क्‍या पार्टी और परिवार की प्रतिष्‍ठा बचाने के लिए साथ आएंगे अखिलेश और शिवपाल?

समाजवादी पार्टी के मौजूदा राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अखिलेश यादव पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह अपने चाचा शिवपाल यादव की घर वापसी की पहल करें, ताकि पार्टी को मजबूत बनाए रखा जा सके.

Ajay Raj | News18 Uttar Pradesh
Updated: June 14, 2019, 7:44 AM IST
क्‍या पार्टी और परिवार की प्रतिष्‍ठा बचाने के लिए साथ आएंगे अखिलेश और शिवपाल?
क्या फिर एकजुट होगा समाजवादी परिवार? (फाइल फोटो)
Ajay Raj | News18 Uttar Pradesh
Updated: June 14, 2019, 7:44 AM IST
समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) दो लोकसभा चुनाव (2014 और 2019) और 2017 विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद बैकफुट पर दिखाई दे रही है. इसी वजह से पार्टी के मौजूदा राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह अपने चाचा शिवपाल यादव की 'घर वापसी' की पहल करें, ताकि पार्टी को मजबूत बनाए रखा जा सके. वहीं, बसपा सुप्रीमो मायवती ने लोकसभा चुनावों के बाद गठबंधन धर्म निभाने के बजाय यूपी में 11 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों में अकेले उतरने का फैसला कर अखिलेश को करारा झटका दे दिया है. जबकि निराशाजनक नतीजों के बाद ऐसा लग रहा था कि शिवपाल यादव और अखिलेश यादव एक होकर पार्टी को बचाने का काम करेंगे, लेकिन अब ये बात बेदम लगने लगी है.

हालांकि सपा के संस्थापक मुलायम सिह यादव चाहते हैं कि पार्टी को खड़ा करने में योगदान देने वाले छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को दोबारा साथ लाया जाए, लेकिन अखिलेश राजी नहीं हैं. शायद उन्हें लगता है कि चाचा की पार्टी में वापसी से उनके एकाधिकार और वर्चस्व को खतरा पैदा हो जाएगा. वहीं, दूसरी तरफ शिवपाल ने भी ऐलान कर दिया है कि वह सपा के साथ जाने के बजाय अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को मजबूत करने में जोर लगाना चाहेंगे.



यूपी की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषक सुशील सिंह का मानना है, 'शिवपाल सिंह यादव कभी भी पार्टी से बाहर नहीं जाना चाहते थे. उन्‍हें अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव ने पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया. आखिर अध्‍यक्ष होने के नाते अखिलेश के पास ताकत थी और उसका उन्‍होंने भरपूर फायदा उठाया.'

अखिलेश और शिवपाल के मिलेंगे मन

क्‍या अखिलेश और शिवपाल फिर एक साथ नजर आएंगे? इस पर सुशील सिंह का मानना है, 'शिवपाल को पार्टी में लाने या फिर ना लाने का फैसला अखिलेश यादव को करना है. वो पार्टी के अध्‍यक्ष हैं और डूबती नैया को उबारने के लिए उन्‍हें ही बड़ा बनना होगा. आखिर मायावती के साथ उनका गठबंधन टूटने की कगार पर है और वह इस बार लोकसभा चुनावों में अपने परिवार की तीन सीटें भी गंवा बैठे हैं. सच कहूं तो सपा के पुराने कार्यकर्ता और नेताओं में अभी भी शिवपाल की पकड़ है. हां, अखिलेश ने युवाओं में जरूर जोश भरा है, लेकिन नाकामी ने उनकी इस कवायद पर भी पानी फेर दिया है.'

रामगोपाल की भूमिका पर सवाल
क्‍या रामगोपाल हैं अखिलेश-शिवपाल की दूरी की वजह? इस पर सुशील सिंह ने कहा, 'इसको लेकर सटीक टिप्‍पणी तो नहीं की जा सकती, लेकिन इतना सच है कि उनकी भूमिका जरूर रही होगी. आखिर उन्‍होंने अखिलेश को अपने शीशे में उतार लिया और शिवपाल यादव की राजनीति को ठंडा कर दिया. हां, उनका नेताजी से लगाव आज भी बना हुआ है. सच कहूं तो प्रोफेसर रामगोपाल यादव की संगठन में कोई पकड़ नहीं है, क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी राजनीति का अधिकांश वक्‍त दिल्‍ली में ही गुजारा है. जबकि शिवपाल ने जमीन पर मेहनत की है.'
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पार्टी को पटरी पर लाने के लिए चाचा और भतीजे का एक साथ आना जरूरी है. (फाइल फोटो)


नेताजी की पहल लाएगी रंग!
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के पराजित होने के बाद से समाजवादी नेताओं को एक मंच पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. जबकि मुलायम सिंह यादव पुराने कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर भाजपा का विकल्प तैयार करने की इच्छा जता चुके हैं.

इस पर सुशील सिंह ने कहा, ' शायद पिता की बात मानकर अखिलेश अपने चाचा के प्रति नरमी दिखा दें, लेकिन वर्चस्‍व की लड़ाई उनके आड़े आ सकती है. लेकिन एक बात सौ फीसदी सच है कि अखिलेश और शिवपाल की आपसी लड़ाई से पार्टी जरूर कमजोर हुई है. जबकि बसपा का उभार हुआ है. वैसे अखिलेश और मुलायम दोनों जानते हैं कि सपा को यहां तक पहुंचाने में शिवपाल का बड़ा हाथ है. अगर अखिलेश ने इस पर अमल किया तो बात बन सकती है.'

क्‍या खत्‍म होगी शिवपाल की सदस्‍यता?
गौरतलब है कि शिवपाल पिछले साल सपा से अलग हो गए थे और उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली है. हालांकि वह अभी भी सपा से विधायक हैं. इसके बावजूद शिवपाल की सदस्यता के समाप्त करने के लिए सपा आलाकमान की ओर से आज तक किसी तरह की कोई चिट्ठी नहीं लिखी गई है. जबकि सपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव में वह खुद भी मैदान में थे और अपनी पार्टी से कई नेताओं को अलग- अलग सीटों पर मैदान में उतारा था.

सिंह ने कहा, ' अखिलेश अपने चाचा को किस तरह लेते हैं ये अलग बात है, लेकिन नेताजी का जुड़ाव शिवपाल से जगजाहिर है. शायद नेताजी का या फिर परिवार का लिहाजा करते हुए अखिलेश ने शिवपाल की विधान सभा सदस्‍यता खत्‍म करने के लिए चिट्ठी नहीं लिखी होगी. वैसे राजनीति में अतीत ज्‍यादा मायने नहीं रखता. यहां मौजूदा स्थिति ज्‍यादा मायने रखती हैं. क्‍या पता कल दोनों (अखिलेश और शिवपाल) एक मंच पर नजर आएं.'

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