सियासत में नई नहीं हैं प्रियंका, बस गुजरने भर से कांग्रेस की झोली में आ गई थी यह सीट!

यूपीए की सरकार में रायबरेली और अमेठी से जुड़े लोगों का काम दिल्ली में प्रियंका ही देखती थीं. इन दोनों इलाकों के लोगों की बात करें तो अभी भी ये लोग सोनिया गांधी और राहुल की बजाय प्रियंका को अपने ज्यादा करीब मानते हैं.

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: January 23, 2019, 2:28 PM IST
सियासत में नई नहीं हैं प्रियंका, बस गुजरने भर से कांग्रेस की झोली में आ गई थी यह सीट!
प्रियंका गांधी
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: January 23, 2019, 2:28 PM IST
प्रियंका गांधी की राजनीति में अधिकारिक तौर पर एंट्री भले ही आज हुई हो, लेकिन उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति के लिए प्रियंका कोई नया चेहरा नहीं हैं. उत्तर प्रदेश से प्रियंका को राजनीति में लाने की मांग लगातार उठती रही हैं. कई बार कांग्रेस के बड़े नेता भी तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने की मांग कर चुके हैं. बात करें उत्तर प्रदेश की तो प्रदेश की राजनीति के लिए प्रियंका का चेहर नया नहीं है, ख़ास तौर पर रायबरेली और अमेठी के लिए.

1999 में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने अमेठी पहुंची तो उनके साथ प्रियंका और राहुल दोनों थे. आम लोगों को ये अंदाजा उसी दिन लग गया था कि गांधी परिवार के ये दोनों वारिश राजनीतिक में जरूर आएंगे. कुछ लोग जहां प्रियंका गांधी को कांग्रेस क राजनीति में आगे लाने की बात करे रहे थे तो कुछ राहुल गांधी में कांग्रेस का भविष्य देख रहे थे लेकिन 2004 में जब सोनिया गांधी परंपरागत अमेठी सीट राहुल को देकर खुद रायबरेली रुख किया तो एक बात साफ हो गई कि गांधी परिवार के असली वारिस राहुल गांधी हैं.

इसके बाद प्रियंका गांधी की जिम्मेदारियां कम होने की बजाय और बढ़ गई. जैसे-जैसे मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी राजनीति की सीढ़ी आगे चढ़ते गए प्रियंका ने रायबरेली और अमेठी की जमीन पर वो सभी जिम्मेदारियां निभाईं, जो इन दोनों को निभानी चाहिए. 2004 और 2014 के लोकसभा चुनावों में जब सोनिया गांधी और राहुल गांधी देश भर में कांग्रेस के लिए रैलियां कर रहे थे, तब प्रियंका चुपचाप अमेठी और रायबरेली में जमीन पर काम कर रही थी. 2014 के चुनावों में जब आम आदमी पार्टी ने कुमार विश्वास और बीजेपी ने स्मृति ईरानी के बहाने राहुल गांधी को अमेठी में घेरने की कोशिश की तो प्रियंका का ही करिश्मा रहा जो ये सीट बच पाई. रायबरेली और अमेठी की ऐसी बहुत कम तस्वीरें मिलेगी, जिसमें प्रियंका का चेहरा नहीं हो.

यूपीए की सरकार में रायबरेली और अमेठी से जुड़े लोगों का काम दिल्ली में प्रियंका ही देखती थीं. इन दोनों इलाकों के लोगों की बात करें तो अभी भी ये लोग सोनिया गांधी और राहुल की बजाय प्रियंका को अपने ज्यादा करीब मानते हैं. इसके पीछ प्रियंका गांधी का रायबरेली और अमेठी में ज्यादा वक्त देना ही अकेला कारण नहीं है. प्रियंका के लोगों से मिलने का अंदाजा, बात करने का तरिका, किसी गरीब बच्चे को अपनी गोद में बिना झिझक उठा लेना, ये बहुत सारी तस्वीरें है जो प्रियंका को आम लोगों से जोड़ती हैं.

प्रियंका रायबरेली और अमेठी को छोड़ 2009 के आम चुनावों में पहली बार बाराबंकी गईं थी. प्रियंका के बाराबंकी से गुजरने मात्र से ये सीट कांग्रेस की झोली में आ गई क्योंकि 2009 को छोड़कर 1984 के बाद कांग्रेस ये सीट कभी नहीं जीत पाई थी.
उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों में प्रियंका गांधी पहली बार रायबरेली और अमेठी के साथ-साथ पार्टी के दायरे से भी बाहर निकलीं. एक समय जब ऐसा लग रहा था कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हो पाएगा तो प्रियंका गांधी ने अखिलेश यादव से बात कर गठबंधन पर अंतिम मुहर लगाई.

प्रियंका की हैसियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी ने अपने प्रचार वाहनों में अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव और डिंपल यादव के साथ-साथ राहुल और प्रियंका की तस्वरी भी लगाई थी. ऐसे में कांग्रेस के कुछ नेता अब ये भी उम्मीद करने लगे हैं कि प्रियंका के आने के बाद हो सकता है कि एसपी-बीएसपी कांग्रेस के साथ गठबंधन की शर्तों पर दुबारा विचार करने को मजबूर हो जाएंगे.

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First published: January 23, 2019, 2:08 PM IST
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