गठबंधन से माया को मिली संजीवनी तो मुलायम परिवार की राजनीतिक पकड़ हुई कमजोर

गठबंधन से बीजेपी को 2014 के मुकाबले कुछ सीटों का नुकसान तो हुआ, लेकिन उसे प्रदेश में बड़ी जीत से रोक पाने में असमर्थ रहा.

Rahul Tripathi | News18Hindi
Updated: May 26, 2019, 5:23 PM IST
गठबंधन से माया को मिली संजीवनी तो मुलायम परिवार की राजनीतिक पकड़ हुई कमजोर
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Rahul Tripathi | News18Hindi
Updated: May 26, 2019, 5:23 PM IST
17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव का परिणाम खासतौर पर उत्तर प्रदेश के लिए काफी आश्चर्यजनक रहा है. बीजेपी को शिकस्त देने के लिए दो बड़े क्षेत्रीय दल सपा-बसपा ने गठबंधन किया. लेकिन, चुनाव का परिणाम गठबंधन के उद्देश्य के अनुरूप नहीं रहा. गठबंधन को केवल 15 सीटों पर ही कामयाबी मिल सकी. मायावती की अगुआई वाली बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में 10 सीटें गईं. वहीं, अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी को सिर्फ 5 सीटों से ही संतोष करना पड़ा.

गठबंधन के बावजूद सपा को 5 सीटों पर ही मिली जीत
उत्तर प्रदेश से लोकसभा चुनाव के नतीजे में सपा को गठबंधन का विशेष राजनीतिक लाभ मिलता नजर नहीं आया. क्योंकि 2014 में भी जब प्रचंड मोदी लहर थी, तब भी पार्टी 5 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी. हालांकि, इस बार भी पार्टी पांच सीटें जीतने में कामयाब रही. लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम में यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि मुलायम परिवार की प्रदेश की राजनीति में पकड़ कमजोर हुई है.

मुलायम परिवार अपनी ही सीटों पर हारा

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के पारिवारिक सदस्यों ने ही 5 सीटें जीती थीं. वहीं, इस बार केवल मुलायम और अखिलेश ही जीत पाए. मुलायम परिवार के अन्य सदस्य जीत दर्ज कराने में सफल नहीं हो सके. विशेष रूप से मुलायम सिंह के भतीजे और पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव, पुत्रवधू डिंपल यादव, भाई शिवपाल यादव चुनाव हार गए.

परंपरागत वोटरों का नहीं मिला साथ
गठबंधन के परंपरागत वोटरों के वर्चस्व वाले फिरोजाबाद सीट से सपा उम्मीदवार का हारना आश्चर्यचकित करता है. बता दें कि फिरोजाबाद संसदीय क्षेत्र में यादव वोटरों की संख्या करीब 4.31 लाख है, जबकि बसपा के प्रभाव वाले जाटव वोटरों की संख्या 2.10 लाख और मुसलमान वोटरों की संख्या करीब 1.56 लाख है. इस अंकगणित के अनुसार महागठबंधन के उम्मीदवार अक्षय यादव को यहां से करीब 8 लाख वोट मिलने चाहिए थे, लेकिन उन्हें केवल 4.67 लाख वोट ही मिले.
जमीनी स्तर पर गठबंधन उद्देश्यों से दूर
हालांकि, इस सीट से मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव भी चुनाव मैदान में थे. उनका भी दावा यादव वोटों पर था. शिवपाल को यहां से करीब 92 हजार वोट मिले. फिर भी अक्षय यादव को कम वोट मिलना गठबंधन के उद्देश्य को जमीनी हकीकत से दूर करता है. कहने का अर्थ यह है कि गठबंधन के उम्मीदवार को बसपा के परंपरागत वोट नहीं मिले. ऐसा लगभग उन सभी सीट पर देखने को मिला, जहां गठबंधन से सपा उम्मीदवार मैदान में थे.

गठबंधन से बसपा को मिला राजनीति लाभ
गठबंधन के जरिये बसपा न केवल अपने अस्तित्व को बचाने में कामयाब रही, बल्कि उन 10 सीटों पर जीत दर्ज की जहां वे 2014 के चुनाव में बीजेपी से पराजित हुए थे. गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी. बसपा की यह जीत महागठबंधन के परंपरागत वोटों के कारण ही संभव हो पाई है. यानी सपा के वोटरों का साथ मायावती को तो मिला, लेकिन बसपा के परंपरागत वोटरों ने सपा को समर्थन नहीं दिया.

बीजेपी को रोकने में असफल रहा गठबंधन
ऐसे में गठबंधन के औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है. जिस वोट बैंक को ध्यान में रखकर गठबंधन किया गया उसका जमीन पर असर दिखाई नहीं दिया. ऐसे में बीजेपी को 2014 के मुकाबले कुछ सीटों का तो नुकसान हुआ, लेकिन गठबंधन बीजेपी को प्रदेश में बड़ी जीत से रोकने में असमर्थ रहा. वास्तव में सपा-बसपा और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन केवल नेतृत्व स्तर पर ही रहा, जमीनी स्तर पर दोनों दलों के वोटरों के बीच सहयोग का अभाव इस चुनाव में साफ देखा जा सकता है.

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