Opinion: क्या 2022 चुनाव में सत्ता की चाभी ब्राह्मणों के हाथों में होगी?
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Opinion: क्या 2022 चुनाव में सत्ता की चाभी ब्राह्मणों के हाथों में होगी?
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर ब्राह्मण कार्ड खेलने की तैयारी में कांग्रेस (विधानसभा-फाइल तस्वीर)

कांग्रेस के युवा ब्राह्मण नेता अंशू अवस्थी काफी आक्रामक नजर आ रहे हैं. बातचीत में कहते हैं कि 'योगी सरकार में 150 ब्राह्मणों की हत्या हो चुकी है. जिनको न्याय दिलाना हमारी जिम्मेदारी है'. अगर इतिहास पर नजर डालें तो यूपी की राजनति में एक समय ब्राह्मणों का ऐसा दबदबा था कि प्रदेश में कोई भी सरकार उनके ही जोर से बनती थी.

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लखनऊ. आजादी के बाद से यूपी के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो अब तक यहां बने 21 मुख्यमंत्रियों (Chief Ministers of UP) में से सर्वाधिक 6 मुख्यमंत्री ब्राह्मण जाति से ही आए और ये सभी कांग्रेस (Congress) के थे. इन मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर नजर डालें तो लगभग ढ़ाई दशक तक कमान ब्राह्मणों के हाथ में रही. यूपी की राजनति में एक समय ब्राह्मणों का ऐसा दबदबा था कि प्रदेश में कोई भी सरकार उनके ही जोर से बनती थी. लेकिन  मंडल और कमंडल की राजनीति ने ब्राह्मणों को दूर फेंक दिया.

कांग्रेस का ब्राह्मण कार्ड!
शायद यही कारण है कि कांग्रेस की नजर एक बार फिर ब्राह्मणों पर है. कांग्रेस में पुराने नेताओं का दौर लगभग खत्म हो गया है. पार्टी की कोशिश है कि धीरे-धीरे नए ब्राह्मणों को जोड़ा जाए. इसीलिए कांग्रेस ने ब्राम्हण चेतना परिषद के माध्यम से जितिन प्रसाद (Jitin Prasad) को मैदान में उतारने का मन बनाया है. सावन मास की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए जितिन प्रसाद ने 6 जुलाई को परिषद के हवाले से एक पत्र जारी कर लिखा, “वर्तमान सरकार में ब्राह्मण समाज के दर्जनों लोगों की हत्याएं एवं उन पर जानलेवा हमले हुए हैं. समाज के लोगों को न्याय नहीं मिला बल्कि वि‍भि‍न्न मामलों में सरकार में शामिल लोगों ने उल्टे अन्याय करने वालों को ही संरक्षण दिया है. जिस कारण समाज के लोग प्रदेश में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. मैंने समय-समय पर समाज को न्याय दिलाने के प्रयास जारी रखे हैं. अब इस बात की आवश्यकता है कि हम सभी आपसी मतभेद भुला दें तभी खोए हुए गौरव को प्राप्त कर सकते हैं. इसके लिए आवश्यक है कि हम सभी अपने सुझाव एक दूसरे से साझा करें, समस्याओं को जानें और उनके निराकरण के लिए सामूहिक प्रयास करें."

परशुराम के बहाने ब्राह्मण वोट बैंक साधने की कवायद
इन दिनों कांग्रेस के युवा ब्राह्मण नेता अंशू अवस्थी काफी आक्रामक नजर आ रहे हैं. बातचीत में कहते हैं कि 'योगी सरकार में 150 ब्राह्मणों की हत्या हो चुकी है. जिनको न्याय दिलाना हमारी जिम्मेदारी है. वे कहते हैं ब्रह्म चेतना संवाद एक शुरुआत है. हम जल्द ही लोगों को जोड़ेंगे और न्याय की लड़ाई लड़ेंगे'. ब्राह्मणों को लेकर सबसे कम चहलकदमी पार्टी में सपा दिखा रही है. ब्राह्मण नेता संतोष पांडेय कहते हैं कि 'ऐसा नहीं है जहां भी ब्राह्मणों के साथ सामाजिक और प्रशासनिक अत्याचार होता है हम खुद आर्थिक और कानूनी मदद को तैयार रहते हैं. बस्ती का मामला हो या महाराष्ट्र के पालघर (Palghar case) का मामला हमने तुरंत आर्थिक मदद दी है. संतोष पांडेय कहते हैं कि हमने ब्राह्मणों की सहायता के लिए चिरंजीवि परशुराम चेतना पीठ बनाई है, जिसका कार्यालय लखनऊ में होगा, उसकी शुरुआत हम 10 जुलाई से करेंगे.' इसके साथ ही आगरा एक्सप्रेस-वे पर 108 फीट की मूर्ति लगाने की भी योजना है. वो कहते हैं कि परशुराम की चरणपादुका के साथ हम ब्राह्मणों के बीच जाएंगे'. पूर्व एमएलए संतोष पांडेय भी योगी सरकार के साथ पीएम मोदी (PM Modi) पर भी हमलावर हैं. वे कहते हैं कि 'परशुराम जयंती (Parashuram Jayanti) के मौके पर पीएम ने मन की बात (Man Ki Baat) की लेकिन एक बार भी परशुराम जयंती पर नहीं बोला. हम लोगों ने अभियान चलाया तो देर शाम 6.56 मिनट पर ट्वीट (Tweet) कर परशुराम जयंती की बधाई दी. वे कहते हैं कि इससे साफ है कि सत्ताधारी पार्टी ने केवल वोट लिया लेकिन पऱेशान ब्राह्मणों के लिए इनके पास संवेदना के शब्द भी नहीं है'.



