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...तो ये है बीजेपी के जूता कांड के पीछे की असली कहानी? इस तरह शुरू हुआ राजनीतिक 'युद्ध'

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: March 7, 2019, 2:16 PM IST
...तो ये है बीजेपी के जूता कांड के पीछे की असली कहानी? इस तरह शुरू हुआ राजनीतिक 'युद्ध'
सांकेतिक तस्वीर

योगी के राजनीति में आते ही उनका पहला आमना-सामना बीजेपी के ब्राह्मण नेतृत्व से हुआ. 2002 के विधानसभा चुनाव में सांसद योगी आदित्यनाथ ने 5 बार के विधायक रहे शिव प्रताप शुक्ला का टिकट कटवाने के लिए पूरा जोर लगा दिया था.

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यूपी के संतकबीर नगर में हुए जूता कांड की गूंज दूर तक सुनाई देगी, क्योंकि इस जूता कांड ने गोरखपुर में दशकों से चली आ रही ठाकुर-ब्राह्मण की राजनीतिक लड़ाई को नई हवा दे दी है. लोकसभा का चुनाव नजदीक है और ये दोनों बीजेपी के कोर वोटर हैं. ऐसे में बीजेपी इस कांड को जल्दी से जल्दी भुलाना चाहेगी, इसकी कोशिशें भी शुरू हो गईं हैं लेकिन क्या इतना आसान है इस आग पर पानी डालना.

अचानक चल पड़ा जूता या बात कोई और थी
जूता चलाने वाले सांसद साहब कह रहे हैं कि वो व्यवहार से ऐसे नहीं है कि जब चाहें जूता निकाल लें. तो क्या जूता चलाने की योजना बनी थी या किसी ने उन्हें उकसा दिया या सांसद के मन में कोई पुरानी बात बैठी थी. इसे जानने के लिए पिटने वाले और पीटने वाले दोनों नेताओं राजनीतिक बैकग्राउंड खंगालते हैं. पहले बात जूता चलाने वाले सांसद शरद त्रिपाठी की, शरद त्रिपाठी पहली बार 2009 में लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन जीत मिली 2014 की मोदी लहर में, शरद त्रिपाठी सांसद तो हो गए लेकिन उनकी राजनीतिक पहचान सांसद से ज्यादा रमापति राम त्रिपाठी का बेटा होने की ही रही और उन्हें टिकट भी उनकी इसी योग्यता पर मिला था. बता दें, रमापति राम त्रिपाठी की गिनती प्रदेश बीजेपी के बड़े नेताओं में होती है.

अब बात करें पिटने वाले विधायक राकेश सिंह बघेल की तो ठाकुर बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले बघेल का संघ से पुराना नाता है. बघेल के पिता का नाम केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के करीबी लोगों में गिना जाता है तो बघेल को उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ख़ास माना जाता है.

गोरखपुर की राजनीति में ठाकुर ब्राह्मण की लड़ाई पुरानी
गोरखपुर की राजनीति में ठाकुर और ब्रह्मणों की लड़ाई पुरानी है. लड़ाई में ठाकुर राजनीति का नेतृत्व हमेशा गोरखनाथ मंदिर के हाथ रहा है. महंत दिग्विजय नाथ और अवैद्यनाथ से होते हुए ये कमान अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों में है. जबकि ब्राह्मण राजनीति अलग-अलग हाथों में रही, कभी ये कमान गोरखपुर के जिलाधिकारी रहे सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के हाथ में रही तो कभी हरिशंकर तिवारी के हाथ में, तो आज कल ये कमान केन्द्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला के हाथ में है. कभी ये कमान सांसद के पिता रमापति राम त्रिपाठी के हाथ में भी रही थी. उस समय योगी और रमापति राम त्रिपाठी कई मुद्दों पर आमने-सामने रहे. (यह भी पढ़ें- जब योगी के मंत्री के सामने BJP विधायक को जूतों से पीटने लगे पार्टी के ही सांसद)

6 दशक से पुरानी है लड़ाई
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गोरखपुर की राजनीति को करीब से जानने वाले वरिष्ट पत्रकार शफी अहमद बताते हैं कि ये ब्राह्मण-ठाकुर की ये लड़ाई 1960 के दशक में शुरू हुई थी जब गोरखनाथ मंदिर की कमान महंत दिग्विजय नाथ के हाथ में थी. जबकि गोरखपुर में सुरति नारायण मणि त्रिपाठी जिलाधिकारी थे, उस समय गोरखपुर विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी जा रही थी, स्थानीय लोगों का मानना है विश्वविद्यालय के लिए जमीन अधिग्रहण और विश्विद्यालय के नाम को लेकर दोनों के बीच ऐसा विवाद हुआ जो आज तक नहीं थमा और धीरे-धीरे ये विवाद ठाकुर और ब्राह्मणों की बीच राजनीतिक विवाद बन गया.

विश्वविद्यालय के नाम को लेकर शुरू हुआ विवाद तब और बढ़ गया जब जिलाधिकारी सुरति नारायण मणि त्रिपाठी स्थानीय नेता और माफिया हरिशंकर तिवारी को संरक्षण देने लगे, बाद में जब मठ की कमान अवैद्यनाथ के पास आई तब तक हरिशंकर तिवारी का कद बड़ा हो चुका था और अब ब्राह्मण राजनीति की बागडोर उनके हाथ में थी. शफी अहमद बताते हैं कि स्थानीय हल्कों में उस समय ये चर्चा जोरों पर थी कि हरिशंकर तिवारी से निपटने के लिए मठ विरेन्द्र शाही के साथ खड़ा रहा है और ये और दौर था जब गोरखपुर में क्राइम रेट सबसे ज्यादा था. (फोटो यहां देखें- योगी के मंत्री के सामने विधायक ने कहा- जूता निकालें, तो सांसद ने उन्हें जूते से जमकर पीटा)

योगी के आने के बाद एक बार फिर हुआ आमना-सामना
योगी के राजनीति में आते ही उनका पहला आमना-सामना बीजेपी के ब्राह्मण नेतृत्व से हुआ. 2002 के विधानसभा चुनाव में सांसद योगी आदित्यनाथ ने 5 बार के विधायक रहे शिव प्रताप शुक्ला का टिकट कटवाने के लिए पूरा जोर लगा दिया. लेकिन जब टिकट नहीं कटवा पाए तो हिंदू महासभा के उम्मीदवार के रुप में राधे मोहनदास अग्रवाल को खड़ा कर शिव प्रताप शुक्ला को चुनाव हरवा दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव में योगी के विरोध के बाद भी बीजेपी ने गोरखपुर के आस-पास कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया और सभी चुनाव भी जीते. लेकिन 2017 में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर में ठाकुर और ब्राह्मण का विवाद और बढ़ गया. जिसमें बीजेपी को नुकसान होता दिखा. पार्टी ने इस नुकसान की भरपाई के लिए गोरखनाथ मठ की परपंरागत सीट से उपेन्द्र शुक्ला को उम्मीदवार बनाया लेकिन वो चुनाव हार गए, दबी जुबान में ये चर्चा भी हुई कि योगी ने उपेन्द्र शुक्ला का साथ नहीं दिया. इस जूता कांड को देश और प्रदेश की राजनीति में चाहे जो असर हो लेकिन गोरखपुर और आस-पास के इलाके की राजनीति में इसे पुराने ब्राह्मण-ठाकुर की राजनीतिक लड़ाई से जोड़कर देखा जा रहा है.

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First published: March 7, 2019, 1:46 PM IST
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