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ANALYSIS: क्या यूपी में बीजेपी का 'खेल' बिगाड़ पाएंगी प्रियंका गांधी?
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Updated: January 25, 2019, 1:00 PM IST
ANALYSIS: क्या यूपी में बीजेपी का 'खेल' बिगाड़ पाएंगी प्रियंका गांधी?
प्रियंका गांधी और राहुल गांधी (PTI)

प्रियंका गांधी को सीधे मोदी-योगी की जोड़ी से लोहा लेना होगा, जिनकी लोकप्रियता के दम पर पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पूरे पूर्वी यूपी में बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की थी.

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  • Last Updated: January 25, 2019, 1:00 PM IST
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(विरेंद्रनाथ भट्ट)

लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र प्रियंका गांधी की राजनीतिक पारी में ऑफिशियल एंट्री के बाद सियासी बयानबाजी जारी है. बुधवार को अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पहुंचे राहुल गांधी को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हाल में हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में शानदार जीत की बधाई दी. जवाब में राहुल गांधी ने उनसे कहा कि वह उत्तर प्रदेश में भी जीत के लिए दवा लेकर आए हैं. इसके कुछ देर बाद ही दिल्ली में प्रियंका गांधी को पार्टी का महासचिव बनाने और पूर्वी यूपी की जिम्मेदारी सौंपने की घोषणा हुई. वहीं, ज्योतिरादित्य सिंधिया को महासचिव पद के साथ-साथ पश्चिमी यूपी का प्रभार दिया गया.

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पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों ने भी हाईकमान के इस फैसले का खुलकर स्वागत किया. यूपी कांग्रेस कमिटी के महासचिव अशोक सिंह ने कहा, 'सही वक्त पर सही निर्णय लिया गया है.'



दरअसल, लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन के बाद कांग्रेस का यूपी की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान करना मौजूदा वक्त के हिसाब से साहसी भरा कदम है. हो सकता है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस का ये साहसिक कदम राजनीतिक वास्तविकता में तब्दील हो जाए.


अगर बात करें यूपी के सीटों की, तो पूर्वी यूपी में 47 जिलें आते हैं और कम से कम तीन दर्जन लोकसभा सीटें इस क्षेत्र में पड़ती हैं. 2014 के चुनाव में यहां की आजमगढ़, अमेठी, रायबरेली और कन्नौज सीट को छोड़कर बाकी सभी सीटें बीजेपी और उसकी सहयोगी अपना दल ने जीती हैं.

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यूपी में 12 जनवरी को बसपा-सपा ने कांग्रेस के बिना गठबंधन का ऐलान किया था. तब कांग्रेस ने इसपर प्रतिक्रिया देते हए कहा, 'बसपा-सपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों ने आखिर में वही किया, जो बीजेपी शुरू से चाहती थी. दोनों पार्टियां सत्ताधारी पार्टी के बनाए जाल में फंस ही गए.'

कांग्रेस का कहना था कि बीजेपी हमेशा से चाहती थी कि 2019 के चुनाव होने तक राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में लोकतांत्रिक पार्टियां अलग-थलग ही रहे. ताकि उसका वोट बैंक बिखर न जाए. बीजेपी की ये कोशिश सफल होती भी दिख रही है. कांग्रेस का यह भी कहना था कि वह इस चुनाव में यूपी की सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी. पार्टी के मुताबिक, बसपा-सपा के गठबंधन से कोई फर्क नहीं पड़ता. कांग्रेस पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी.

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प्रियंका गांधी को पूर्वी यूपी का ही प्रभार देने का फैसला भी खास रणनीति के तहत किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी हो या फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इलाका गोरखपुर या फिर मुलायम सिंह यादव का संसदीय क्षेत्र आजमगढ. ये सभी इलाके पूर्वी यूपी में ही आते हैं. यानी प्रियंका गांधी को सीधे मोदी-योगी की जोड़ी से लोहा लेना होगा, जिनकी लोकप्रियता के दम पर पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पूरे पूर्वी यूपी में बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की थी. ऐसे में देखने वाली बात होगी की क्या 2019 के रण में प्रियंका गांधी यूपी में बीजेपी का खेल बिगाड़ पाएंगी?'

