Opinion: BJP ही नहीं 'आंख दिखा रहे दोस्तों' के लिए भी कांग्रेस का जवाब हैं प्रियंका

राजनैतिक सूत्रों की मानें तो प्रियंका की सक्रिय उपस्थिति के बाद अब यूपी में बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन दोनों को ही अपनी रणनीति में खासा बदलाव करना होगा.

Sunil Bazari | News18Hindi
Updated: January 24, 2019, 1:36 PM IST
Opinion: BJP ही नहीं 'आंख दिखा रहे दोस्तों' के लिए भी कांग्रेस का जवाब हैं प्रियंका
प्रियंका गांधी (File Photo)
Sunil Bazari | News18Hindi
Updated: January 24, 2019, 1:36 PM IST
प्रियंका गांधी वाड्रा ने आखिरकार औपचारिक रूप से अपनी राजनैतिक पारी का आगाज़ कर ही दिया. आगाज़ इसलिए भी क्योंकि ये 2019 के बहुप्रतिक्षित चुनावों से पहले होने वाली सबसे बड़ी घटना है. 2019 के चुनावों के लिए ये कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक है. उनका आना तय था, केवल घोषणा होनी बाकी थी, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने के मायने क्या हैं? इस एक सवाल के जवाब में बहुत से जवाब छिपे हैं.

कांग्रेस के लिए:
कांग्रेस के बारे में लोग 'बूढ़ी कांग्रेस' और 'युवाओं की कांग्रेस' जैसे शब्दों का ज़िक्र करते हैं. काफी हद तक ये सही भी है. मीडिया के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राहुल गांधी के कांग्रेस संभालने के साथ ही पुरानी कांग्रेस कहीं नेपथ्य में चली गई है, ये दिखता भी है. पुराने ओहदेदारों की जगह युवा चेहरों को मौका दिया जा रहा है. ऐसे में प्रियंका गांधी युवाओं की कांग्रेस से दूर होते दिख रहे उन चेहरों के लिए उम्मीद का सबब हैं, जो उनमें इन्दिरा गांधी की झलक देखते हैं. निश्चित रूप से उनके आने से कांग्रेस में उत्साह का संचार होगा.

आंखें दिखा रहे पुराने दोस्तों के लिए:

चुनावी राजनीति में दोस्तों का आशय उन सहयोगी दलों से होता है जो एक-एक सीट के लिए सौदेबाजी करते हैं, जब तब अपनी मांगों की तलवार ताने रहते हैं. पिछले दिनों सपा और बसपा ने लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर कांग्रेस को ऐसी ही दोस्ती का नज़ारा दिखाया था. यही कुछ बाकी दूसरे दोस्त भी कर रहे हैं. उन सभी के लिए साफ संकेत है कि कांग्रेस को कमजोर ना समझें. संदेश साफ है, दोस्ती चाहिए लेकिन किसी दबाव में आकर तो कतई नहीं.

सत्ता पक्ष के लिए:
बीजेपी के लिए मैसेज बहुत साफ है, लड़ाई कांटे की होगी. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के कुछ नेताओं ने इसे केवल परिवारवाद बताया. यहां बीजेपी से राजनैतिक शुचिता की अपेक्षा थी, अकसर मैदान में आने वाले नए खिलाड़ी का गर्मजोशी से स्वागत किया जाता है, लेकिन ये हो ना सका.
उम्मीद है कि बीजेपी इसे अपने रिएक्शन से ज्यादा गम्भीरता से लेगी. राजनैतिक सूत्रों की मानें तो प्रियंका की सक्रिय उपस्थिति के बाद अब यूपी में बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन दोनों को ही अपनी रणनीति में खासा बदलाव करना होगा.

खुद अपने लिए:
राजनीति में औपचारिक प्रवेश की घोषणा के साथ ही प्रियंका ने अपने लिए बड़ा कैनवास तैयार कर लिया है. जाहिर सी बात है कि अब उनकी भूमिका अमेठी, रायबरेली और कुछेक फैसलों तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यूपी और पूरा देश उनका कैनवास होगा.

मुद्दों के लिए:
प्रियंका मुखर हैं, और ये बात उन्होंने समय-समय पर साबित भी की है. गाय, गांधी और मन्दिर के देश में जब राष्ट्रवाद और असहिष्णुता जैसे मुद्दे अक्सर चर्चा में रहते हैं, ऐसे में प्रियंका की मौजूदगी कांग्रेस के लिए यकीनन मददगार ही साबित होगी.

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