OPINION: देश का सियासी भविष्य तय करेगा सपा-बसपा गठबंधन

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन, पूरे देश की राजनीति पर प्रभाव छोड़ने वाला होगा.

News18 Uttar Pradesh
Updated: January 12, 2019, 9:38 PM IST
OPINION: देश का सियासी भविष्य तय करेगा सपा-बसपा गठबंधन
सपा-बसपा गठबंधन के सियासी मायने
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Updated: January 12, 2019, 9:38 PM IST
अमिताभ अग्निहोत्री

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन का असर सिर्फ यूपी ही नहीं आगामी लोकसभा चुनाव में कई राज्यों पर भी पड़ेगा. या यूं कहें कि पूरे देश की राजनीति पर प्रभाव छोड़ने वाला होगा. इसके प्रमुख कारणों को समझें तो पहला कारण ये है कि यूपी में 80 लोकसभा सीटें है. जबकि बिहार में आरजेडी और उपेद्र कुशवाहा की पार्टी का गठबंधन और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू की पार्टी के और कांग्रेस गठबंधन से बड़ा सपा-बसपा का गठबंधन है.

दूसरा कारण ये है कि यूपी में सपा-बसपा के पास वोट शेयर सबसे ज्यादा है. जो दूसरे गठबंधनों के पास नहीं है, क्योंकि यूपी के अलावा बाकी राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है कि करीब 44-45 फीसदी वोट शेयर किसी एक गठबंधन के पास हो. यूपी में वोट शेयर पर नजर डालें तो 2012 में विधानसभा चुनाव, 2014 में लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा के वोट शेयर कभी 40 फीसदी से कम नहीं हुए. हाल ही में यूपी में बीते 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 325 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज की लेकिन इस चुनाव में भी सपा-बसपा का संयुक्त वोट शेयर करीब 45 फीसदी था. इसलिए यूपी में सपा-बसपा के गठबंधन को देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला कहा जा सकता है.

बसपा ने तीन बार गठबंधन का राजनैतिक प्रयोग किया है
उत्तर प्रदेश में बसपा के मुखिया ने पहली बार गठबंधन नहीं किया है. इससे पहले भी बसपा ने तीन बार गठबंधन का राजनैतिक प्रयोग किया है. पहला तब जब बसपा के तत्कालीन प्रमुख कांशीराम, इटावा से 1991 में लोकसभा उपचुनाव जीतकर पहली बार संसद पहुंचे थे. उस वक्त जनता पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने व्यक्तिगत तौर पर कांशीराम के लिए रहने से लेकर प्रचार-प्रसार की भी मदद की थी. बसपा का दूसरा राजनैतिक प्रयोग 1992 में समाजवादी पार्टी के बन जाने के बाद 1993 में हुआ.

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 मुलायम सिंह और कांशी राम की दोस्ती 1993 में परवान चढ़ी
1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद केंद्र सरकार ने बीजेपी की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया था. उसके बाद 1993 में विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ. इटावा में बनी मुलायम सिंह और कांशी राम की दोस्ती परवान चढ़ी 1993 में और बीजेपी को रोकने के लिए नई नवेली समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ किया. इन चुनावों में बसपा ने 164 प्रत्याशी उतारे थे तो सपा ने 256 प्रत्याशी. बसपा ने 67 सीटें जीती जबकि सपा 109 सीटें जीतने में कामयाब रही. भाजपा 177 सीटें ही ले पाई.

बीजेपी के साथ भी गठबंधन का स्वाद चख चुकी है बसपा
उस वक्त बसपा के सहयोग से मुलायम सिंह के नेतृत्व में यूपी सरकार में सरकार बनी. बसपा ने नरसिंम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस के साथ गठबंधन का प्रयोग किया था. वहीं बसपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते बीजेपी से भी गठबंधन का प्रयोग किया था. बसपा ने गठबंधन के जरिए तीन राजनैतिक प्रयोग किए अब ये चौथा प्रयोग हुआ है. लेकिन बसपा के पिछले तीनों प्रयोग की बात करें तो वो अलहदा थे, जो अबकी बार अलग देखने को मिल रही है.

