UP News: 2022 विधानसभा चुनाव से पहले क्या है राजनीतिक पार्टियों का गेम प्लान? पढ़े- आगे पीछे कौन

2022 विधानसभा चुनाव से पहले क्या है राजनीतिक पार्टियों का गेम प्लान? (File photo)

2022 विधानसभा चुनाव से पहले क्या है राजनीतिक पार्टियों का गेम प्लान? (File photo)

बसपा (BSP) अकेले चुनाव लड़ने के लिए जानी जाती है. एक दो बार को छोड़ दिया जाये तो उसने चुनाव से पहले कोई राजनीतिक साझेदारी कभी नहीं की.

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लखनऊ. यूपी में विधानसभा 2022 के चुनाव अभी भले ही एक साल दूर हों लेकिन, राजनीतिक समीकरणों का बनना-बिगड़ना शुरु हो गया है. सत्तारूढ़ दल भाजपा (BJP) और बसपा (BSP) में तो अभी कोई खास हलचल नहीं दिखाई दे रही है लेकिन, सपा और कांग्रेस ने भरपूर तेजी पकड़ ली है. लगभग रोज ही दोनों पार्टियों के बड़े नेता दौरे कर रहे हैं. दूसरी पार्टियों से आये नेताओं को ज्वाइन करा रहे हैं. साथ ही नए-नए साथी भी तलाश किए जा रहे हैं. लेकिन, बात सिर्फ इतने से नहीं बनेगी. इस बार के चुनाव में मुद्दे भी बदल जाएंगे. अगले साल फरवरी-मार्च में यूपी विधानसभा के चुनाव होंगे. ऐसे में पार्टियों ने नफे-नुकसान को देखते हुए नए पार्टनर तलाशने शुरू कर दिए हैं.

अखिलेश यादव का गेम प्लान किसान आंदोलन से उपजे विरोध को हाथों-हाथ लेते दिखाई दे रहे हैं. जाहिर है किसानों से जुड़ी पार्टियों की ओर उनका झुकाव अभी से दिखाई दे रहा है. यही वजह है कि पश्चिमी यूपी में भी अपनी साख गंवा चुकी राष्ट्रीय लोक दल को अखिलेश यादव लपके हुए हैं. किसान आंदोलन से पैदा हुए नए राजनीतिक समीकरणों के चलते उन्हें लगता है कि रालोद अपने बड़े वोटबैंक को मोबलाइज कर सकती है. इसके अलावा राकेश टिकैत पर भी उनकी नज़र है. किसानों को साधने के बाद अखिलेश यादव की नजर अन्य पिछड़ा वर्गों के वोटबैंक पर भी है. अधर, केशव देव मार्या की पार्टी महान दल कुशवाहा, मौर्य, सैनी और शाक्य जातियों के बीच पॉपुलर है.

राजनीतिक दोस्तों की तलाश

प्रियंका गांधी का गेम प्लान वैसे तो कांग्रेस भी राजनीतिक दोस्तों की तलाश में है लेकिन, उसे भी कुछ छोटे दलों का ही साथ मिल सकता है. प्रियंका गांधी ने भी किसान पंचायतों में हिस्सेदारी की है. लिहाजा किसान नेताओं से जुड़े दलों को कांग्रेस साथ ले सकती है. इसके अलावा पूर्वांचल में निषादों पर प्रियंका गांधी की तगड़ी नजर है. वे गंगा के किनारे बसे गांवों से होते हुए गंगा यात्रा निकाल चुकी हैं. जाहिर है निषाद समाज के कुछ प्रतिनिधियों को कांग्रेस चुनाव से पहले जोड़ेगी.
इस चुनाव से पहले भाजपा ने ओबीसी वोटों को साधने के लिए बड़ी तैयारी की थी. न सिर्फ दूसरे दलों के ओबीसी नेताओं को अपने साथ लिया बल्कि ओबीसी समुदाय से आने वाले केशव मोर्या को डिप्टी सीएम तक बनाया. इन्हीं वोटों को बटोरने के लिए भाजपा ने अपना दल को साथ रखा है. पार्टी ने सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर का भी साथ लिया था लेकिन, इस चुनाव के आते आते समीकरण काफी बदल गये हैं. भाजपा ने अपनी पार्टी के भीतर ही ओबीसी समुदाय के नेताओं को बड़ा बना दिया है. उसे बैशाखी की फिलहाल कोई जरूरत नजर नहीं आ रही है.

दलित-मुस्लिम गठजोड़ का फार्मूला

बसपा अकेले चुनाव लड़ने के लिए जानी जाती है. एक दो बार को छोड़ दिया जाए तो उसने चुनाव से पहले कोई राजनीतिक साझेदारी कभी नहीं की. इसी ढ़र्रे पर इस बार भी पार्टी आगे बढ़ रही है. हालांकि ये चर्चा तेजी से उपर आयी है कि यदि असुद्दीन ओवैसी से मायावती का गठबंधन हो जाये तो दलित-मुस्लिम गठजोड़ का फार्मूला चल सकता है लेकिन, ये सिर्फ चर्चा में है. इस दिशा में धरातल में कुछ नहीं दिखाई दे रहा है.



टर्निंग पॉइंट की भूमिका में ओवैसी- केजरीवाल

छोटे दलों को ऐसा लग रहा है कि बड़ी पार्टियों के पीछे चलने वाले छोटे दलों ने भी इस बार अलग राह चुनने की सोची है. ये सभी के सभी एक साथ मिल जायें तो बड़ी पार्टियों के पसीने छुड़ा सकते हैं. ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी और चन्द्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी साथ हो जायें तो बड़ी पार्टियों का सारा समीकरण गड़बड़ा जायेगा. असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी ताल ठोक रही है. जाहिर है इस बार के चुनाव में लड़ाई दिलचस्प होगी लेकिन, उससे भी ज्यादा दिलचस्प कहानी लिखी जाएगी अनोखे गठबंधनों पर.
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