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ग्राउंड रिपोर्ट: क्या अजित सिंह के पास लौटेंगे पश्चिमी यूपी के जाट?

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: April 10, 2019, 1:47 PM IST
ग्राउंड रिपोर्ट: क्या अजित सिंह के पास लौटेंगे पश्चिमी यूपी के जाट?
अजीत सिंह (फ़ाइल फोटो)

राष्ट्रीय लोकदल को 2014 में एक भी सीट नहीं मिली थी, जबकि 2017 विधानसभा चुनावों में सिर्फ एक विधायक आरएलडी के टिकट पर चुनकर विधानसभा पहुंचा था, जो बाद में बीजेपी में शामिल हो गया.

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  • Last Updated: April 10, 2019, 1:47 PM IST
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लोकसभा चुनाव 2019 के लिए पहले चरण के मतदान में अब कुछ ही घंटे बचे हैं. पहले चरण में पश्चिमी यूपी की आठ अहम सीटों- सहारनपुर, कैराना, मुज़फ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर पर मतदान होना है. ये सभी सीटें 'जाटलैंड' का हिस्सा मानी जाती है, जबकि इन सीटों पर दलित और मुसलमान वोटर्स भी काफी संख्या में हैं.

चौधरी चरण सिंह की विरासत संभल रहे अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को 2014 में एक भी सीट नहीं मिली थी, जबकि 2017 विधानसभा चुनावों में सिर्फ एक विधायक आरएलडी के टिकट पर चुनकर आ पाया था. अहम सवाल है कि कैराना उपचुनाव के नतीजों से उम्मीद लगाए महागठबंधन के हिस्सेदार अजित के पास क्या खोया जाट वोट बैंक लौटेगा?

यहां पढ़ें: यूपी के वोट बैंक: पार्ट-1(दलित ), पार्ट-2 ( मुस्लिम), पार्ट-3 (ब्राह्मण), पार्ट-4 (यादव), पार्ट-5 (जाट), पार्ट-6 (राजपूत)

यूपी में क्या है जाट की अहमियत?

यूपी में जाटों की आबादी 6 से 8% बताई जाती है, जबकि पश्चिमी यूपी में इनकी जनसंख्या 17% से भी ज्यादा है. ऐसी 18 लोकसभा सीटें हैं: सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी, और फिरोजाबाद जहां जाट वोटबैंक चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता है. विधानसभा की बात करें तो 120 सीटें ऐसी हैं जहां जाट वोटबैंक असर रखता है. फिलहाल संसद में 24 सांसद जाट हैं जिनमें सिर्फ 4 सांसद भारतेंदु सिंह, सत्यपाल सिंह, चौधरी बाबूलाल और संजीव बालियान यूपी से हैं. विधानसभा की बात करें तो फिलहाल 14 जाट विधायक हैं. लोकसभा सीटों की बात करें तो मथुरा में 40%, बागपत में 30%, सहारनपुर में 20% जाट आबादी है.

जाट-मुस्लिम और चरण सिंह-टिकैत
पश्चिमी यूपी के जाट नेताओं में चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत दो अहम् नाम है. इन दोनों नेताओं ने 'जाटलैंड' में धर्म-जाति मुक्त किसान एकता और मुस्लिम-जाट जैसे मजबूत समीकरण को स्थापित किया था. हालांकि 1992, 2002 और 2013 इस एकता को कमज़ोर करने के क्रम में वो साल रहे जिन्होंने पश्चिमी यूपी के 'संप्रदायमुक्त किसान समाज' का सपना धुंधला कर दिया. चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत को उनका जाट होना तो जोड़ता ही है साथ ही उन्होंने अपनी-अपनी लड़ाई के लिए जिस सामाजिक ताने-बाने को बुना वो लगभग एक जैसा ही था.
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चरण सिंह भी लगातार किसानों के राजनीतिक रिप्रेजेंटेशन को लेकर काम करते रहे और उन्होंने भी मुसलमानों के बिना इसे असंभव माना बल्कि लोकदल और बाद में आरएलडी का कोर वोट बैंक भी यही समीकरण रहा. उधर टिकैत ने भी भारतीय किसान यूनियन में मुसलमानों को प्रमुखता से जगह दी थी. हालांकि ब्रास ने अपनी किताब में इस बात का तफसील से जिक्र किया है कि कैसे मुस्लिमों को लेकर चरण सिंह के विचार काफी नकारात्मक थे. लेकिन फिर भी वे मुस्लिमों को खूब टिकट देते थे.

