लाइव टीवी

Analysis: क्या 'कैराना उपचुनाव' की जीत पर टिकी महागठबंधन की उम्मीदें झूठी हैं

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: April 10, 2019, 3:05 PM IST
Analysis: क्या 'कैराना उपचुनाव' की जीत पर टिकी महागठबंधन की उम्मीदें झूठी हैं
महागठबंधन के नेता: जयंत चौधरी, अजीत सिंह, मायावती और अखिलेश यादव

कैराना उपचुनाव की जीत को महागठबंधन ने पश्चिमी यूपी में खूब प्रचारित किया, आरएलडी ने तो इसे जाटों की घर वापसी तक बता दिया. हालांकि वोट पैटर्न से पता चलता है कि 2019 में भी जाटों ने कैराना जैसी वोटिंग की तो महागठबंधन के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 10, 2019, 3:05 PM IST
  • Share this:
लोकसभा चुनाव 2019 का आगाज 'जाटलैंड' की आठ सीटों पर मतदान के साथ कुछ ही घंटों में शुरू होने जा रहा है. एक सहारनपुर सीट छोड़ दें तो बाकी सभी सीटों पर सपा-बसपा-आरएलडी महागठबंधन और बीजेपी के बीच सीधी लड़ाई नज़र आ रही है. 2014 लोकसभा चुनावों में इन सभी आठ सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी. हालांकि कैरान उपचुनाव में महागठबंधन ने जीत हासिल की और इसके बाद अखिलेश यादव, मायावती और अजीत सिंह ने इसी जीत को आधार बनाकर चुनाव प्रचार भी किया. हालांकि कैराना उपचुनाव के वोट पैटर्न को समझें तो पता चलता है कि 2019 में भी जाटों ने ऐसी ही वोटिंग की तो महागठबंधन के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

यहां पढ़ें: यूपी के वोट बैंक: पार्ट-1(दलित ), पार्ट-2 ( मुस्लिम), पार्ट-3 (ब्राह्मण), पार्ट-4 (यादव), पार्ट-5 (जाट), पार्ट-6 (राजपूत)

कैराना उपचुनाव
बता दें कि यूपी की कैराना लोकसभा सीट पर महागठबंधन समर्थित आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह को 44,618 वोटों से हरा दिया था. 2014 लोकसभा चुनावों में आरएलडी को एक भी सीट नहीं मिली थी ऐसे में तब्बसुम पार्टी की एकमात्र प्रतिनिधि बनकर संसद पहुंची थीं, साथ ही यूपी की तरफ से एकमात्र मुस्लिम सांसद भी बनीं. इस जीत के लिए कैराना में सपा, बसपा, आरएलडी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थीं. जीत के बाद सही लगातार ऐसा दावा किया जा रहा है कि जाट-मुस्लिम-दलित समीकरण से ये जीत हासिल की गई है. हालांकि सिर्फ उपचुनावों में सिर्फ 58% वोटिंग हुई थी जिसके बाद आरएलडी या महागठबंधन का ये दावा कि पार्टी ने 'जाट वोट बैंक' वापस हासिल कर लिया है कई तरह से सवालों के घेरे में रहा है.

ये भी पढ़ें: यूपी के वोट बैंक: किसके जाट और किसके ठाठ?

कैराना उपचुनाव को कैसे समझें?
कैराना की जीत के बाद आरएलडी के जयंत चौधरी जो अब बागपत सीट से उम्मीदवार भी हैं, ये दावा करते नज़र आए कि 'जिन्ना पर गन्ना' भारी पड़ गया है. हालांकि कैराना सीट के वोटिंग पैटर्न और इतिहास पर नज़र डालें तो ये 44 हज़ार वोटों की जीत पश्चिमी यूपी में महागठबंधन के लिए ही परेशानियां बढ़ाने वाली नज़र आती है. साल 2004 के लोकसभा चुनावों से इस पूरे वोटिंग पैटर्न को देखने से बात कुछ-कुछ समझ में आती है. 2004 के लोकसभा चुनावों तक जाट वोटबैंक का बड़ा हिस्सा आरएलडी के खाते में ही था और इन चुनावों में इस सीट पर 66% वोटिंग हुई थी. आरएलडी की तरफ से अनुराधा चौधरी मैदान में थीं और उन्होंने बीएसपी के शाहनवाज़ को 3 लाख 42 हज़ार वोटों से शिकस्त दी थी.
Loading...

(ये भी पढ़ें: यूपी के वोट बैंक पार्ट 1: मायावती, राहुल या मोदी ? यूपी का दलित आखिर क्या चाहता है ?)

2009 लोकसभा चुनावों की बात करें तो तब भी चुनावों में भी तब्बसुम हसन ने बीएसपी के टिकट पर जीत हासिल की थी लेकिन तब आरएलडी एनडीए में थी और उसके सपोर्ट से हुकुम सिंह ने बीजेपी के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए. दलित-मुस्लिम समीकरण से तब्बसुम जीती तो थीं लेकिन हुकुम सिंह ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. जीत का अंतर 13 हज़ार से भी कम रहा था. इन चुनावों में भी वोटिंग टर्नआउट 58% के आस-पास था और 7 बार कैराना विधानसभा से विधायक रहे हुकुम सिंह का जाटों ने खुलकर सपोर्ट किया था. असल में ये ही वो साल था जब आरएलडी ने अपना जाट वोट बैंक सफलतापूर्वक बीजेपी को ट्रांसफर कर दिया.

(इसे भी पढ़ें: यूपी के वोट बैंक पार्ट 2मुसलमानों को महज 'वोट बैंक' बनाकर किसने ठगा?)

