केंद्र और राज्‍य में BJP की सरकार, फिर भी खराब है UP की सेहत

योगी आदित्यनाथ की सरकार जब राज्य में सत्ता में आई थी, तब सरकारी अस्पतालों में 7,000 डॉक्टरों की कमी थी. सरकार का कहना है कि उसने अब तक 2532 नए डॉक्टरों की नियुक्तियां की, लेकिन अभी भी लगभग पांच हजार डॉक्टरों की कमी है.

News18 Uttar Pradesh
Updated: July 14, 2019, 2:26 PM IST
केंद्र और राज्‍य में BJP की सरकार, फिर भी खराब है UP की सेहत
यूपी में 13000 डॉक्टर कार्यरत हैं.
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Updated: July 14, 2019, 2:26 PM IST
उत्तर प्रदेश की केंद्र की सत्ता में धमक भले ही सबसे ऊपर हो, लेकिन सेहत के मामले में यह राज्य देश में सबसे निचले पायदान पर खिसक गया है. जी हां, डॉक्टरों की कमी और प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर कम खर्च राज्य की खराब सेहत के प्रमुख कारण हैं. उत्तर प्रदेश की खराब सेहत का राज नीति आयोग की रिपोर्ट से उजागर हुआ है. आयोग की स्वास्थ्य रिपोर्ट में यूपी को सबसे निचले पायदान पर रखा गया है. जबकि केरल इस सूची में सबसे ऊपर है.

ये कहती है नेशनल हेल्थ प्रोफाइल की रिपोर्ट


नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2015 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में कुल 65,343 डॉक्टर पंजीकृत हैं, जिनमें से 52,274 राज्य में प्रैक्टिस करते हैं. राज्य की आबादी और डॉक्टरों की इस संख्या के अनुसार प्रत्येक डॉक्टर पर 3,812 मरीजों को देखने की जिम्मेदारी है. जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक डॉक्टर के जिम्मे 1000 मरीज होने चाहिए. देश के सबसे अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में लगभग दो लाख डॉक्टरों की जरूरत है.

ऐसा है सरकारी अस्पतालों का हाल

अगर सरकारी अस्पतालों का प्रश्न है, तो यहां बुरा हाल है. राज्य में कुल 18,732 डॉक्टरों के स्वीकृत पद हैं, लेकिन प्रांतीय चिकित्सा संवर्ग (पीएमएस) के अध्यक्ष डॉ. सचिन वैश्य के अनुसार, 'वर्तमान में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मात्र 13 हजार डॉक्टर कार्यरत हैं. जबकि राज्य की बढ़ती आबादी और मरीजों के आंकड़ों के लिहाज से यह संख्या लगभग 45 हजार होनी चाहिए. सरकारी अस्पतालों में न तो डॉक्टर बढ़ाए जा रहे हैं, न सुविधाएं ही. फिर आम जन को बेहतर इलाज कैसे मिलेगा.'

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राज्य में कुल 18,732 डॉक्टरों के स्वीकृत पद हैं.


राज्य में 856 ब्लाक स्तर के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र (सीएचसी) और 3621 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं. जबकि 160 जिला स्तर के अस्पताल हैं. कुल मिलाकर प्रदेश में छोटे-बड़े लगभग 5000 अस्पताल हैं, जिनमें मात्र 13,000 डॉक्टर ही तैनात हैं. जबकि इन अस्पतालों को संभालने के लिए लगभग 45,000 डॉक्टर होने चाहिए.
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सरकार ने उठाया ये कदम
योगी आदित्यनाथ की सरकार जब राज्य में सत्ता में आई थी, तब सरकारी अस्पतालों में 7,000 डॉक्टरों की कमी थी. सरकार का कहना है कि उसने अब तक 2532 नए डॉक्टरों की नियुक्तियां की, लेकिन अभी भी लगभग पांच हजार डॉक्टरों की कमी है. जबकि सरकारी अस्पतालों में मौजूद डॉक्टरों की संख्या के लिहाज से राज्य में प्रति डॉक्टर पर 19,962 मरीज का हिसाब बैठता है.

प्रदेश का वर्ष 2015-16 में कुल बजट का 3.98 प्रतिशत यानी 12,104 करोड़ रुपये स्वास्थ्य पर खर्च किया गया था. जबकि 2017-18 में कुल बजट का 4.6 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्चा किया गया है.

यूपी एक व्‍यक्ति पर खर्च करता है इतने रुपये
नीति आयोग के 2017-18 के स्वास्थ्य सूचकांक के आधार पर इंडियास्पेंड द्वारा 21 जून, 2018 को प्रकाशित एक रपट के अनुसार, उत्तर प्रदेश एक व्यक्ति की सेहत पर हर साल मात्र 733 रुपये खर्च करता है. जबकि स्वास्थ्य सूचकांक में शीर्ष पर मौजूद केरल प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1413 रुपये खर्च करता है.

स्वास्थ्य ने पूर्व सरकारों पर साधा निशाना
राज्य सरकार स्वास्थ्य की इस खस्ताहाली के लिए पूर्व की सरकारों को जिम्मेदार ठहरा रही है. यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह का कहना है कि समस्याएं उन्हें विरासत में मिली हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट 2017 की है. उस समय हमारी सरकार बनी थी. थोड़ा समय लगेगा स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ठीक हो जाएंगी. जबकि विपक्षी पार्टियां मौजूदा सरकार को इस समस्‍या के लिए जिम्‍मेदार ठहरा रही हैं.
(एजेंसी इनपुट)

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