OPINION: प्रियंका गांधी के सामने घरानों से बचकर घर तक जाने की चुनौती

जैसे गांधी-नेहरू का घराना है, यूपी के हर जिले में ठीक वैसा ही कम से कम एक घराना है. विरोधी गुटों में उन्हें चापलूस कहा जाता है लेकिन उनकी मर्जी के बिना कांग्रेस में पत्ता नहीं हिलता.

News18 Uttar Pradesh
Updated: February 13, 2019, 4:01 PM IST
OPINION: प्रियंका गांधी के सामने घरानों से बचकर घर तक जाने की चुनौती
प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)
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Updated: February 13, 2019, 4:01 PM IST
अनिल यादव
लखनऊ में प्रियंका गांधी के रोड-शो में दिखी भीड़ से कांग्रेसी गदगद हैं लेकिन उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इस प्रसन्नता का क्या करें! लंबे समय से पस्त कांग्रेस के लिए जनसमर्थन का आभास एक सांत्वना जैसा है, जिसके सहारे गाजे-बाजे के साथ चुनाव तो लड़ा जा सकता है लेकिन नतीजों के बारे में कोई उम्मीद नहीं पाली जा सकती. प्रसन्नता के अतिरिक्त पछताते हुए पार्टी के नेता कह रहे हैं, ठीक है हमें फ्रंटफुट पर बढ़कर खेलने वाली कप्तान मिल गई है. लेकिन फील्डर, विकेटकीपर, पेसर और गुगलीबाज कहां है? बिना उनके वाकई खेल होगा या पहले की तरह खिलवाड़ में बदल जाएगा, कोई कह नहीं सकता.

प्रियंका गांधी को आधे यूपी का प्रभारी बनाए जाने उर्फ राजनीति में खुलकर आने को खुद कांग्रेसियों ने वैसे नहीं लिया था, जैसा अब जता रहे हैं. यूपी कांग्रेस में साढ़े तीन-चार गुट हैं, जो घर से टिफिन और पान-तम्बाखू लेकर रोज दफ्तर माल एवेन्यू आते हैं. उनके पीछे एक आदमी नहीं है. सिर्फ कड़क कुर्ता और कांग्रेसी दिखने की तमीज है. वे बड़े नेताओं का मैनरिज्म सीख गए हैं, इसलिए अलग-अलग कोनों में बैठकर एक दूसरे को और प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को गरियाते हैं. राजबब्बर 'ऑफ द रिकॉर्ड' पलटकर उनको गरियाते हैं.

इन गुटों की आरंभिक राय थी कि राहुल गांधी ने मोदी जैसे प्रधानमंत्री के खिलाफ लड़ते हुए जो परिपक्वता पाई है, उसका इस्तेमाल कर उन्होंने प्रियंका गांधी के अपने बराबर की नेता बनने की संभावनाओं को हमेशा के लिए निपटा दिया है. अगर सचमुच राजनीति में लॉन्च करना था तो धूमधड़ाके से करते. पहली बार बिना प्रदेश अध्यक्ष को हटाए, उनको यूपी के उस आधे हिस्से का प्रभारी बनाया गया, जहां संगठन और कार्यकर्ता के नाम पर अब कुछ बचा नहीं है. उनका विफल होना तय है. आधा हिस्सा ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया गया है. जिनको यूपी को जानने में कई साल लगेंगे और इस बीच महाराज! महाराज!! का मधुर जाप करके खुर्राट कांग्रेसियों को उनकी मति फेरने में बहुत कम समय लगेगा.

प्रियंका, राहुल, सिंधिया के साथ राजबब्बर




खैर प्रियंका आईं और कांग्रेसियों के गुटों ने परंपरानुसार कंधे से कंधा मिलाकर जयकारा लगाया तो पाया कि भीड़ उतनी ही है जितनी किसी भी मुख्यधारा की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के 'प्रथम लखनऊ आगमन' पर प्रबंधन की क्षमता से जुटाई जाती है. दूसरे यह कि प्रियंका के ग्लैमर और विश्वसनीयता की आधी शक्ति किष्किंधा के मिथकीय राजा बालि की तरह उनके पति राबर्ट वाड्रा खींच चुके हैं. बालि के पास इंद्र का दिया सोने का चमत्कारी हार था, वाड्रा के पास सोने जैसी जमीनें हैं. इसी चमत्कार का कमाल है कि जमीनें हथियाने के लिए किए गए घपलों में जेल भेजने का वादा मोदी ने पिछले चुनाव में किया था लेकिन नहीं भेज पाए.

