छठे और सातवें चरण के मतदान के लिए क्या है अखिलेश और मायावती की नई रणनीति?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा-बसपा के वोट ट्रांसफर होने में दिक्कतें आने शुरू हो गई हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ सीटों पर शुरुआती दो-तीन चरणों में दोनों पार्टियों के वोट ट्रांसफर जरूर हुए, लेकिन चौथे और पांचवें चरण में दिक्कतें आनी शुरू हो गईं.

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: May 9, 2019, 7:56 AM IST
छठे और सातवें चरण के मतदान के लिए क्या है अखिलेश और मायावती की नई रणनीति?
मायावती को पीएम बनते देखना चाहते हैं अखिलेश यादव
Ravishankar Singh
Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: May 9, 2019, 7:56 AM IST
देश में पांचवें चरण के मतदान के बाद छठे और सातवें चरण के लिए जोर-आजमाइश का दौर शुरू हो गया है. खासतौर पर बीजेपी और एसपी-बीएसपी गठबंधन की सियासी रणभूमि का मैदान पूर्वांचल बन गया है. पूर्वांचल की 27 सीटों के लिए अगले दो चरणों में होने वाले मतदान के लिए गठबंधन और बीजेपी के बीच महामुकाबला देखने को मिलेगा.

पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पूर्वांचल की एक सीट छोड़कर सभी सीटों पर कब्जा जमाया था. इस लोकसभा चुनाव में भी पूर्वांचल पर फतह देश की सत्ता किसके हाथ में होगी? यह तय करने वाली है. ऐसे में बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन के साथ-साथ कांग्रेस ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है.



पूर्वांचल के रास्ते दिल्ली फतह करने की तैयारी

बीजेपी जहां अपना किला बचाने में लगी हुई है तो वहीं सपा-बसपा गठबंधन इस बार इस किले में सेंध लगाने की संभावना तलाश रहा है. दूसरी तरफ कांग्रेस भी प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण के साथ वापसी की सपना संजोए बैठी है. ऐसे में पूर्वांचल की लड़ाई देश की राजनीतिक दिशा और दशा तय कर सकती है.



बता दें कि पूर्वांचल में सपा-बसपा गठबंधन को अपने वोटबैंक को बरकरार रखने की कठिन चुनौती है. बुधवार आजमगढ़ में मायावती और अखिलेश यादव की रैली, इसी बात को सही साबित करती है. जानकारों का मानना है कि पूर्वांचल में बीजेपी से सपा-बसपा को अपने वोटों के ट्रांसफर की कड़ी चुनौती मिल रही है. इसी को ध्यान में रखकर अखिलेश यादव और मायावती ने पूर्वांचल के लिए इस बार नई रणनीति बनाई है.

पूर्वांचल के 27 सीटों में से बीजेपी के पास 26 सीटें हैं
Loading...

लोकसभा चुनाव के छठे और सातवें चरण में उत्तर प्रदेश की 27 सीटों पर मतदान होने हैं. इन 27 सीटों में से बीजेपी को 26 और सपा को आजमगढ़ की एक सीट 2014 में मिली थी. आजमगढ़ सीट से सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने साल 2014 लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी.



2019 लोकसभा चुनाव में एसपी-बीएसपी ने अपने-अपने वोटबैंक को बरकरार रखने के लिए रणनीति बना रखी है. दोनों पार्टियां अपने-अपने वोटबैंक को एक साथ रखने के लिए अब चुनावी रैली अलग-अलग करने वाले हैं.

वोट ट्रांसफर नहीं होने से एसपी-बीएसपी में चिंता

सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब उन सीटों पर खास ध्यान रख रहे हैं, जहां बीएसपी प्रत्याशी मैदान में है. अखिलेश यादव छठे चरण की श्रावस्ती, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर जैसी सीट पर अकेले जाकर बीएसपी के पक्ष में चुनाव प्रचार किया है. वहीं, बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी गोंडा, बाराबंकी, फैजाबाद और बहराइच जैसी सीटों पर एसपी उम्मीदवार के पक्ष में जाकर प्रचार किया है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा-बसपा के वोट ट्रांसफर होने में दिक्कतें आने शुरू हो गई हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ सीटों पर शुरुआती दो-तीन चरणों में दोनों पार्टियों के वोट ट्रांसफर जरूर हुए, लेकिन चौथे और पांचवें चरण में दिक्कतें आनी शुरू हो गईं.

राहुल गांधी की फाइल फोटो


उदाहरण के तौर पर बुंदेलखंड की बांदा लोकसभा सीट सपा के हिससे में आई. इस सीट से एसपी की तरफ से श्यामा चरण गुप्ता चुनाव मैदान में थे. वहीं, 2014 में बीएसपी के उम्मीदवार रहे आरके पटेल इस बार बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोंक रहे थे. ऐसे में एसपी को जितना उम्मीद थी उतना श्यामा चरण गुप्ता को वोट नहीं पड़े. इसी तरह 2014 में सपा के उम्मीदवार रहे बाल कुमार पटेल इस बार कांग्रेस से मैदान में थे. ऐसे में यह कहा जा रहा है कि बीजेपी उम्मीदवार पटेल ने इस बार बीएसपी वोटबैंक में सेंध लगाई है.

अखिलेश-मायावती की सभाएं एक दूसरे के गढ़ में 

इसी तरह अकबरपुर संसदीय सीट बीएसपी के खाते में गई है. यहां से बीएसपी से निशा सचान चुनावी मैदान हैं. वहीं, अकबरपुर के सपा नेता महेंद्र सिंह यादव आखिरी वक्त में शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में शामिल हो कर यहां से उम्मीदवार बन गए. ऐसे में एसपी को लगता है कि उसका वोटबैंक बीएसपी के बजाए प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में न कहीं शिफ्ट हो जाए.

कुलमिलाकर पल-पल बदलते राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रख कर इस बार अखिलेश यादव और मायावती ने भी बीजेपी के अंदाज में ही अपनी रणनीति बनाई है. इसी का नतीजा है कि अखिलेश यादव और मयावती अब अकेले ही एक-दूसरे के उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का प्लान तैयार किया है. अब देखना यह है कि छठे और सातवें चरण में अखिलेश यादव और मायावती को इस प्लान से कितना नुकसान या कितना फायदा पहुंचेगा.

ये भी पढ़ें- बांग्ला एक्ट्रेस के साथ पवन सिंह का सबसे बोल्ड डांस, 8 करोड़ लोगों ने देखा ये Video

 
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...