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योगी सरकार की अनुमति मिलते ही इस निजी अस्पताल ने किडनी ट्रांसप्लांट में बनाया ये अनूठा रिकॉर्ड

डॉ राहुल यादव, डॉ अरुण कुमार और डॉ आदित्य की टीम ने किया सफल ऑपरेशन

डॉ राहुल यादव, डॉ अरुण कुमार और डॉ आदित्य की टीम ने किया सफल ऑपरेशन

तीनों ही ऑपरेशन हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट नेफ्रोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट डॉ अरुण कुमार, यूरोलॉजिस्ट व किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन, डॉ राहुल यादव व डॉ आदित्य के शर्मा और अन्य सपोर्ट स्टाफ के द्वारा किया गया.

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की योगी सरकार (Yogi Government) से ह्यूमन ट्रांसप्लांट (Human Transplant) की स्वीकृति मिलने के बाद राजधानी लखनऊ (Lucknow) के प्राइवेट हॉस्पिटल ने एक महीने में तीन सफल किडनी ट्रांसप्लांट (Kidney Transplant) कर अनूठा रिकॉर्ड बनाया. लखनऊ के अपोलो मेडिक्स हॉस्पिटल (Apollo Medics Hospital) के डॉक्टरों ने यह कारनामा कर दिखाया. तीन किडनी ट्रांसप्लांट में से एक काफी जटिल था क्योंकि इसमें डोनर और रिसीवर दोनों का ब्लड ग्रुप अलग-अलग था.

बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा यह जानकारी दी गई. तीनों ही ऑपरेशन हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट नेफ्रोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट डॉ अरुण कुमार, यूरोलॉजिस्ट व किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन, डॉ राहुल यादव व डॉ आदित्य के शर्मा और अन्य सपोर्ट स्टाफ के द्वारा किया गया.

एक महीने के भीतर तीन किडनी ट्रांसप्लांट

डॉ अरुण ने बताया कि सरकार की ट्रांसप्लांट कमेटी द्वारा अनुमति मिलने के बाद हॉस्पिटल ने एक महीने के भीतर तीन सफल किडनी ट्रांसप्लांट किए. तीनों ही ऑपरेशन में मरीज और डोनर दोनों स्वस्थ्य हैं. उन्होंने बताया कि अमूमन किसी भी नए हॉस्पिटल के लिए यह अनोखी उपलब्धि है. डॉ अरुण के मुताबिक दो ऑपरेशन तो सामान्य ट्रांसप्लांट था. लेकिन तीसरा जटिल था क्योंकि इसमें डोनर और रिसीवर दोनों का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हो रहा था. ऐसे ट्रांसप्लांट को एबीओ इनकम्पेटिबल ट्रांसप्लांट कहते हैं, जो एक जटिल प्रक्रिया है. इसके लिए बेहतर अत्याधुनिक सुविधाओं और तकनीकों की जरूरत होती है. हमें ख़ुशी है कि किडनी ट्रांसप्लांट शुरू होने के एक महीने के अंदर हम इस तरह की जटिल सर्जरी करने में सफल रहे.

ब्लड मिसमैच के बाद भी ट्रांसप्लांट सफल

यूपी के बस्ती निवासी 34 वर्षीय एक मरीज जिसका ब्ल्लोद ग्रुप ओ+ होने के साथ ही दोनों किडनी ख़राब थी. उनके 65 वर्षीय पिता जिनका ब्लड ग्रुप बी+ थे. उन्होंने अपने बेटे को किडनी दान करने का फैसला किया .एबीओ इनकम्पेटिबल के साथ ही डोनर की ज्यादा उम्र व फेफड़ों की बीमारी इस सर्जरी के लिए अत्यधिक चुनौतीपूर्ण थी.

डॉ राहुल ने बताया कि एबीओ इनकम्पेटिबल ट्रांसप्लांट में सफलता की संभावना सामान्य ट्रांसप्लांट से कम होती है. साथ ही ट्रांसप्लांट के बाद भी कई तरह की समस्याओं और इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है. साथ ही मरीज का शरीर नए किडनी को रिजेक्ट कर दे ऐसी संभावना भी ज्यादा होती है. लेकिन इसके बावजूद एक बेहतरीन टीम एफर्ट की बदौलत ट्रांसप्लांट सफल रहा.

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