हाथ जोड़कर लोगों का अभिनंदन करती प्रियंका गांधी
हाथ जोड़कर लोगों का अभिनंदन करती प्रियंका गांधी


समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद और पूर्व में कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रह चुके बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, 'राजनीति में प्रियंका गांधी की एंट्री से बसपा-सपा गठबंधन को थोड़ा बहुत झटका तो लग सकता है. यूपी में अब 2019 की लड़ाई त्रिकोणीय होने की संभावना है, जो किसी ने किसी रूप में बीजेपी को फायदा ही पहुंचा सकती है.'

समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद और पूर्व में कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रह चुके बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, 'राजनीति में प्रियंका गांधी की एंट्री से बसपा-सपा गठबंधन को थोड़ा बहुत झटका तो लग सकता है. यूपी में अब 2019 की लड़ाई त्रिकोणीय होने की संभावना है, जो किसी ने किसी रूप में बीजेपी को फायदा ही पहुंचा सकती है.'


समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद और पूर्व में कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रह चुके बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, 'राजनीति में प्रियंका गांधी की एंट्री से बसपा-सपा गठबंधन को थोड़ा बहुत झटका तो लग सकता है. यूपी में अब 2019 की लड़ाई त्रिकोणीय होने की संभावना है, जो किसी ने किसी रूप में बीजेपी को फायदा ही पहुंचा सकती है.'

राहुल गांधी से बात करती हुईं प्रियंका गांधी


बेनी प्रसाद वर्मा ने यह भी कहा, 'कांग्रेस में इस जबरन एंट्री से पशोपेश (दुविधा) की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. क्योंकि पार्टी के मुस्लिम वोटर्स के पास पहले से बीजेपी, बीएसपी और समाजवादी पार्टी का ऑप्शन है.'

वहीं, बसपा के पूर्व सांसद ने नाम ना जाहिर करने की शर्त पर बताया, 'अगर बीजेपी को हराना है तो सपा-बसपा नेताओं को अभी भी गठबंधन में कांग्रेस को सम्मानपूर्वक लाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए.'

वह कहते हैं, 'अगर ऐसा हुआ, तो यूपी में बीजेपी की आगे की राह बंद हो सकती है. साथ ही हम चुनाव में बीजेपी के नंबर को सिंगल डिजिट में ही रोक सकते हैं. इसे आप 2017 के यूपी चुनाव से समझ सकते हैं. 2017 का यूपी चुनाव बेंचमार्क है. क्योंकि चुनाव में अलायंस प्लस कांग्रेस का वोट शेयर 52.08% था. जबकि बीजेपी के सिर्फ 39.67% वोट शेयर थे.

हालांकि, पर्यवेक्षकों का कहना है कि 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस को छह सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था, इनमें से कई सीटें पार्टी ने 2004 के चुनाव में जीती थीं. लेकिन, 2009 के चुनाव में पार्टी केवल रायबरेली, अमेठी और कानपुर सीट ही बरकरार रख पाई.

लेकिन, प्रियंका गांधी के आने के बाद मुस्लिम मतों को लेकर एसपी-बीएसपी की परेशानी बढ़ सकती है. इसमें कोई शक नहीं है कि इस वक्त मुस्लिम मतदाताओं के सामने एसपी-बीएसपी के गठबंधन के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है. लेकिन, कांग्रेस की तरफ से मैदान में प्रियंका की एंट्री एक बार फिर उनके अंदर काफी हद तक हलचल को बढ़ाने वाली होगी. कांग्रेस के साथ अगर मुस्लिम मतदाताओं का रुझान हो गया तो फिर आने वाले दिनों में एसपी-बीएसपी को नुकसान हो सकता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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First published: January 24, 2019, 8:36 PM IST
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