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सपा-बसपा गठबंधन: याद आया ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम’

सपा-बसपा गठबंधन: याद आया ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम’

कांशीराम के साथ मुलायम सिंह यादव. (File Photo)

कांशीराम के साथ मुलायम सिंह यादव. (File Photo)

90 के दशक में विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम के साथ गठबंधन किया था और बीजेपी के विजय रथ को थाम लिया था.

लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की सियासत में गर्मी दिखाई देने लगी है. सूबे में बीजेपी के खिलाफ गैर कांग्रेसी गठबंधन खड़ा होने की तैयारी है. अर्से बाद प्रदेश की कद्दावर पार्टियां सपा और बसपा एक साथ आने की तैयारी में हैं. ये महत्वपूर्ण घटनाक्रम प्रदेश की सियासत पर कितना असर डालेगा, इसका अंदाजा 90 के दशक में हुए ऐसे ही गठबंधन से लगाया जा सकता है. उस समय विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम के साथ गठबंधन किया था और बीजेपी के विजय रथ को थाम लिया था.

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दरअसल 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया और प्रदेश चुनाव की दहलीज पर खड़ा हो गया. बीजेपी को पूरा भरोसा था कि राम लहर उसे आसानी से दोबारा सत्ता में पहुंचा देगी. लेकिन प्रदेश की सियासत तेजी से करवट ले रही थी. बसपा सुप्रीमो कांशीराम और सपा के मुलायम सिंह यादव की नजदीकियां चर्चा का केंद्र बन रही थीं. दोनों पार्टियों ने पहली बार चुनावी गठबंधन किया और बीजेपी के सामने मैदान में उतरीं. इस दौरान एक नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम’ प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन गया.

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1993 में चुनाव हुए और बीजेपी जो 1991 में 221 सीटें जीती थी, वह 177 सीटों तक ही पहुंच सकी. वहीं सपा ने इस चुनाव में 109 और बसपा ने 67 सीटें हासिल कीं. मामला विधानसभा में संख्या बल की कुश्ती तक खिंचा तो यहां सपा और बसपा ने बीजेपी को हर तरफ से मात देते हुए जोड़तोड़ कर सरकार बना ली. मुलायम सिंह यादव दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए. सपा बसपा गठबंधन ने 4 दिसंबर 1993 को सत्ता की बागडोर संभाल ली.

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लेकिन, आपसी मनमुटाव के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से किनारा कर लिया और समर्थन वापसी की घोषणा कर दी. इस वजह से मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आकर गिर गई. इसके बाद 3 जून, 1995 को मायावती ने बीजेपी के साथ मिलकर सत्ता की बागडोर संभाली. 2 जून 1995 यूपी की राजनीति में एक काले दिन की तरह पहचान रखता है. प्रदेश की राजनीति में उसे गेस्टहाउस कांड कहा जाता है. मायावती खुद कई बार कह चुकी हैं कि उस कांड को कभी वह नहीं भूल सकती हैं.

1991 से शुरू हुई थी मुलायम और कांशीराम की नजदीकियां

कहा जाता है कि 1991 के आम चुनाव में इटावा में जबरदस्त हिंसा के बाद पूरे जिले के चुनाव को दोबारा कराया गया था. तब बसपा सुप्रीमो कांशीराम मैदान में उतरे. मौके की नजाकत को समझने में माहिर मुलायम ने यहां कांशीराम की मदद की. इसके एवज मे कांशीराम ने बसपा से कोई प्रत्याशी मुलायम के खिलाफ जसवंतनगर विधानसभा से नहीं उतारा.

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1991 में हुए लोकसभा के उपचुनाव में बसपा प्रत्याशी कांशीराम को 1 लाख 44 हजार 290 मत मिले और उनके समकक्ष बीजेपी प्रत्याशी लाल सिंह वर्मा को 1 लाख 21 हजार 824 वोट ही मिले. वहीं मुलायम सिंह की अपनी जनता पार्टी से लड़े रामसिंह शाक्य को मात्र 82,624 मत ही मिले थे. 1991 में इटावा से जीत के दौरान मुलायम का कांशीराम के प्रति यह आदर अचानक उभर कर सामने आया था, जिसमें मुलायम ने अपने खास की कोई खास मदद नहीं की.

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इस हार के बाद रामसिंह शाक्य और मुलायम के बीच मनुमुटाव भी हुआ लेकिन मामला फायदे और नुकसान के कारण शांत हो गया. कांशीराम की इस जीत के बाद उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम की जो जुगलबंदी शुरू हुई इसका लाभ उत्तर प्रदेश में 1993 में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनने के रूप में सामने आई.

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Tags: BSP, Kanshiram, Lucknow news, Mulayam Singh Yadav, Samajwadi party, Up news in hindi, Uttar Pradesh Politics, Uttarpradesh news, लखनऊ

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