फूलपुर ने लोहिया, कांशीराम से लेकर योगी तक को दिया सबक

फूलपुर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस लोकसभा सीट पर कोई अपना अधिकार नहीं जता सकता. यहां वोटर कभी भी नेता को सबक सिखा सकता है. ये उलटफेर कोई नया नहीं है.

Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 5:39 PM IST
फूलपुर ने लोहिया, कांशीराम से लेकर योगी तक को दिया सबक
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (File Photo)
Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 5:39 PM IST
9 साल के इंतजार के बाद आखिरकार फूलपुर लोकसभा एक बार फिर समाजवादी पार्टी के कब्जे में आ गई. यहां बसपा समर्थित सपा प्रत्याशी नागेंद्र सिंह पटेल ने बीजेपी के कौशलेंद्र सिंह पटेल को करीब 60 हजार मतों से मात दी. उधर बीजेपी के लिए यह जीत बड़ी चोट है. कारण ये है कि 2014 में पहली बार केशव मौर्य की अ​गुवाई में पार्टी ने यहां से कमल खिलाया था. फूलपुर में हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा कि सपा और बसपा के एक साथ आ जाने से ये हार हुई है. उन्होंने कहा कि हम हार की समीक्षा करेंगे और भविष्य की रणनीति बनाएंगे. उन्होंने कहा कि इस हार को 2019 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.

जाहिर बीजेपी के लिए फूलपुर की हार किसी बड़े सबक से कम नहीं है. बीजेपी ने पहली बार ये चुनाव सीएम योगी की अगुवाई में लड़ा. सीएम योगी ने कहा कि जनता ने जो फैसला दिया है, उसे हम स्वीकार करते हैं. हमारे लिए ये परिणाम अप्रत्याशित हैं. हम जल्द ही इसकी समीक्षा करेंगे. सीएम ने इस दौरान विजयी प्रत्याशियों को बधाई दी. साथ ही कहा कि प्रदेश के अंदर राजनीतिक सौदेबाजी का जो दौर शुरू हुआ है, उसे हम रोकने का प्रयास करेंगे. योगी ने कहा कि उपचुनाव में लोकल मुद्दे हावी हो जाते हैं. हमारे लिए दोनों ही चुनाव सबक हैं. इसकी समीक्षा होनी चाहिए. ताकि भविष्य में हम बेहर प्रदर्शन कर सकें.

बहरहाल, फूलपुर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस लोकसभा सीट पर कोई अपना अधिकार नहीं जता सकता. यहां वोटर कभी भी नेता को सबक सिखा सकता है. फूलपुर के लिए ये उलटफेर कोई नया नहीं है. यह सीट 62 साल तक कांग्रेसियों और समाजवादियों की गढ़ रही. लेकिन यहां से समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जैसे दिग्गज भी चुनाव हार चुके हैं.

वैसे वर्ष 1971 तक फूलपुर पर कांग्रेस का कब्जा रहा. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फूलपुर से हैट्रिक लगाई. लेकिन धीरे-धीरे इस सीट पर समाजवादियों ने वर्चस्व कायम कर लिया. पहले जनता पार्टी फिर समाजवादी पार्टी ने इस सीट से संसद तक का सफर तय किया.

क्या है राजनीतिक इतिहास

इतिहास देखें तो 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में पंडित नेहरू ने इस पर विजय हासिल की. फिर 1957 और 1962 के लोकसभा चुनाव में भी वही जीते. इस दौरान 1962 में डॉ. राम मनोहर लोहिया खुद जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़े, लेकिन वे हार गए. 1964 में नेहरू के निधन के बाद यहां उपचुनाव हुआ. जिसमें उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को जनता ने जिताया. विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ 1967 के चुनाव में समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र खड़े हुए. लेकिन जनता ने उन्हें हरा दिया. वर्ष 1969 में विजय लक्ष्मी ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद सांसद पद से इस्तीफा दे दिया.

इस्तीफे के बाद हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने नेहरू के सहयोगी रहे केशवदेव मालवीय को उतारा लेकिन इस बार संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले लड़े समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र ने उन्हें कांग्रेस से ये सीट छीन ली. 1971 में फूलपुर ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को संसद भेजा, जो आगे चलकर प्रधानमंत्री बने. आपातकाल के दौर में 1977 में हुए आम चुनाव में जनता पार्टी की कमला बहुगुणा ने यह सीट कांग्रेस से छीनी. कांग्रेस ने यहां से रामपूजन पटेल को उतारा. नेहरू के बाद इस सीट पर सिर्फ रामपूजन पटेल ही हैट्रिक लगाई. उन्होंने 1984 (कांग्रेस), 1989 और 1991 (जनता दल) में जीत हासिल की.

1996 से 2004 तक हुए चार लोकसभा चुनावों में यहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का कब्जा रहा. इस दौरान 1996 में यहां से बीएसपी के संस्थापक कांशीराम चुनाव में खड़े हुए, लेकिन वह सपा के जंग बहादुर सिंह पटेल से 16021 वोट से हार गए. सपा ने 2004 में यहां से बाहुबली अतीक अहमद को मैदान में उतारा और वह चुनाव जीत गए.

बहुजन समाज पार्टी के कपिल मुनि करवरिया ने इस सीट पर कांशीराम की हार का बदला 2009 के चुनाव में ले लिया. जवाहरलाल नेहरू, पंडित विजय लक्ष्मी पंडित, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कमला बहुगुणा की राजनैतिक जमीन पर 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने पहली बार भगवा लहराया. जबकि राम मंदिर लहर में भी उसे इस सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी.
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Updated: June 24, 2018 04:47 PM ISTपासपोर्ट विवाद की पूरी कहानी, 'चश्मदीद' कुलदीप सिंह की जुबानी
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