लोकसभा चुनाव 2019: अलीगढ़ में अपने नाराज़ वोटर्स को रिझा पाएगी BJP? जानें पूरा हाल

मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो, आरक्षण, राजा महेंद्र प्रताप सिंह और कैंपस के भीतर मंदिर जैसे AMU से जुड़े विवाद क्या चुनाव पर भी असर डालेंगे?

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Updated: April 18, 2019, 9:46 AM IST
लोकसभा चुनाव 2019: अलीगढ़ में अपने नाराज़ वोटर्स को रिझा पाएगी BJP? जानें पूरा हाल
एएमयू प्रोटेस्ट (फ़ाइल फोटो)
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Updated: April 18, 2019, 9:46 AM IST
लोकसभा चुनाव 2019 के दूसरे फेज की वोटिंग में अब बस एक ही दिन का वक़्त रह गया है. दूसरे चरण में 13 राज्यों की कुल 97 सीटों पर वोटिंग होनी है. इस फेज में यूपी की 8 अहम सीटों पर वोटिंग होनी है. इन्हीं में से एक अलीगढ़ लोकसभा सीट भी है. अलीगढ़ सीट बीते 5 साल लगातार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से जुड़े विवादों के चलते चर्चाओं में रही है. मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो, आरक्षण, राजा महेंद्र प्रताप सिंह और कैंपस के भीतर मंदिर जैसे विवाद लगातार AMU को विवादों में बनाए रहे. बात यहां तक पहुंच गई कि तीन बार यूनिवर्सिटी में क्लासेज सस्पेंड हुईं और यूनिवर्सिटी के 14 छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा भी दर्ज हुआ.

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क्या है अलीगढ़ सीट का गणित?
अलीगढ़ सीट की बात करें तो इस सीट को बीजेपी के सीनियर नेता और अब राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का गढ़ माना जाता है. कल्याण सिंह लोध वोटर्स के बड़े नेता माने जाते हैं. 2017 में उन्होंने अपने पोते संदीप सिंह को भी विधानसभा पहुंचाया है, जोकि योगी कैबिनेट में राज्यमंत्री भी हैं. साल 1991 के बाद बीजेपी ने यहां 6 बार लोकसभा चुनाव जीता है. हालांकि इस बार महागठबंधन के चलते यहां मुकाबला कड़ा है. इसकी वजहों में बीजेपी की आंतरिक कलह, लोकसभा सांसद और प्रत्याशी सतीश गौतम के खिलाफ ऐंटी-इन्कम्बैंसी, जातीय समीकरण और अल्पसंख्यकों का वोट महागठबंधन के पक्ष में जाना मानी जा रहीं हैं.

राजस्थान के राज्यपाल और यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह भी इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं और ऐसा माना जाता रहा है कि उनकी मर्जी के बिना पार्टी यहां किसी को टिकट नहीं देती. हालांकि बीते सालों में सतीश गौतम और कल्याण सिंह के बेटे राजबीर के बीच विवाद बढ़ता ही गया है, यहां तक कि खुद सीएम योगी आदित्यनाथ भी दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश कर चुके हैं. असल में कल्याण सिंह लोध जाति के हैं और अलीगढ़ में लोध जाति की बड़ी संख्या है. यह समुदाय ज्यादातर बीजेपी का समर्थन करता है, लेकिन सतीश गौतम के खिलाफ इनमें नाराजगी बताई जाती है.



बीते दिनों सतीश के ख़ास माने जाने वाले युवा नेता मुकेश लोधी की एक वीडियो वायरल हुई जिसमें अलीगढ़ के एक गांव में लोगों ने उन्हें प्रचार के लिए घुसने ही नहीं दिया. ये गांव लोध बहुल आबादी का था और लोग इसलिए नाराज़ थे क्योंकि मुकेश खुद लोध होकर भी सतीश का साथ दे रहे हैं. आंकड़े देखें तो इस लोकसभा सीट पर लोध वोटर लगभग 2.5 लाख है. इनमें से भी सबसे ज्यादा लोध अतरौली विधानसभा क्षेत्र में रहते हैं. लोगों का आरोप है कि इलाके में जो भी विकास का काम हुआ है वो अतरौली, बरौली, कोइल, अलीगढ़ शहर और खैर के पांच बीजेपी विधायकों ने कराया है. शुरू के तीन साल सतीश गौतम आए ही नहीं, हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि 2017 के बाद से सतीश गौतम सक्रिय हुए क्योंकि प्रदेश में आदित्यनाथ की सरकार आई.गौरतलब है कि अलीगढ़ में मुस्लिम वोटर लगभग तीन लाख हैं, जो कि ज्यादातर अलीगढ़ शहर और कोइल विधानसभा क्षेत्र में रहते हैं. ऐसा माना जा रहा है कि ये वोटर परंपरागत तरीके से महागठबंधन के ही पक्ष में वोट करेगा. राजपूतों के बाद अलीगढ़ में सबसे ज्यादा संख्या ब्राह्मणों की है. माना जा रहा है कि सतीश गौतम ब्राह्मण है, इसलिए उन्हें ब्राह्मण वोट आसानी से मिलेगा. वहीं कुछ महीने पहले बीएसपी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले राजपूत नेता जयवीर सिंह भी बीजेपी प्रत्याशी का समर्थन कर रहे हैं इसलिए राजपूत वोट भी सतीश गौतम को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. बता दें कि जयवीर की पत्नी राज कुमारी चौहान 2009 में बीसपी की टिकट पर अलीगढ़ लोकसभा सीट जीती थी.

