गठबंधन के फ्लॉप शो में सपा को तगड़ा नुकसान, बसपा की यूपी में वापसी!

समाजवादी पार्टी को महज पांच सीटें हासिल हुई हैं. मुलायम परिवार के तीन सदस्य- अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, दो चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव को हार का मुंह देखना पड़ा है.

Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 24, 2019, 11:25 AM IST
गठबंधन के फ्लॉप शो में सपा को तगड़ा नुकसान, बसपा की यूपी में वापसी!
अखिलेश और मायावती की फाइल फोटो
Amit Tiwari
Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 24, 2019, 11:25 AM IST
23 मई को जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो यूपी में मायावती और अखिलेश की जुगलबंदी नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की तिकड़ी के सामने औंधे मुंह गिर गई. जातिगत समीकरण के आधार पर बना सपा-बसपा गठबंधन महज 15 सीटें ही जीत सका. इसमें समाजवादी पार्टी को महज पांच सीटें हासिल हुईं, जबकि मुलायम परिवार के तीन सदस्य- अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, दो चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव को हार का मुंह देखना पड़ा. पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य हासिल करने वाली बसपा इस बार 10 सीटें हासिल करने में सफल रही.

अगर गठबंधन के प्रदर्शन की तुलना की जाए तो यादव परिवार के लिए इसे बड़ा नुकसान माना जा रहा है. वर्ष 2014 के मोदी लहर में भी समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर जीत हासिली की थी, लेकिन उस समय यादव परिवार के ही पांच सदस्य जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. लेकिन, देश के सबसे बड़े सियासी खानदान में से एक को इस बार तगड़ा झटका लगा है. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश को छोड़कर परिवार का कोई सदस्य नहीं जीत सका. अखिलेश यादव के जीत के अंतर को छोड़ दिया जाए तो मैनपुरी से मुलायम की जीत भी बड़ी नहीं रही. मुलायम की जीत का अंतर सिर्फ 94389 वोटों का रहा. साल 2014 में मुलायम सिंह ने इस सीट से बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी.



'अखिलेश के नेतृत्‍व पर उठेंगे सवाल'
वरिष्ठ पत्रकार और यूपी की सियासत को नजदीक से देखने वाले रतनमणि लाल कहते हैं, 'अब अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवाल उठेंगे. भले ही यह मीडिया के सामने न आए. अखिलेश यादव का यह तीसरा फैसला था जो सफल नहीं हुआ. पहला, शिवपाल यादव को बहार कर सपा की कमान खुद के हाथ में लेना. परिवार में अनबन का नुकसान भी देखने को मिला. दूसरा फैसला था कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना और तीसरा फैसला बसपा के साथ गठबंधन करना. इस बार तो यादव परिवार के ही तीन सदस्य हार गए. लिहाजा, उनके नेतृत्व का भी विश्लेषण होना तय है.'

बसपा होगी हावी
रतनमणि लाल ने कहा कि अब अखिलेश यादव के नेतृत्व के ऊपर सवाल जरूर उठेंगे. प्रदेश की राजनीति में अखिलेश की आवाज धीरे-धीरे सेकेंडरी होगी और मायावती की प्राइमरी हो जाएंगी. मतलब यह है कि जो अखिलेश कह रहे थे कि मायावती नेशनल पॉलिटिक्स में रहेंगी और वह राज्‍य की राजनीति करेंगे, ये बातें अब खत्म हो जाएंगी. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में अब अखिलेश के हाथ कुछ भी नहीं रह जाएगा और वह खुद कोई पहल नहीं कर पाएंगे. अब दोनों पार्टियों में गठबंधन की बात होगी तो उसमें बसपा हावी रहेगी. अखिलेश के पास मायावती की बात मानने के अलावा कोई और चारा नहीं होगा. यह स्थिति ऐसी होगी कि अखिलेश बसपा का प्रतिकार नहीं कर पाएंगे. इससे सपा के कैडर में भी यह संदेश जा सकता है कि अखिलेश दबाव में हैं.

सबसे बड़ा नुकसान अखिलेश को इस बात का हो सकता है कि वह जिस मुस्लिम समुदाय की आवाज बनने की बात करते रहे हैं, अब उसकी अगुवाई मायावती करती नजर आ सकती हैं. इसके पीछे की वजह ये है कि गठबंधन ने 10 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए थे, जिसमें से 6 जीतकर सांसद पहुंचे. तीन बसपा के और तीन सपा के मुस्लिम उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहे.
Loading...

Amethi lok sabha result 2019: वो 10 वजहें जिनके कारण राहुल गांधी पर भारी पड़ीं स्मृति ईरानी

लोकसभा चुनाव रिजल्टः एक-एक करके कैसे बिखरते गए राहुल के ‘गढ़’
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...