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माया-अखिलेश एक दूसरे के प्रति ज्यादा सहज नजर आ रहे हैं
या यूं कहें कि इस बार के गठबंधन में मजबूती ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती दोनों नेता एक दूसरे प्रति ज्यादा सहज नजर आ रहे हैं. दोनों नेताओं का एक दूसरे को सम्मान देना पिछले गठबंधनों से ज्यादा समावेशी प्रतीत हो रहा है. इसका असर ये हो सकता है कि दोनों पार्टियों के बीच किसी तरह का वैचारिक मतभेद नहीं होगा.

कार्यकर्ताओं के दबाव में करीब आए सपा-बसपा
इस गठबंधन की मजबूती का एक बड़ा कारण ये भी है कि इससे पहले जब भी बसपा ने गठबंधन किया तो टॉप नेतृत्व से गठबंधन किया गया जबकि इस बार दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने दबाव बनाकर गठबंधन करने के लिए राजी किया. क्योंकि गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के उपचुनाव में दोनों पार्टियों ने इस गठबंधन का लिटमस टेस्ट किया था जिसका परिणाम सकारात्मक निकला. इसलिए कार्यकर्ताओं की ओर से दबाव बनाकर बना ये गठबंधन बसपा के बाकी गठबंधनों से अलग है.

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गेस्ट हाउस कांड भूल अखिलेश को क्लीन चिट दे चुकी हैं मायावती
मायावती ने इस गठबंधन को लेकर यहां तक कह दिया है कि ये गठबंधन केवल 2019 लोकसभा चुनाव ही नहीं 2022 के विधानसभा चुनाव और उसके आगे भी जारी रहेगा. बसपा प्रमुख मायावती ने लखनऊ गेस्ट हाउस कांड को भूलाकर अखिलेश यादव को कई अवसरों पर क्लीन चिट दे चुकी हैं. इसलिए अखिलेश यादव भी बसपा प्रमुख मायावती को हर मौकों पर सम्मान देने से नहीं चूकते हैं.

75 फीसदी वोट शेयर पर है नजर
अब सपा-बसपा के गठबंधन को यूपी में सियासी समीकरण की कसौटी पर देखें तो यूपी में दलित, पिछड़े और मुस्लिम को मिलाकर करीब 75 फीसदी वोट शेयर है और ये गठबंधन इन्हीं वर्गों को अपना लक्ष्य बना सकता है. मतलब साफ है सपा-बसपा के गठबंधन ने 2019 की जंग में कूदने के लिए जो मैदान चुना है वो करीब 75 फीसदी का बड़ा मैदान है. रही बात गठबंधन में कांग्रेस की संभावनाओं की, तो मायावती ने साफ कर दिया है अमेठी और रायबरेली के अलावा कोई चांस नहीं है.

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छोटे दलों को भी मिलेगा मौका
हालांकि ये भी संकेत मिल रहे हैं कि गठबंधन और कांग्रेस में रणनीतिक समझौता हो सकता है. क्योंकि 2014 लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस गाजियाबाद, सहारनपुर जैसी 6 सीटों पर दूसरे नंबर थी इसलिए गठंबधन और कांग्रेस में इन सीटों पर भी रणनीतिक समझौता हो सकता है. मायावती ने ये भी संकेत दिए हैं अगर प्रदेश की छोटी पार्टियां सपा-बसपा के गठबंधन में शामिल होना चाहती हैं, तो सपा की 38 सीटों में एक सीटें उन्हे भी दी मिल सकती हैं.

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दूसरी तरफ सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देने के बाद केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी को इस गठबंधन से जीतने के लिए प्रदेश में करीब 51 फीसदी वोट शेयर की जरूरत होगी. क्योंकि 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 39 फीसदी था. यानि 11-12 फीसदी वोट शेयर बीजेपी को बढ़ाना होगा. मतलब साफ है कि 2019 लोकसभा चुनाव में जो बड़ा घमासान होगा उसकी युद्धभूमि उत्तर प्रदेश होगी. क्योंकि सपा-बसपा के गठबंधन के बाद यूपी में जो सियासी बिसात बिछ रही है उससे तो यहीं लगता है कि लोकसभा की सबसे बड़ी रणभूमि उत्तर प्रदेश की ही होने वाली है.
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