सवर्ण आरक्षण का UP पर पड़ेगा बड़ा असर, लोकसभा की ये 40 सीटें हो सकती हैं गेम चेंजर

चुनावों के लिहाज से देखा जाए तो सवर्ण आरक्षण के लाभ का असर यूपी में काफी देखा जा सकता है. अकेले यूपी में करीब 40 सीटें ऐसी हैं, जहां सवर्ण वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: January 8, 2019, 6:07 PM IST
सवर्ण आरक्षण का UP पर पड़ेगा बड़ा असर, लोकसभा की ये 40 सीटें हो सकती हैं गेम चेंजर
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Ajayendra Rajan
Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: January 8, 2019, 6:07 PM IST
लोकसभा चुनाव से ऐन पहले केंद्र सरकार द्वारा सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण के फैसले से देश की सियासत 360 डिग्री घूमती दिख रही है. इस बीच बात उत्तर प्रदेश की करें तो इस फैसले का सीधा असर यूपी की राजनीति पर पड़ेगा. कहा ये भी जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में यूपी एक बार फिर केंद्र की सत्ता तक पहुंचने की चाबी साबित होगा.

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वजह ये है कि सवर्ण आरक्षण के फैसले का सबसे ज्यादा असर यूपी में ही देखने को मिलेगा, क्योंकि 80 में से 40 सीटों पर सवर्ण मतदाता सीधे-सीधे निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. उधर विपक्षी दलों का कहना है कि वह फैसले का स्वागत तो करते हैं, लेकिन इसे सियासत से प्रेरित भी करार दे रहे हैं. दरअसल हाल ही में संपन्न हुए तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों बीजेपी की हार की वजह को सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी से जोड़ा गया है.

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उधर बीजेपी को भी जो फीडबैक मिला, उसमें पता चला कि सवर्ण मतदाताओं ने नोटा को प्राथमिकता दी. उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपनी फीडबैक में सरकार को बताया कि एससी एसटी एक्ट संशोधन के कदम के बाद सवर्णों में नाराजगी है, जिसे दूर करना अति आवश्यक है. ध्यान देने की बात यह है कि बीजेपी के लिए सवर्ण मतदाता काफी अहम रहा है, क्योंकि पार्टी की जीत हो या हार, उसे मिलने वाले मतों में 50 प्रतिशत योगदान सवर्ण मतदाताओं का ही रहा है.

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चुनावों के लिहाज से देखा जाए तो सवर्ण आरक्षण के लाभ का यूपी में काफी असर देखा जा सकता है. अकेले यूपी में करीब 40 सीटें ऐसी हैं, जहां सवर्ण वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. खास बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 71 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेपी को इन 40 में से 37 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी की बम्पर जीत के पीछे सवर्ण मतदाताओं का अहम हाथ रहा. 2018 के विधानसभा चुनाव में 1980 के बाद से सबसे ज्यादा बीजेपी एमएलए सवर्ण वर्ग के जीते. यूपी विधानसभा में इनका प्रतिशत 44.3 है, जो 2012 की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है.
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सीटों पर वोटों के ताने-बाने पर गौर करें तो यूपी के कुशीनगर, गोरखपुर, संतकबीर नगर, देवरिया, भदोई, वाराणसी, अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर, लखीमपुर खीरी, प्रतापगढ़, बहराइच, बाराबंकी, गोंडा, रायबरेली, अमेठी में सवर्ण जातियों का सीधा असर राजनीति पर दिखता है.

उदाहरण के लिए कांग्रेस के गढ़ अमेठी को देखें तो यहां सवर्ण मतदाताओं की संख्या करीब 4 लाख है. इसमें सबसे ज्यादा 1.89 लाख ब्राह्मण, 1.37 क्षत्रिय और करीब 60 हजार कायस्थ, वैश्य और जैन की आबादी है.

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दरअसल यूपी में कुल मतदाताओं का 25-28% हिस्सा अगड़ी जातियों का है, जिसमें ब्राह्मण सबसे अधिक हैं. ये आंकड़ा मोटे तौर पर करीब 15 फीसदी माना जाता है. इसके बाद करीब 4 से 5 प्रतिशत क्षत्रिय मतदाता माने जाते हैं. आंकड़ों के अनुसार बीजेपी को हर चुनाव में 50 प्रतिशत से अधिक वोट सवर्ण मतदाता के मिलते आए हैं. 2014 के आम चुनाव में यह आंकड़ा 80 फीसदी तक पहुंच गया था.

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