असल बात भीड़ की बाडी लैंग्वेज और उन अपरिचित, उत्तेजित चेहरों में थी जिन्हें कांग्रेस ने नहीं बुलाया था. फिर भी वे प्रियंका को टीवी पर हजार बार देखने के बावजूद एक बार सामने से देखने आए थे.
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सपा-बसपा के गठबगंधन के बाद, राहुल गांधी को अगले लोकसभा चुनाव में यूपी के जन्नत की हकीकत का बखूबी पता है इसलिए वे कह रहे हैं कि प्रियंका उनकी मदद करने और अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति बेहतर करने आई हैं. लोकसभा चुनाव के बाद ही प्रियंका की विफलता का डंका न बजने लगे, यह उसे रोकने का पेशबंदी है. प्रियंका ने हर लोकसभा क्षेत्र के बीस कार्यकर्ताओं से मिलकर हालचाल लेना शुरू किया है. लेकिन उनकी कामयाबी एक बहुत बड़े 'अगर' और एक 'मगर' पर निर्भर है.

अगर प्रियंका गांधी फीडबैक लेने के बाद, मोदी और योगी की सरकारों के खिलाफ लड़ने के लिए लखनऊ, अयोध्या, इलाहाबाद, बनारस, गोरखपुर, कानपुर की सड़कों पर उतरती हैं तो शहरी मध्यवर्ग और सवर्ण जातियों के युवा कांग्रेस की तरफ खिंचेंगे. राममंदिर के नाम पर अनंत काल तक टरकाने की राजनीति के साथ ही यह तबका यूपी की खराब कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक अराजकता से सबसे अधिक त्रस्त है. पिछले चुनाव में मोदी की विकासपुरुष छवि और भारत को विश्वगुरु बनाने के दावों से मोहभंग के बाद इस तबके को संभालने वाला भाजपा में कोई नहीं है. जैसे सरकार में मंत्रियों-विधायकों तक की नहीं सुनी जा रही है, इस तबके की भी सुनने वाला पार्टी में कोई नहीं है. लेकिन वे अपने आप प्रियंका तक नहीं आएंगे, उन्हें ही इन युवा वोटरों तक पहुंचना होगा.

प्रियंका और राहुल गांधी


भाजपा के खिलाफ लड़ते दिखने का दूसरा फायदा यह होगा कि यूपी के कुछ हिस्सों में मुसलमान कांग्रेस की तरफ लौट सकता है. मॉब लिंचिंग और गाय के नाम पर अत्याचार से मुसलमान डरा हुआ है. वह टीवी और अखबारों में दिखने वाली चमकीली तस्वीरों की कच्ची गारंटी पर अपना वोट बर्बाद नहीं करेगा. अगर उसे यकीन हो गया कि प्रियंका को राजनीति में टिकना है, तभी वह सपा-बसपा के गठबंधन से इतर कुछ सोचेगा.

मगर का फैक्टर अगर से बुनियादी है और कांग्रेस की पुरानी बीमारी से जुड़ा हुआ है. कार्यकर्ता होने चाहिए मगर राहुल गांधी के जमाने वाले नहीं. प्रियंका को कांग्रेस के जमींनी कार्यकर्ताओं तक पहुंचने का रास्ता खोजना होगा. याद करना जरूरी है कि पिछले लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने यूपी में नए नेता-कार्यकर्ता खोजने के लिए बहुप्रचारित टैलेंट हंट चलाया था. जो इंटरव्यू हुए उसके बाद, पुराने कांग्रेस नेताओं के चिकने-अंग्रेजी बोलने वाले-लैपटापधारी बेटे बेटियां संगठन में जितनी तेजी से आए उतनी ही तेजी से गायब भी हो गए.

जैसे गांधी-नेहरू का घराना है, यूपी के हर जिले में ठीक वैसा ही कम से कम एक घराना है. विरोधी गुटों में उन्हें चापलूस कहा जाता है लेकिन उनकी मर्जी के बिना कांग्रेस में पत्ता नहीं हिलता. इन घरानों से बचकर कार्यकर्ता के पास जाना ही प्रियंका की चुनौती है.

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