सपा-कांग्रेस के ‘राजनैतिक तलाक’ से असमंजस में बसपा, एडवांटेज बीजेपी!

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन से हुए नुकसान से सबक लेते हुए 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहे हैं. सपा ने जहां गठबन्धन से किनारा करने के साफ संकेत देने शुरू कर दिए हैं. वहीं कांग्रेस भी फिलहाल गठबंधन के पक्ष में नहीं दिख रही है.

Amit Tiwari | News18Hindi
Updated: January 12, 2018, 1:29 PM IST
सपा-कांग्रेस के ‘राजनैतिक तलाक’ से असमंजस में बसपा, एडवांटेज बीजेपी!
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Amit Tiwari
Amit Tiwari | News18Hindi
Updated: January 12, 2018, 1:29 PM IST
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन से हुए नुकसान से सबक लेते हुए 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहे हैं. सपा ने जहां गठबन्धन से किनारा करने के साफ संकेत देने शुरू कर दिए हैं. वहीं कांग्रेस भी फिलहाल गठबंधन के पक्ष में नहीं दिख रही है.

ऐसे में बिखरते विपक्ष को देख बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी असमंजस में दिख रही है. अब सवाल ये उठ रहा है कि सपा और कांग्रेस के इस ‘राजनैतिक तलाक’ का फायदा किसे होगा? क्या बिखरता विपक्ष बीजेपी से लड़ने के बजाय बीजेपी को और मज़बूत तो नहीं कर रहा?

विधान सभा चुनाव में अखिलेश और राहुल की दोस्ती यूपी को रास नहीं आई और दोनों ही पार्टियां विधानसभा चुनाव में औंधे मुंह जा गिरीं. जिसके बाद सपा और कांग्रेस अब इस बात पर मंथन कर रही हैं कि कहीं ये नुकसान गठबंधन की वजह से ही तो नहीं हुआ. सपा ने गठबंधन के बाद कांग्रेस के लिए छोड़ी सीटों पर सर्वे करना शुरू कर दिया है. वहीं कांग्रेस भी गठबंधन पर नेताओं और कार्यकर्ताओं से फीडबैक ले रही है.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर का कहना है कि लोकसभा में गठबंधन को लकेर फिलहाल पार्टी में कोई बात नहीं चल रही है, लेकिन बीजेपी से लड़ना है तो गठबंधन से इनकार भी नहीं किया जा सकता.

राजबब्बर ने कहा, “ लोक सभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक गठबंधन की बात सामने नहीं आई है. जहां तक रिश्तों की बात है तो इसमें यह बात नहीं होती है कि क्या लिया और क्या दिया. रिश्ते निभाने पड़ते हैं. अखिलेशजी और राहुलजी दोनों ही राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं अपने-अपने पार्टी के. उनके बीच रिश्ते बहुत ही सौहार्दपूर्ण और मित्रतापूर्ण हैं. अखिलेश जी ने अपने नेताओं से फीडबैक लिया है. लेकिन मेरे राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अभी मुझसे इस बारे में कोई सवाल नहीं किया है.

वहीं दूसरी तरफ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ संकेत दिए हैं कि गठबंधन से उनका नुकसान ज्यादा हुआ. सपा नेतृत्व का मानना है कि गठबंधन न होता तो शायद स्थिति अलग होती. लेकिन सपा नेता कहते हैं कि उन्हें बीजेपी से बदला लेना है, लिहाज़ा उसके लिए जो भी बन पड़ेगा वो करेंगे.

सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा, “ हमें 2014 और 2017 में मिली हार का बदला लेना है. धोखे से हराया गया. कई तरह के षड्यंत्र रचे गए. बैठक में यह भी फैसला लिया गया कि बीजेपी सरकार कई ऐसे फैसले ले रही है जो लोकतंत्र के लिए खतरा है.”

हालांकि लोकसभा चुनाव में विपक्ष एकता और गठबंधन को लेकर फैसला राहुल और अखिलेश को लेना है. लेकिन इन दोनों दलों के मौजूदा रवैये से बसपा भी असमंजस मे है. छोटे दल भी तय नहीं कर पा रहे कि किस तरफ जाना है. लिहाज़ा इस बिखरे विपक्ष का फायदा एक बार फिर बीजेपी को मिल सकता है.

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के लिए भी साझा उम्मीदवार को लेकर एक राय नहीं बन पाई है. बसपा का कहना है कि उपचुनाव न लड़ने का उनका इतिहास रहा है और वे इस पर कायम हैं. लेकिन सपा को छोड़कर अगर कांग्रेस का कोई साझा उम्मीदवार खड़ा होता है तो वे उसे समर्थन कर सकती है.

वरिष्ठ बसपा नेता ठाकुर उम्मेद सिंह का कहना है कि मुस्लिम और दलित बीजेपी को रोकने के लिए एकजुट हो रहे हैं. ऐसे में 2019 में त्रिकोणीय मुकाबले के तहत ही बीजेपी और मोदी को रोका जा सकता है. इसके लिए जरुरी है कि दो फ्रंट बने. एक राहुल और अखिलेश के दूसरा मायवती के नेतृत्व में.
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