2011 में आरएलडी ने यूपीए का हाथ थाम लिया और जाटों के एक बड़े हिस्से ने बीजेपी को वोट देकर खुद को ठगा हुआ महसूस किया. 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों ने इलाके में जाट बनाम मुस्लिम का समीकरण पैदा कर दिया और मशहूर गन्ना किसान यूनियन तक का अस्तित्व ख़त्म हो गया. 'अजगर' (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) से 'मजगर' (मुस्लिम, जाट, गुर्जर, राजपूत) पर शिफ्ट हुई आरएलडी के लिए ये बड़ा झटका था क्योंकि 'जाट वोटबैंक' अब बीजेपी की तरफ खिसक गया था और मुसलमान भी सपा के खाते में जाता हुआ दिखाई दे रहा था.

(ये भी पढ़ें: यूपी के वोट बैंक पार्ट 3: इस बार किस पार्टी का 'राजतिलक' करेगा ब्राह्मण?)

2014 के लोकसभा चुनावों में इसका असर भी देखने को मिला और अजीत सिंह अपनी पैतृक सीट बागपत से ही हार गए. कैराना की बात करें तो यहां रिकॉर्ड 73% वोटिंग हुई. जाटों ने आरएलडी को नकार दिया और पार्टी यहां चौथे नंबर पर खिसक गई. बीजेपी के हुकुम सिंह ने सपा के नाहिद हसन को 2 लाख 36 हज़ार वोटों से हरा दिया. तीसरे पर बसपा से कंवर हसन रहे जबकि आरएलडी के करतार सिंह भड़ाना को सिर्फ 42 हज़ार वोट मिले थे.

कुल वोटर : 16,12989 (कैराना)

(अनुमानित)
मुसलमान : 5.5 लाख
दलित : 2 लाख
पिछड़ी जाति (जाट, सैनी, प्रजापति, कश्यप): 4 लाख (जाट करीब 2 लाख)
गुर्जर : 1 लाख तीस हज़ार
राजपूत: 75 हजार
ब्राह्मण: 60 हजार
वैश्य: 55 हजार

सिर्फ 58% वोटिंग से ये साफ़ है कि लोगों ने 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह इस उपचुनाव को तवज्जो नहीं दी. कांग्रेस, बसपा, सपा और आरएलडी के साथ आने से मुसलमानों का 5 लाख से ज्यादा वोट, दलित के 2 लाख वोट, जाटों के 2 लाख और गैर ओबीसी जाटों के 2 लाख वोटों का एक हिस्सा तबस्सुम के पक्ष में आएगा इसका अनुमान लगाया गया था.

ग्राउंड रिपोर्ट: क्या अजीत सिंह के पास लौटेंगे पश्चिमी यूपी के जाट? 

बीजेपी और महागठबंधन के बीच लड़ाई प्रमुख रूप से जाट और गैर जाट ओबीसी वोटों के लिए ही थी. तबस्सुम को 481182 वोट जबकि बीजेपी की मृगांका सिंह को 436564 वोट मिले. बीजेपी के कोर वोट बैंक राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और गैर जाट ओबीसी में सैनी-प्रजापति अगर अपने 100% वोट डाल भी देते तो भी मृगांका 4 लाख तक नहीं पहुंच पातीं. इससे सपष्ट है कि सिर्फ 58% वोटिंग में जाटों के एक बड़े हिस्से और ओबीसी-दलित के छोटे ही सही पर एक हिस्से ने भी बीजेपी को वोट दिया है.

कैराना जैसी ही वोटिंग हुई तो महागठबंधन के लिए रेड अलर्ट
ज्यादातर जानकार इस बात पर सहमत नज़र आ रहे हैं कि गोरखपुर और फूलपुर के बाद कैराना-नूरपुर की हार बीजेपी के लिए अच्छा मैसेज नहीं गया था. साथ ही पश्चिमी यूपी की सीटों पर दलित-मुस्लिम ही इतना मजबूत समीकरण है कि उसका सामना करना काफी मुश्किल है. हालांकि कैराना उपचुनाव के वोट शेयर को देखा जाए तो समझ आता है कि बीजेपी अब भी इस बात से आश्वस्त है कि इलाके में जाट अब भी उससे पूरी तरह नहीं रूठे हैं. गन्ना किसानों के बकाया के मुद्दे को लेकर लोगों में नाराजगी ज़रूर है लेकिन वो कम से कम कैराना उपचुनावों में भी वोटिंग से जाहिर नहीं हुई थी.



ऐसा नहीं है कि आरएलडी इस बात को नहीं समझ रही है. अजीत सिंह अपनी सभाओं में जो भाषण दे रहे हैं उससे स्पष्ट है कि उन्हें भी जाटों की तरफ से खतरा नज़र आ रहा है. इलाके के सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश सिंह के मुताबिक अजीत न तो सड़क की बात कर रहे हैं न विकास की. बीते एक साल से वो लगातार इस इलाके में 'सद्भाव यात्रा' निकाल रहे हैं और पुराने वोट बैंक में आई दरार को भरने का काम कर रहे हैं. दूसरा उन्होंने 'जाट प्राइड' पर दांव खेला है.

बागपत जाकर उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये सीट छोड़ रहा हूं जयंत के लिए, तुम्हारा लड़का है हराना है या जिताना है देख लो. मुज़फ्फरनगर जाकर कहा मेरे से जो गलती हुई है उसे कैसे सुधार सकता हूं ये बता दो? कहोगे तो चुनाव लड़ूंगा और मना कर दोगे तो नाम वापस ले लूंगा. अजीत सिंह और आरएलडी का पूरा चुनावी कैंपेन ही जाटों की नाराज़गी दूर करने पर केन्द्रित रहा है.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लखनऊ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: April 10, 2019, 12:52 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...