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बीजेपी ने कैसे जीता जाट लैंड?
बता दें कि यूपी में मुस्लिम जनसंख्या 19.5% है जबकि 13 सीटें लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30% से भी ज्यादा है. 15% को आधार बनाएं, तो यूपी की 32 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी प्रभावी वोट बैंक है. इनमें से ज्यादातर सीटें पश्चिमी यूपी की हैं जहां जाट वोट बैंक भी प्रमुखता से मौजूद रहा है. इस इलाके के प्रमुख वोट बैंक में दलित, मुसलमान के बाद तीसरा जाट ही है. जाट-मुस्लिम और यादव-मुस्लिम समीकरण से लड़ने के लिए ही मायावती ने सवर्ण-दलित फ़ॉर्मूला बनाया था, जो कुछ मौकों पर सफल भी रहा.

आरएलडी के जनरल सेक्रेटरी राजकुमार सांगवान बताते हैं कि पश्चिमी यूपी का इतिहास कम्युनल नहीं रहा है, यहां मुसलमानों की बड़ी तादाद है जो हिंदुओं से कन्वर्ट हुई और आज भी चौधरी, त्यागी जैसे सरनेम इस्तेमाल करती है. 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद से बीजेपी और संघ ने इस इलाके के सामाजिक ताने-बाने को निशाना बनाना शुरू किया. छपरौली से आरएलडी के पूर्व विधायक वीरपाल राठी बताते हैं गोधरा कांड के बाद माहौल बदलना शुरू हुआ और मुसलमान भी अपने संख्याबल और राजनीतिक ताकत को देखते हुए मुखर होना शुरू हो गए. वेस्टर्न यूपी का किला गिराए बिना यूपी और दिल्ली की गद्दी नहीं मिलेगी ये बीजेपी-संघ को समझ आ गया था. चौधरी चरण सिंह की विरासत को संभालने में अजित सिंह नाकाम थे और 2011 में टिकैत भी एक ऐसी जगह खाली कर गए जिसे भरा जाना बेटे नरेश-राकेश टिकैत के लिए नामुमकिन था.



सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश के मुताबिक पश्चिमी यूपी में मुसलमानों की अपेक्षाकृत ज्यादा जनसंख्या बीजेपी के काफी काम आई. पहले कांशीराम और फिर मंडल आंदोलन के बाद जैसे-जैसे जाति आधारित पार्टियों ने यूपी की राजनीति में पैंठ बनानी शुरू की, मुसलमानों की अहमियत भी बढ़ती गई. मुस्लिम डोमिनेंट सीटों पर भी बीजेपी ने लगातार दूसरी बड़ी जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया जबकि सपा, बसपा और आरएलडी लगातार मुसलमान उम्मीदवार उतार रहे थे. इसका नतीजा ये सामने आया कि 1991 के बाद हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने जाट बहुल सीटों पर बढ़िया प्रदर्शन किया. टॉप 10 जाट बहुल सीटों में से आगरा, बिजनौर, मुज़फ्फरनगर, अलीगढ़, मथुरा और मेरठ ऐसी सीटें हैं जहां बीजेपी काफी मजबूत है.

बृजेश बताते हैं कि ऐसा माना जाता है कि कवाल कांड के बाद मुज़फ्फरनगर में दंगे शुरू हुए थे, हालांकि सच ये हैं कि ऐसी छोटी-मोटी वारदातों का सिलसिला पहले से ही चल रहा था. सुधा पाई और सज्जन कुमार की किताब 'एवरीडे कम्युनलिज्म: राइट्स इन कंटेपररी उत्तर प्रदेश' में भी यूपी में इन छोटे-छोटे दंगों की श्रृंखला को दर्ज किया गया है. इस किताब के मुताबिक 2012 में सपा की सरकार आने के बाद से मुज़फ्फरनगर दंगों के बीच 104 कम्युनल टेंशन की घटनाएं दर्ज की गईं. प्रतापगढ़, मथुरा, फैजाबाद और बरेली इसके सबसे बड़े शिकार हुए. इन घटनाओं में 34 लोगों की मौत हुई जबकि 456 लोग घायल हुए. बृजेश बताते हैं कि मुज़फ्फरनगर दंगों का सीधा फायदा बीजेपी को हुआ, दंगा हुआ और पुलिसिया कार्रवाई में जाटों के लड़के उठाए गए. इसी सेंटिमेंट पर संजीव बालियान, संगीत सोम और सुरेश राणा जैसे लोग नेता बन गए. अजित सिंह न तो मुस्लिम वोट खोना चाहते थे और न ही जाट, वो चुप रहे और बीजेपी ने सपा, बसपा और आरएलडी को मुसलमानों की पार्टी घोषित कर दिया.