बसपा ने भी खेला था ब्राह्मण कार्ड
तिलक-तराजू और तलवार का नारा देने वाली बसपा (BSP) ने तीन बार सत्ता हासिल करने के बाद भी इस वर्ग की वोटिंग ताकत से अपने आपको बचा नहीं पाई. उसने 2007 के विधानसभा चुनाव में नारा भी बदल दिया. 'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा और हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा, विष्णु,महेश है’ हो गया. यह प्रयोग यूपी के इतिहास का सबसे सफल माना जाता है. दलितों की पार्टी कही जाने वाली बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा के बिना पार्टी पूरी ही नहीं होती है. बीजेपी में भी कभी माधवप्रसाद त्रिपाठी, कलराज मिश्र, मुरलीमनोहर जोशी, केशरीनाथ त्रिपाठी, ब्रह्मदत्त द्वेदी जैसे नेता हुआ करते थे, जिससे ब्राह्मण जुड़ा हुआ महसूस करता था. 2014 से ब्राह्मण बीजेपी का वोटर हो गया है, लेकिन 2022 में कांग्रेस की इस पर निगाह पड़ रही है.

भाजपा भी ब्राह्मण वोट बैंक को नाराज करने के मूड में नहीं
भाजपा भी ब्राह्मण वोट बैंक की महत्ता ही थी कि 2019 के चुनाव से पहले संतकबीर नगर की एक समीक्षा बैठक में संत कबीर नगर के सांसद और आरएसएस-भाजपा (RSS-BJP) के वरिष्ठ नेता रमापति राम त्रिपाठी के बेटे शरद त्रिपाठी ने हिंदू युवा वाहिनी से जुड़े और सीएम योगी के नजदीकी माने जाने वाले क्षत्रिय जाति के मेहदावल से विधायक राकेश बघेल को भरी सभा में जूते मार दिए. इस मामले को पार्टी ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 जुलाई को यूपी के कार्यकर्ताओं के संबोधन के दौरान दलित आदिवासी पिछड़ों के सांसदों की संख्या गिनाई, लेकिन ब्राह्मणों की नहीं गिनाई, जिससे ब्राह्मण कार्यकर्ता कुछ निराश भी हुए. लेकिन बीजेपी ब्राह्मणों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को बिल्कुल गलत बताती है. बीजेपी नेता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि हमारे नेता और हमारी पार्टी का सिद्धांत समग्र विकास है, कुछ लोग जाति-वर्ग और क्षेत्र में लोगों को बांटकर सियासत करने के आदी हैं. जिस वर्ग की लोग बात कर रहे हैं वो समाज का पथ-प्रदर्शक है, समाज को जोड़ने और संजोने का दायित्व भी उसपर है. जहां तक भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांत सवाल है सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास पाने के लिए काम करती है. हम हर परिस्थिति में जनता के साथ खड़े रहने वाले लोग हैं, बांटने की सियासत नहीं करते हैं. हमारे लिए राष्ट्रहित प्रथम है और वो हमेशा रहेगा.

समाजशास्त्री राजेश मिश्र कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति को कोई दरकिनार कर ही नहीं सकता. 2022 के विधानसभा चुनाव में नये समीकरण सामने आ सकते हैं. इसमें कांग्रेस काफी एक्टिव दिख रही है. लगभग 12-14 फीसदी ब्राह्मण वोट को संभालकर रखना हर राजनीतिक दल के लिए एक चुनौती है. फिलहाल वो बीजेपी के पास है. वे 2007, 12 और 17 की विधानसभा चुनाव की चर्चा करते हुए कहते हैं कि ब्राह्मण का झुकाव जिधर रहा सरकार उसकी बनी. वे कहते हैं कि 2007 में सतीश चंद्र मिश्रा ने ब्राह्मणों को बसपा से जोड़ा. वहीं 2012 में ब्राह्मण बसपा से नाराज हुआ तो समाजवादी पार्टी में अभिषेक मिश्र, संतोष पांडेय, मनोज पांडेय जैसे ब्राह्मण नेताओं की सक्रियता का फायदा मिला. सपा सरकार से नाराज ब्राह्मण मोदी प्रभाव में बीजेपी के पास आ गया जो अभी तक साथ में है. वे 2009 का चुनाव भी याद करते हैं और कहते हैं कि बसपा से ब्राह्मणों की नाराजगी ही थी जिससे कांग्रेस को रीता बहुगुणा जोशी की अध्यक्षता में 21 सीटें मिलीं.

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लगभग तीस सालों से कांग्रेस सत्ता से दूर है ऐसे में सोची-समझी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है और परिस्थितियां ऐसी ही चलती रहीं तो सूबे में नए समीकरण सामने आ सकते हैं. वे कहते हैं इस समय उच्च जातियों की राजनीति चल रही है और जातियों की स्पर्धा सभी उच्च जातियां हमेशा एक साथ नहीं रह सकतीं, असाधारण परिस्थितियों की बात अलग होगी.
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