जानिए क्यों निधन से पहले रघुवंश प्रसाद सिंह ने दिया था इस्तीफा? कहीं ये वजह तो नहीं
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जानिए क्यों निधन से पहले रघुवंश प्रसाद सिंह ने दिया था इस्तीफा? कहीं ये वजह तो नहीं
देश में गरीबों के लिए सफल योजना मानी जाने वाली मनरेगा को लागू करवाने में रघुवंश बाबू का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए—1 सरकार में ग्रामीण व विकास मंत्री रहे रघुवंश बाबू ने ये योजना देशभर में लागू करवाई थी. (फाइल फोटो)

Raghuvansh Prasad Singh RIP: लालू यादव (Lalu Prasad Yadav) के जेल जाने के बाद RJD का नया नेतृत्व अपने बुजुर्ग और अनुभवी नेता रघुवंश बाबू को दरकिनार करता चला गया, जिसकी परिणति कुछ दिन पहले उनके इस्तीफे के रूप में सामने आई थी.

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  • Last Updated: September 13, 2020, 2:27 PM IST
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लखनऊ/पटना. पूर्व केंद्रीय मंत्री और बिहार के दिग्गज नेता रहे डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh Prasad Singh Death) का रविवार को दिल्ली स्थित एम्स (AIIMS) में निधन हो गया. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के करीबी नेताओं में से एक रघुवंश बाबू ने कुछ दिन पहले ही पार्टी से इस्तीफा देकर प्रदेश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया था. उनके जाने के बाद एक किस्सा हमेशा सुर्ख़ियों में रहेगा, वो है रघुवंश बाबू और रामा किशोर सिंह उर्फ रामा सिंह के बीच की तल्खियां. माना जा रहा है कि दोनों की बीच की तल्खियां ही उनके इस्तीफे की एक अहम वजह रही. 90 के दशक में शुरू हुई इस वर्चस्व की लड़ाई में आखिरी कील उस वक्त पड़ी जब 2014 के लोकसभा चुनाव में रामा सिंह ने लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर वैशाली से रघुवंश बाबू को हरा दिया.

रघुवंश बाबू और राम सिंह के बीच की दूरियां
दरअसल, रघुवंश बाबू राजनीति में बाहुबलियों के प्रवेश से कभी भी खुश नहीं थे. लेकिन 90 के दशक में जिस तरह से रामा सिंह ने मालदा से गोरखपुर तक रेलवे के टेंडर में अपना हाथ डाला, तभी से यह विवाद शुरू हुआ. लालू यादव के जेल जाने के बाद पार्टी में अंदरखाने ये सवाल हमेशा उठते रहे कि आरजेडी में रामा सिंह की चलेगी या रघुवंश बाबू की. क्योंकि खबर आ गई थी कि रामा सिंह आरजेडी में शामिल होने जा रहे हैं. इससे दुखी रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस्तीफा दिया. महज 38 शब्दों के लिखे पत्र में 32 वर्षों के साथ छोड़ने का कारण तो उन्होंने नहीं बताया, लेकिन उनकी नाराजगी की कई वजहें थीं, जो बिहार के सियासी गलियारों को जानने-समझने वाले सभी लोगों को पता है. इसकी एक वजह वोट बैंक भी था. दोनों ही राजपूत बिरादरी से हैं और वोट बैंक में सेंध नहीं चाहते थे. लेकिन तेजस्वी यादव की रामा सिंह से नजदीकियां प्रोफ़ेसर साहब को नागवार गुजरी.

2019 के बाद ही इस्तीफे की लिख दी गई थी पटकथा
रघुवंश बाबू के इस्तीफे की वैसे तो कई और वजहें भी हैं. जानकारों की मानें तो रघुवंश बाबू के 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त और तेजस्वी यादव के कमान संभालते ही इसकी पटकथा लिखी जा चुकी थी. बिहार में पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा जोरों पर थी कि तेजस्वी यादव, रामा सिंह को आरजेडी में लाने वाले हैं. रघुवंश बाबू ने इसका विरोध किया, लेकिन आग में घी का काम कर गया वह बयान, जिसमें रामा सिंह ने साफ कह दिया था कि उनकी आरजेडी में एंट्री तय है और उन्हें कोई रोक नहीं सकता है. रामा सिंह ने रघुवंश प्रसाद सिंह पर तंज कसते हुए कहा था कि उनका राजद में क्या योगदान है, इसकी मुझे भी पूरी जानकारी है. इन बयानों के बाद भी रामा सिंह के मामले में तेजस्वी यादव की चुप्पी ने रघुवंश सिंह की नाराजगी और बढ़ा दी थी.



राजनीतिक समझ का लाभ नहीं उठा पाया 'नया राजद'
लोकसभा चुनाव 2019 के पहले से ही रघुवंश प्रसाद सिंह अक्सर नीतीश कुमार को महागठबंधन का चेहरा बनाए रखे जाने की तरफदारी करते थे. आरजेडी नेताओं को उनकी ये बातें नागवार गुजरती थीं. नीतीश कुमार को वे तेजस्वी का राजनीतिक गुरु बनवाने की वकालत करते रहे थे. इसकी एक वजह ये भी है कि तेजस्वी यादव का राजनीतिक भविष्य तभी आगे बढ़ेगा, जब वह सीधे तौर पर नीतीश की छत्रछाया से बाहर निकल आएंगे. हालांकि इस बात की गहराई को वे तेजस्वी यादव या अन्य आरजेडी नेताओं को समझा नहीं पाए. इसके साथ ही इस मसले पर लालू यादव की खामोशी भी रघुवंश प्रसाद सिंह की पहल को खारिज करने के लिए काफी थी. राजद का नया नेतृत्व एक बुजुर्ग और अनुभवी नेता की बातों को समझ नहीं पाया, जिसका परिणाम बाद के दिनों में रघुवंश बाबू के इस्तीफे के रूप में सामने आया.
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