रहा है.

बुलंदशहर
बात करें बुलंदशहर लोकसभा सीट की तो यहां भी मुकाबला आमने-सामने का दिख रहा है. इस सीट पर मुख्य मुकाबला बीजेपी उम्मीदवार और सांसद भोला सिंह बनाम बीएसपी उम्मीदवार योगेश वर्मा के बीच दिख रहा है. लगातार कोशिश के बाद भी कांग्रेस उम्मीदवार वंशी लाल पहाड़िया लड़ाई को त्रिकोणीय नहीं बना पा रहे हैं. ऐसे में कल्याण सिंह के प्रचार में न आने और मुकाबला आमने-सामने होने का फायदा गठबंधन को होता दिख रहा है.

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बुलंदशहर कुछ दिनों पहले भीड़ द्वारा पुलिस अधिकारी की हत्या के बाद सुर्खियों में आया था. ऐसे में यहां मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद लगाई जा रही है.

अलीगढ़
अलीगढ़ सीट इस बार बीजेपी उम्मीदवार सतीश गौतम और कल्याण सिंह के परिवार के मतभेदों को लेकर चर्चा में है. बीजेपी ने इस बार यहां सांसद सतीश कुमार गौतम को मैदान में उतारा है. लेकिन टिकट मिलने के बाद जिस तरह कल्याण सिंह के घर से पहली बार उन्हें वापस लौटना पड़ा, ये बताने के लिए काफी है कि गौतम कल्याण सिंह के पसंदीदा उम्मीदवार नहीं हैं. सतीश गौतम और बीजेपी दोनों के लिए ये चिंता की बात है. एसपी-बीएसपी गठबंधन ने यहां जातीय गणित साधने की कोशिश में अजीत बालियान को मैदान में उतारा था, लेकिम कांग्रेस ने पूर्व सांसद विजेंद्र सिंह को टिकट देकर जाट वोट बैंक का गणित बिगाड़ दिया है. इस सीट का फैसला काफी हद तक कल्याण सिंह और उनके परिवार के रुख पर निर्भर करता है क्योंकि यहां लोध वोटर भी निर्याणक संख्या में हैं.

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