कहां गलती हुई ?
आरएलडी नेता वीरपाल मानते हैं कि बीजेपी की राजनीति को जाटों तक पहुंचाना बड़ी गलती रही. बीजेपी के साथ 2009 लोकसभा चुनावों के लिए हुए गठबंधन के चलते आरएलडी को हुए नुकसान से जुड़े सवाल के जवाब में वीरपाल कहते हैं कि 1977 में भी हमने इनका साथ दिया था और तब भी हमारे वोट बैंक को इससे नुकसान पहुंचा था, 2009 में हालातों को देखते हुए जो फैसला लिया गया था यकीनन वो गलत साबित हुआ. चौधरी चरण सिंह के ज़माने से ही हम जाति की राजनीति से दूर रहने की कोशिश करते रहे थे, हम कभी भी जाटों की पार्टी नहीं थे बल्कि किसान और गांव-देहात के लोगों की पार्टी थे. राजकुमार सांगवान भी मानते हैं कि हम बीजेपी के ट्रैप में फंस गए थे.

क्या जाट लौटेंगे ?
2019 का चुनाव सर पर है और लगातार ये सवाल उठ रहा है कि इस बार पश्चिमी यूपी के जाट किसका साथ देंगे? क्या आरएलडी ने ऐसा कुछ किया है जो जाटों का भरोसा दोबारा उन पर हो सके? बृजेश इस सवाल का जवाब देते हैं, उनके मुताबिक अजित सिंह आजकल अपनी सभाओं में जो भाषण दे रहे हैं उन्हें सुनने से इन सवालों का जवाब मिल जाता है. अजित न तो सड़क की बात कर रहे हैं न विकास की. बीते एक साल से वो लगातार इस इलाके में 'सद्भाव यात्रा' निकाल रहे हैं और पुराने वोट बैंक में आई दरार को भरने का काम कर रहे हैं. दूसरा उन्होंने 'जाट प्राइड' पर दांव खेला है. बागपत जाकर उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये सीट छोड़ रहा हूं जयंत के लिए, तुम्हारा लड़का है हराना है या जिताना है देख लो. मुज़फ्फरनगर जाकर कहा मेरे से जो गलती हुई है उसे कैसे सुधार सकता हूं ये बता दो ? कहोगे तो चुनाव लड़ूंगा और मना कर दोगे तो नाम वापिस ले लूंगा. अजित सिंह का पूरा चुनावी कैंपेन जाटों की नाराज़गी दूर करने पर केन्द्रित है.



दूसरी तरफ जाटों के पास अपना लीडर ही नहीं है, आरएलडी अपने अस्तित्व की राजनीति कर रही है तो जाट भी बीजेपी में अपना अस्तित्व तलाश रहे हैं जो उन्हें फिलहाल नहीं मिल रहा. मुज़फ्फरनगर दंगा ही बीजेपी के आने की वजह नहीं थी, इन्होने वादा किया था कि 14 दिनों के अन्दर गन्ने का पेमेंट कर दिया जाएगा. इस महीने की शुरुआत में 12000 करोड़ रुपए बकाया है, जाटों को बकाया पैसे से भी नाराजगी नहीं है वो तो पहले भी रहता था लेकिन बीजेपी ने कमिटमेंट पूरा नहीं किया ये उन्हें अखर रहा है.
इलाके में गन्ने के बाद गेहूं प्रमुख फसल है. आवारा पशु एक बड़ा मुद्दा बन गया है, गन्ने का पेमेंट नहीं होता और गेहूं की फसल को आवारा पशुओं से बचाना मुश्किल हो गया है. या तो फसल बर्बाद हो रही है या फिर उसे बचाने के लिए कर्जा लेना पड़ रहा है. रोज़गार एक बड़ा मुद्दा बन गया है, वादा था कि 2 करोड़ नौकरी हर साल देंगे लेकिन भर्तियां ही नहीं निकली और पढ़े-लिखे जाट युवा बेरोजगार घूम रहे हैं. किसान से आमदनी दोगुनी करने का वादा किया था वो भी पूरा नहीं हुआ है.

कालिका रंजन कानूनगो ने जाटों के इतिहास पर किताब लिखी है. उसमें वह जिक्र करते हैं कि 'जाट मरते वक्त भी अपने उत्तराधिकारी को यह बता कर मरता है कि किस-किस का कितना कर्ज चुकाना है.' जाट अगर किसी को पैसा उधार दे तो सिर्फ एक बार पूछता है कि कब लौटाएगा, दिए गए दिन तक कभी पूछता नहीं और जब वो दिन आ जाए तो बिना लिए मानता नहीं है, इसलिए हठी लोगों को 'जाट बुद्धि' भी कह दिया जाता है. जाटों का यह कमिटमेंट और मुखरता ही सियासी दलों को उनको अपने पाले में खींचने के लिए मजबूर करती रही है. पश्चिमी यूपी का जाट या तो आन पर वोट करता रहा है या फिर वादा तोड़ने वालों को सबक सिखा देता है.

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First published: April 10, 2019, 11:09 AM IST
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