आजम के जेल जाने से खुश है ये अफसर, कहा- मुझे जबरन भेजा था जेल...
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आजम के जेल जाने से खुश है ये अफसर, कहा- मुझे जबरन भेजा था जेल...
27 फरवरी को तड़के आजम खान और उनके परिवार को सीतापुर जेल शिफ्ट किया गया.

यदुवेन्द्र मिश्रा लिखते है ‘कि 26 साल के बाद, समय ने एक बार फिर करवट बदली. वही पुलिस वाले, वही पुलिस की गाड़ी, कुछ वैसी ही रात...वही दिमागी तनाव, सब कुछ एक जैसा ही, फर्क बस इतना कि हम अपनों के लिए शान से सिर उठाकर जेल गए और एक यह हैं कि सर झुकाते हुए दागदार होकर अपने कुनबे के साथ जेल भेजे गए.....

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लखनऊ. फर्जी दस्तावेज के मामले में सपा के कद्दावर नेता आजम खान (Azam khan) को पत्नी और बेटे के साथ जेल भेजे जाने पर उत्तर प्रदेश सचिवालय संघ के एक अफसर ने खुशी जताते हुए अपना दर्द बयां किया है. 1994 में सपा सरकार के दौरान कर्मचारियों के वेतन भत्ते को बढ़ाने के लिये हुई हड़ताल से भड़के आजम के तुगलकी फरमान पर रामपुर जेल भेजे गये उ0प्र0 सचिवालय संघ के अध्यक्ष यदुवेन्द्र मिश्रा ने अब आजम को ही जेल भेज दिये जाने पर न सिर्फ बेहद खुशी जताई है. बल्कि आजम द्वारा खुद के रामपुर जेल में कराये गये उत्पीड़न की दास्तां को अपनी फेसबुक वाल पर शेयर करते हुए मुख्यमंत्री से आजम के साथ भी उसी तरह का सलूक किये जाने की मांग की है.

फेसबुक वाल पर शेयर किया अपना दर्द
उ0प्र0 सचिवालय संघ के अध्यक्ष और खाद्य विभाग के समीक्षा अधिकारी यदुवेन्द्र मिश्रा अपनी फेसबुक वाल (Facebook wall) पर इन लाइनों के साथ आजम के आतंक की दास्तां को साझा करते हुए लिखते है कि 'जो जस करई, सो तस फल पावा.' 'दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय, मरे खाल की सांस सो, सार भसम होई जाय'. 14 दिसंबर 1994 को मुझे गिरफ्तार कर ठण्ड की कड़कड़ाती रात में पुलिस की खुली वैन में लखनऊ से 320 किलोमीटर दूर रामपुर जेल ले जाया गया. इनके कहने पर मुझे 3 बजे रामपुर जेल में बंद किया गया. इनका जुल्म यहीं नहीं थमा, मुझे तन्हाई (4'×7') वाली कोठरी में बंद रखा गया. जेल में खाने के लिए अधपकी जली रोटियां, पानी जैसी दाल, जानवरों के चारे वाली बरसीम का झलरा दिया जाता था. धान के पैरा पर लेटने और खटमल वाले कंबल से रात गुजारने पर मजबूर किया गया. पारिवारिक सदस्यों से मिलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया.’

उ0प्र0 सचिवालय संघ के अध्यक्ष यदुवेन्द्र मिश्रा के मुताबिक ‘हर 15 दिन में रामपुर से लखनऊ कोर्ट में पेशी के लिए पुलिस वाले रात में ही जेल से बाहर निकालते थे. रामपुर पुलिस एक आतंकी की तरह जेल से हाथों में हथकड़ी डाल कर मुझे लखनऊ कोर्ट में पेशी पर लाती थी. कमोबेश हर बार ऐसा ही होता था. इनके जुल्मों की क्या क्या कहानी लिखें. रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी, तत्कालीन जेल सुपरिटेंडेंट, तत्कालीन प्रमुख सचिव, गृह तक इनके इशारों पर प्रताड़ना की कोई कसर नहीं छोड़ते थे. रामपुर जेल में इनके स्थानीय करिंदे जेल सुपरिटेंडेंट को निर्देश देते थे कि हमारे साथ किस तरह का सलूक किया जाए.’
azam khan,facebook
उ0प्र0 सचिवालय संघ के अध्यक्ष और खाद्य विभाग के समीक्षा अधिकारी यदुवेन्द्र मिश्रा ने साझा किया अपना दर्द




यदुवेन्द्र मिश्रा आगे लिखते है ‘कि 26 साल के बाद, समय ने एक बार फिर करवट बदली. वही पुलिस वाले, वही पुलिस की गाड़ी, कुछ वैसी ही रात. 240 किलोमीटर की यात्रा में वही दिमागी तनाव. सब कुछ एक जैसा ही. फर्क बस इतना कि हम अपनों के लिए शान से सिर उठाकर जेल गए और एक यह हैं कि सर झुकाते हुए दागदार होकर अपने कुनबे के साथ जेल भेजे गए. बदले परिवेश और 1994 की प्रदेश व्यापी हड़ताल में पीड़ा के शिकार कर्मचारियों/कर्मचारी नेताओं का मुख्यमंत्री जी से अनुरोध है कि इनके साथ भी वही सब किया जाए, जो इन्होंने दूसरों को दुःख पहुंचाने के लिए किया है. इससे जहां सचिवालय सहित राज्य कर्मचारियों के दिलों को सुकून मिलेगा वहीं कर्मचारी जगत से बड़ी दुआएं भी मिलेंगी.’

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