5 वजहें जिससे AMU विवादों में रही
1. बीजेपी सांसद सतीश गौतम लगातार ये कहते रहे हैं कि अल्पसंख्यक संस्थान होने के चलते AMU में आरक्षण नहीं मिलता और हिंदू दलित भाइयों को इससे नुकसान हो रहा है. राइट विंग संगठन लगातार इस बात को मुद्दा बनाकर प्रदर्शन करते हैं कि सब्सिडी से चलने वाले शिक्षा संस्थान पर धर्म विशेष का कब्ज़ा नहीं होना चाहिए. बता दें कि बीते मंगलवार को ही अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने का मसला सुप्रीम कोर्ट ने सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया है. हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2006 के फैसले कहा था कि यह यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हो सकती लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है.

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2. एक अन्य आरोप ये है कि AMU कैंपस में देश का बंटवारा कराने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो लगी है. दरअसल उस हॉल में ऐसे हर व्यक्ति की फोटो है जिन्हें AMU स्टूडेंट यूनियन ने आजीवन सदस्यता दी थी. इस मामले पर AMU प्रशासन और स्टूडेंट यूनियन कई बार सपष्ट कर चुके हैं कि अगर तस्वीर हटवानी है तो केंद्र सरकार प्रोसीजर के तहत काम करे और आदेश दे. 'जिन्ना बवाल' के दौरान भी स्टूडेंट यूनियन ने बयान जारी कर कहा था कि जिन्ना कभी भी AMU स्टूडेंट्स के आदर्श नहीं रहे, हमारे आदर्श सर सैयद हैं और रहेंगे. AMU के पीआरओ पीरजादा भी इस बारे में स्पष्ट कहते हैं कि इस देश के पास जब गांधी हैं तो किसी का भी आदर्श जिन्ना कैसे हो सकते हैं.



3. राजा महेंद्र प्रताप ने यूनिवर्सिटी को ज़मीन दी थी लेकिन उन्हें सम्मान नहीं मिला? हालांकि ये भी झूठ साबित हुआ, क्योंकि AMU की लाइब्रेरी के हॉल में राजा महेंद्रप्रताप की तस्वीर लगी हुई है. बीते साल उनके योगदानों को लेकर एक सिंपोजियम भी आयोजित कराया गया था.

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4. बीती फरवरी में जारी विवाद के केंद्र में राइट विंग छात्र नेता अजय सिंह रहे थे. अजय ही वो शख्स हैं जिन्होंने जनवरी 2019 में बिना इजाज़त के AMU कैंपस में तिरंगा यात्रा निकाली थी. इस मामले में यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अजय और उनके साथी छात्रों को नोटिस भेजकर जवाब भी मांगा था. हालांकि एएमयू के छात्र नेता सोनवीर ने आरोप लगाया था कि पत्थरबाजों के समर्थन में रैली निकलने पर AMU प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता लेकिन देशभक्ति को दबाने का काम कर रहा है.

इस मामले में सांसद सतीश गौतम ने केंद्रीय मानव संसाधान मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर AMU प्रशासन से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगने की अपील की थी. सतीश का कहना था कि तिरंगा यात्रा निकालने वाले छात्रों के खिलाफ नोटिस किस आधार पर भेजा गया, क्या भारत के किसी हिस्से में देशभक्ति से जुड़ा कार्यक्रम किया जाना असंवैधानिक है ? इस मामले में आगरा के मेयर नवीन जैन ने कहा था कि एएमयू राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का अड्डा है और वहां पर आंतकवाद को बढ़ावा दिया जाता है.

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5. 8 फरवरी 2019 को ही बीजेपी यूथ विंग ने AMU के कुलपति को एक ख़त लिखा था जिसमें कैंपस के अन्दर हिंदू छात्रों के लिए 'मंदिर' निर्माण के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने की अपील की गई थी. इस मांग के साथ एक चेतावनी भी थी कि 15 दिन में वीसी ने जगह नहीं दी तो संगठन जनता के सहयोग से मंदिर निर्माण करने के लिए मजबूर हो जाएगा. बीजेपी यूथ विंग ने इस मामले में यूनिवर्सिटी प्रशासन को आगामी 24 फरवरी तक का वक़्त भी दिया हुआ है. सांसद सतीश गौतम भी यूनिवर्सिटी में मंदिर की बात कह चुके हैं.

क्या होगा इन विवादों का असर?
AMU के पीआरओ ओमार एस पीरजादा चुनावों से जुड़ी कोई भी टिप्पणी करने से साफ़ मना कर देते हैं लेकिन आरोप लगाते हैं कि कुछ बाहरी लोग लगातार यूनिवर्सिटी के माहौल को खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और ऐसे असामाजिक तत्वों के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई है.
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इलाके के पत्रकार धीरेंद्र सिंह भी कहते हैं कि AMU को लगातार विवादों में बनाए रखने के पीछे कुछ राजनीतिक शक्तियां काम कर रही हैं. बीते पांच सालों को देखें तो लगातार ऐसे मुद्दों को उठाया जा रहा है जिससे धार्मिक आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण में मदद मिल सके. हालांकि धीरेंद्र का मानना है कि अलीगढ़ सीट पर इससे कोई ख़ास फर्क पड़ेगा ऐसा नज़र नहीं आ रहा, इससे इतना होगा कि अल्पसंख्यक वोट ज़रूर महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद हो गया है. धीरेंद्र कहते हैं कि AMU के जरिए पूरे देश में एक मैसेज भेजा जा रहा था, जिसमें मन मुताबिक सफलता नहीं मिल पाई.
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