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लखनऊ कैंट: 'समाजवादी बहू' के सामने टिक पाएंगीं रीता बहुगुणा?

लखनऊ कैंट: 'समाजवादी बहू' के सामने टिक पाएंगीं रीता बहुगुणा?

राजधानी लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट इस समय उत्तर प्रदेश की सबसे हाईप्रोफाइल सीट में शुमार हो गई है.

राजधानी लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट इस समय उत्तर प्रदेश की सबसे हाईप्रोफाइल सीट में शुमार हो गई है.

राजधानी लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट इस समय उत्तर प्रदेश की सबसे हाईप्रोफाइल सीट में शुमार हो गई है.

राजधानी लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट इस समय उत्तर प्रदेश की सबसे हाईप्रोफाइल सीट में शुमार हो गई है. एक तरफ कांग्रेसी दिग्गज रहीं विधायक रीता बहुगुणा जोशी इस बार भाजपा से उम्मीदवार हैं, वहीं दूसरी तरफ सपा ने मुलायम  सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव को मैदान में उतार दिया है.

कैंट की सीट में कांग्रेस और भाजपा में ही सीधी टक्कर देखने को मिलती आई है. ऐसे में एक तरफ रीता जोशी भाजपा से और दूसरी तरफ सपा कांग्रेस गठबंधन के साथ अपर्णा यादव उन्हें चुनौती देती नजर आएंगी. यानी मुकाबला बेहद कड़ा होने जा रहा है.

2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी के तौर पर रीता जोशी ने बड़ा उलटफेर करते हुए तीन बार के ​भाजपा विधायक सुरेश चंद्र तिवारी को मात दी थी. उन्होंने कुल 63,052 वोट हासिल किए, जबकि सुरेश तिवारी महज 41,299 वोट ही हासिल कर सके. वहीं बसपा के नवीन चंद्र द्विवेदी 28,851 वोट के साथ तीसरे और सपा के सुरेश चौहान 22,544 वोट लेकर चौथे स्थान पर रहे थे.

अटल की अगुआई में भाजपा ने कांग्रेस से छीनी थी ये सीट

कैंट सीट के इतिहा​स पर नजर डालें तो 1957 से कांग्रेस ने इस सीट पर अपना कब्जा कर रखा था लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने यहां 1991 में कांग्रेस से सीट छीन ली और 2007 तक ये सिलसिला जारी रहा. 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से रीता बहुगुणा जोशी ने ये सीट वापस कांग्रेस की झोली में डाल दी.

1991 में अटल पहली बार लखनऊ से सांसद बने. उसके बाद राजधानी की सीटों पर भाजपा ने कब्जा करना शुरू कर दिया. पहली बार यहां से सतीश भाटिया ने जीत हासिल की, 1993 में वह दोबारा चुनाव जीतकर विधनसभा पहुंचे. 1996 के बाद भाजपा से सुरेश चंद्र तिवारी लगातार सीट जीतते रहे.

कैंट विधानसभा क्षेत्र में लखनऊ नगर निगम के 16 वार्ड आते हैं. इसके प्रमुख क्षेत्रों में कैंट, सदर बाजार, आलमबाग, कृष्णानगर, चारबाग, मवैया, नाका, तेलीबाग प्रमुख हैं.
करीब साढ़े तीन लाख वोटर वाले इस क्षेत्र में टक्कर हमेशा से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही रही है.

रीता, अपर्णा के बीच उत्तराखंड फैक्टर अहम भूमिका में

इस क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाता की चुनावों में अहम भूमिका मानी जाती है. रीता जोशी ने पिछले चुनाव में यहां के सिंधी और पहाड़ी वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित किया, वहीं ब्राह्मण वोट बैंक में भी सेंध लगाई. अब मुलायम की बहू अपर्णा यादव उनके खिलाफ मैदान में हैं, अपर्णा भी मूल रूप से उत्तराखंड की ही हैं, लिहाजा रीता जोशी के लिए ये बड़ी चुनौती होगी.  रीता जोशी इस बार भाजपा से हैं. वोटिंग प्रतिशत की बात करें तो पिछले चुनाव में भाजपा को 25.51 फीसदी वोट मिले थे, वहीं कांग्रेस को 38.95 और सपा को 13.93 प्रतिशत वोट मिले थे.

खास बात ये है कि अपर्णा यादव वैसे तो सपा से चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन कांग्रेस से गठबंधन होने के बाद वोटिंग प्रतिशत के लिहाज से ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है.
दोनों ही नेता क्षेत्र में काफी सक्रिय रहती हैं. रीता जोशी लगातार क्षेत्र की समस्याओं को लेकर दौरे करती रही हैं, वहीं अपर्णा यादव करीब दो साल से इस क्षेत्र से चुनावी  तैयारियों में जुटी हैं.

सात बार कांग्रेस और पांच बार भाजपा ने दर्ज की जीत

कैंट से अब तक जीते प्रत्याशियों की बात करें तो  1957 में कांग्रेस से श्याम मनोहर मिश्रा, 1962 में कांग्रेस से बालक राम वैश्य, 1967 में निर्दलीय बीपी अवस्थी, 1969 में भारतीय क्रांति दल से सच्चिदानंद, 1974 में कांग्रेस  से चरण सिंह, 1977 में जनता पार्टी से कृष्णकांत मिश्रा, 1980, 1985 और 1989 में कांग्रेस से प्रेमवती तिवारी, 1991 और 1993 में भाजपा से सतीश भाटिया, 1996, 2002, 2007 में सुरेश चंद्र तिवारी, 2012 में काांग्रेस से  रीता बहुगुणा जोशी.

 

 

Tags: Aparna Yadav, BJP, Congress, Rita bahuguna joshi, लखनऊ

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