मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल, मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया
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मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल, मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया
मेरी मौत पर पूरी दुनिया रोएगी पर भारत के लोग मेरी मौत पर एक ऑंसू भी नहीं बहाएंगे!

मेरी मौत पर पूरी दुनिया रोएगी पर भारत के लोग मेरी मौत पर एक ऑंसू भी नहीं बहाएंगे!

  • Pradesh18
  • Last Updated: August 29, 2016, 6:43 PM IST
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हॉकी का जादूगर कहे जाने वाले स्वर्गीय मेजर ध्यानचंद की जयन्ती पर जहाँ आज पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस के रुप में मना रहा है. वहीं गोंडा में जिले भर की 1054 ग्राम पंचायतों में खेल मैदान बनाकर ग्रामीण प्रतिभाओं को तराशने की मुहिम चलाई गयी.

गोंडा महोत्सव समिति के बैनर तले जिला प्रशासन ने ''प्रगति'' खेल कार्यक्रम के माध्यम से गांव के एक लाख से अधिक खेल हुनर को एक साथ जमीन पर उतार दिया. बता दें, कि मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन 1905 ई. को इलाहाबाद में हुआ था.

बाल्यावस्था में उनमें खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे. इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन और संघर्ष के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी.



साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की उम्र में 1922 ई. में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भर्ती हो गए. जब 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट' में भर्ती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी.



ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के ही एक सूबेदार मेजर तिवारी को जाता है. मेजर तिवारी स्वंय भी हॉकी प्रेमी और खिलाड़ी थे. उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे, देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए.

मेरी मौत पर पूरी दुनिया रोएगी पर भारत के लोग मेरी मौत पर एक ऑंसू भी नहीं बहाएंगे!

देश को इतने गौरव और सम्मान दिलाने वाला व्यक्ति 12 दिन बाद एम्स के जनरल वार्ड में तड़प-तड़प कर मर गया.

इस महान खिलाड़ी की उपेक्षाएं उसकी मौत पर ही समाप्त नहीं हुईं, आज उसके सम्मान में हम राष्ट्रीय खेल दिवस मनाते तो हैं पर किसी भी सरकार ने इस महान नायक को 'भारत रत्न' देने का सामर्थ्य नहीं दिखाया.

ध्यानचंद उस दौर में खेलते थे जब भारत गुलाम था और खिलाड़ियों को ना तो सम्मान मिलता था और ना ही पुरस्कार, पर विडम्बना देखिये कि आज भारत आज़ाद है पर आज भी ध्यानचंद को उनका हक़ नहीं मिला.

उनके साथी खिलाड़ियों की बातों से भी यह निराशा दिखाई देती है, उन सभी का कहना है कि ध्यानचंद को सबसे पहले भारत रत्न मिलना चाहिए था.
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