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UP Politics: BSP को क्यों आई 'ब्राह्मण' की याद? 2012 विधानसभा चुनाव से क्या है कनेक्शन

उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले बसपा ने खेला बड़ा दांव.

उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले बसपा ने खेला बड़ा दांव.

UP Assembly Election 2022: उत्तर प्रदेश (UP Chunav) में सियासी जोर आजमाइश के बीच एक बार फिर मायावती (Mayawati) की बसपा (BSP) ने ब्राह्मण कार्ड खोलने की कोशिश की है. अब सवाल ये उठता है कि चुनाव से पहले पार्टी के दांव के पीछे की असल वजह क्या है? वरिष्ठ पत्रकार रतन मणिलाल ने बताए सियासी समीकरण.

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों (UP Assembly Election) में बहुत ज्यादा समय नहीं बचा है. ऐसे में कोई भी राजनीतिक पार्टी अपना कोई भी पैंतरा खाली नहीं छोड़ना चाहती है. इसी कड़ी में यूपी की सियासत में लम्बे समय से हाशिए पर चल रह बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी अपनी डूबती हुई नाव को पार लगाने की कोशिशें कर रही है. इस सियासी जोर आजमाइश में बसपा अपने 2007 के दलित-ब्राह्मण कार्ड को एक बार फिर से खेलने की तैयारी में है. इसकी शुरूआत आज से अयोध्या से की गई है. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने प्रबुद्ध वर्ग विचार गोष्ठी की शुरूआत की है.



हालांकि पहले इस कार्यक्रम को ब्राह्मण सम्मेलन के तौर पर किया जाना था. लेकिन अंतिम समय में इस कार्यक्रम का नाम बदल कर प्रबुद्ध वर्ग विचार गोष्ठी रखा गया. ये गोष्ठी 23 से 29 जुलाई तक अलग-अलग ज़िलों में होगी. 23 को अयोध्या से शुरू होने के बाद 24-25 को अम्बेडकर नगर, 26 को इलाहाबाद, 27 को कौशाम्बी, 28 को प्रतापगढ़ और 29 को सुल्तानपुर में कार्यक्रम रखा गया है.

बसपा को ब्राह्मण की याद क्यों आई

बसपा को एक बार फिर क्यों ब्राह्मण की याद क्यों आई, इस बात का जवाब तलाशने के लिए आपको 2012 के विधानसभा चुनावों को याद करना होगा कि कैसे 2012 के चुनावों में हार के बाद बसपा को इस बात का एहसास होने लगा था कि उस दौर में कैसे उनका दलित और सर्व समाज का चुनावी कार्ड  एक्सपायर होने लगा था. यही वजह रही कि 2012 के चुनावों में बसपा की करारी हार हुई. वरिष्ठ पत्रकार रतन मणिलाल कहतें हैं कि दलित और सर्व समाज के चुनावी कार्ड के साथ-साथ 2012 के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के विधायक और मंत्रियों के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी चुनाव हारने में बसपा के लिए एक बड़ा कारण रहा. रतन मणि कहतें हैं कि हालांकि बसपा की सरकार इससे पहले चार बार बनी थी. उनके पास सरकार बनाने का पूरा मौका भी था, लेकिन वह चुनाव हार गई. उसके बाद से ही बहुजन समाज पार्टी में एक राजनीतिक दिशाहीनता नजर आने लगी थी. बसपा को इस बात की बड़ी कन्फ्यूजन रही कि वह दलितों के साथ चलें या नया एक्यूशन ढूंढें या फिर ब्राह्मणों को फिर से इकट्ठा करें.
उस समय 2012-13 में ब्राह्मणों के खिलाफ बहुजन समाज पार्टी में ही दलितों की तरफ से आवाज उठने लगी थी कि दलित नेताओं के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी के दलित मूवमेंट को ब्राह्मणों ने हाईजैक कर लिया जिस कारण बसपा कमजोर पड़ी थी.



लेकिन समय बीतने के साथ 2013-14 के चुनावों के समय नरेंद्र मोदी की लहर आने के बाद बसपा लगातार राजनीतिक हाशिए पर गिरती चली गई. 2014 के लोकसभा चुनाव 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में बसपा की करारी शिकस्त ने मायावती को राजनीतिक हाशिए पर ला खड़ा किया. एक समय ऐसा आया कि मायावती को बीजेपी के साथ खड़े होकर ये दिखाना पड़ा कि वो इनडायरेक्टली बीजेपी के फेवर में हैं. राजनीतिक तौर पर बसपा का खड़ा होना वक्त की मजबूरी भी थी की. बसपा को ऐसा लगता था कि बीजेपी का वह दलित वोट बैंक,जो कभी बहुजन समाज पार्टी का बड़ा वोट बैंक था, वह वापस बीएपी की तरफ लौटेगा. लेकिन क्या दलित वोट बैंक बसपा की तरफ वापस लौटेगा?  इस पर तो अभी प्रश्न चिन्ह बाकि है.
ब्राह्मणों को बीएसपी से जोड़ने से सबसे बड़ा कारण ये भी है कि शुरुआत में बसपा ने दलित और ब्राह्मणों के साथ सत्ता की कुंजी पाई और उसके बाद दलित ब्राह्मण और मुसलमानों की एकजुटता से बसपा ने सत्ता का स्वाद चखा. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों पर अगर आप नजर डालेंगे तो बहुजन समाज पार्टी ने 80 सीटों पर होने वाले चुनावों में एक बड़ी संख्या में मुसलमानों को टिकट दिया था.  चुनावों के बाद मायावती को भी इस बात का एहसास होने लगा है कि उनसे खिसका हुआ मुस्लिम वोट बैंक अब वापस उनकी तरफ नहीं लौटेगा और शायद इसीलिए वहां पर ब्राह्मणों को रिझाने में वो दोबारा जुट गई हैं.

क्या बसपा को होगा फायदा?

बसपा को ऐसा लगता है कि हिंदू वर्ग में केवल ब्राह्मण समाज ही उनको वोट करेगा. ओबीसी और कायस्थ और ठाकुरों का साथ कभी भी बसपा के लिए फायदे का सौदा नहीं रहा.  वरिष्ठ पत्रकार रतन मणिलाल कहतें हैं कि आपको याद होगा कि बसपा सरकार में कभी ठाकुर वर्ग को तवज्जो नहीं मिली. इसी तरह बनिया कम्युनिटी को भी मायावती ने ज्यादा तवज्जो नहीं दिया. इसका उदाहारण राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल का सियासी ग्राफ भी बसपा में कभी बहुत मजबूत नहीं रहा. ठीक इसी तरह कायस्थ समाज को भी बसपा में कभी तवज्जो नहीं मिली. हिंदू कम्युनिटी की बात जब भी बसपा में उठती है तो केवल इन्हें ब्राह्मण वर्ग ही नजर आता है और क्योंकि ब्राह्मण कल्चरल ट्रेडीशन की वजह से मंदिरों से पंडिताई से और पुजारियों से जुड़ा रहता है. इसलिए अयोध्या से एक धार्मिक कार्ड के जरिए बसपा अपनी एजेंडे को शुरू कर रही है. (वरिष्ठ पत्रकार रतन मणिलाल से बातचीत पर आधारित)

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