मधुर भंडारकर की पेज-3 की तरह है मुजफ्फरपुर बालिका गृह सेक्स स्कैंडल की कहानी

सांकेतिक चित्र
सांकेतिक चित्र

बिहार के मुज़फ्फरपुर प्रकरण के सामने आने के बाद सुशासन बाबू को ये कहने में हफ्ता लग गया कि वो घटना पर शर्मिंदा हैं. वैसे मंजू वर्मा और ब्रजेश ठाकुर का ख्याल खूब रखा जा रहा है.

  • Share this:
देवरिया और मुज़फ्फरपुर की कलंक कथा सामने आने के बाद ऐसा लग रहा है मानो मधुर भंडारकर की कोई फिल्म चल रही है. फिल्म पेज -3- मिसेज थापर एक चाइल्ड होम चलाती हैं, लेकिन एक दिन वो खुदकुशी कर लेती हैं.

खुदकुशी इसलिए क्योंकि उन्हें पता चल जाता है कि उनका पति अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उसी आश्रम के बच्चों का यौन शोषण करता है----(वो अलग बात है कि एक पत्रकार इस खबर को कवर करती है, लेकिन खबर कैसे दबती है, वो भी फिल्म में बखूबी दिखाया गया है)

फिल्म-चांदनी बार –चांदनी बार में रेड पड़ती है, सभी बार डांसर्स को पुलिस ले जाती है, क्योंकि बार के संचालक ने पुलिस को पैसे नहीं पहुंचाए होते हैं, हालांकि जो पुलिस वाला गायकवाड़ रेड मारता है,  वह भी अपनी सुविधा के अनुसार बार की लड़कियों को अपने पास बुलाता है. (यानि सबके सब हमाम में नंगे हैं, क्योंकि बार में स्टूडेंट, लेक्चरर, नेता, पुलिस वाले, गुंडे, भाईगिरी करने वाले सब पहुंचते हैं)



ज़रा सोचिए, शेल्टर होम में कौन सी बच्चियां रहती हैं- गरीब बेसहारा, मजबूर, बेबस लाचार, किस्मत की मारी, अभागन- अरे शब्दों की कमी पड़ जाएगी, उन मासूम बच्चियों को परिभाषित करने में...मज़े की बात देखिए कि उन्हीं बच्चियों के नाम पर कैसे कुछ लोग अपनी चांदी काट रहे हैं, मोटा चंदा ले रहे हैं, अपनी हवस मिटा रहे हैं, बच्चियों के बचपन में ज़हर घोल रहे हैं और कोई पूछने वाला नहीं.
जिन बच्चियों को गुड़िया की ड्रेस के रंग-बिरंगे कपड़ों और उसके बाल बनाने में उलझे रहना था, वो ये बता रही है कि कभी सफेद गाड़ी आती है तो कभी लाल और शाम को ले जाती है और अगले दिन सुबह छोड़ती है, जो भी लड़की जाती है वो रोती हुई वापस आती है.

बिहार के मुज़फ्फरपुर प्रकरण के सामने आने के बाद सुशासन बाबू को ये कहने में हफ्ता लग गया कि वो घटना पर शर्मिंदा हैं. वैसे मंजू वर्मा और ब्रजेश ठाकुर का ख्याल खूब रखा जा रहा है. देवरिया के शेल्टर होम से तो 18 लड़कियां गायब हैं, शेल्टर होम अवैध तरीके से चल रहा था, लेकिन उसे चलने दिया गया. डीएम साहब को कई बार शिकायतें मिलींं, लेकिन कार्रवाई नहीं की, वैसे क्यों नहीं की- सोचिएगा? ऐसे ही कई सवाल हैं, जिनके जबाव बेहद ज़रूरी हैं।

अवैध तरीके से शेल्टर होम कैसे चल जाते हैं ?

इन बालिका गृहों को किस आधार पर मोटा फंड दिया जाता है ?

फंड कहां और कैसे खर्च हो रहा है, इसकी मॉनिटरिंग क्यों नहीं होती?

बच्चियां कहां से और कैसे यहां तक पहुंचती हैं?

लड़कियों की तस्करी से तो इनके तार नहीं जुड़े हैं?

शेल्टर होम की आड़ में बच्चियों की आत्माओं को छलनी किया जाता है तो जवाबदेही किसकी है?

कौन होते हैं वो लोग जो लाल और सफेद गाड़ी में बच्चियों को ले जाते हैं?

मोहल्ले के मामूली चोर की ख़बर पुलिस को हो सकती है तो ऐसे शेल्टर होम में क्या हो रहा है पुलिस को कैसे पता नहीं चल पाता ?

विभागीय मंत्री की जवाबदेही क्यों नहीं तय होती ?

एनजीओ की आड़ में महापाप कैसे हो जाते हैं ?

सफेद कॉलर वालों की दोस्ती का फायदा एनजीओ उठाते हैं ?

सिर्फ DM को हटा देने से बच्चियों को इंसाफ मिल जाएगा ?

क्या नेताओं, अधिकारियों, और पुलिकर्मियों की मिलीभगत के बिना ये महापाप संभव है ?

खैर, देवरिया और मुज़फ्फरपुर से मामले सामने आ गए तो आप ये सोचकर खुश होने का गुनाह मत कीजिएगा कि कहीं और ऐसा नहीं हो रहा, सब पाक साफ हो गया है. हो सकता है आप के पड़ोस में ही बच्चियों की जिंदगी में आग लगाई जा रही हो.

वो लाल सफेद गाड़ियां आपके पड़ोस में भी आ रही हों और जाने अंजाने आप इसमें शरीक भी हों...इसलिए अपने स्तर पर आप जो कर सकते हैं, वो कीजिए , इन फूल सी बच्चियों को बचाइए, ये पूजने के लिए हैं, यौन शोषण के लिए कतई नहीं.

​(ज़ीनत सिद्दीकी की कलम से. लेखिका न्यूज 18 यूपी/उत्तराखंड चैनल में एंकर हैं)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज