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आखिर क्यों CM योगी आदित्यनाथ ने की मुलायम सिंह यादव से मुलाकात

Kumari Ranjana | News18 Uttar Pradesh
Updated: October 30, 2019, 4:56 PM IST
आखिर क्यों CM योगी आदित्यनाथ ने की मुलायम सिंह यादव से मुलाकात
बुधवार को सीएम योगी आदित्यनाथ जब सपा मुखिया से मिलने उनके घर पहुंचे तो सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं आम हो गईं.

वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव कहते हैं कि निश्चित तौर पर बीजेपी (BJP) इस मामले में बड़ी रणनीति के साथ चल रही है क्योंकि हिंदुत्व (Hindutva) का चेहरा माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) से मिलने से समाजवादी पार्टी की 'बेस पॉलिटिक्स' को धक्का लगता है.

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लखनऊ. राजनेताओं का आपस में मिलना जुलना कोई नई बात नहीं है. लेकिन जब राजनीतिज्ञ मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) जैसा शख्स हो तो फिर मायने कुछ और ही निकलते हैं. लखनऊ में बुधवार को उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) जब सपा मुखिया से मिलने उनके घर पहुंचे तो सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं आम हो गईं. बातों-बातों में यूपी की राजनीति के इतिहास की परतें खुलने लगी हैं और इस मुलाकात के मायने तलाशे जा रहे हैं.

इमरजेंसी में कांग्रेस विरोध की राजनीति से आगे बढ़े मुलायम
दरअसल एक जमाना था जब पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव इमरजेंसी में कांग्रेस विरोध की राजनीति कर आगे बढ़े और उस समय की जनसंघ के साथ सरकार बनाई. सभी दोस्त रहे. समय आगे बढ़ता रहा. मंडल की राजनीति ने जोर पकड़ा. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह उसके अगुआ बने. तभी 'कमंडल' की राजनीति सामने आ गई और मुलायम सिंह यादव इसके विरोध में नजर आने लगे.

खुलकर की अयोध्या आंदोलन की मुखालफत

राजनीति की सीढ़ियों पर चढ़ते-चढ़ते मुलायम के सामने एक समय ऐसा आया कि खुद को मजबूत करने के लिए वह खुलकर अयोध्या आंदोलन की मुखालफत करने लगे और 'मुल्ला मुलायम' के विशेषण से भी नवाजे गए. मंडल की राजनीति के तहत ही मुलायम सिंह का बसपा के जनक कांशीराम के साथ आना भी आसान हुआ, लेकिन कमंडल की राजनीति के तहत वह और मजबूत हुए. मुलायम सिंह यादव पहली बार 1989 में यूपी के मुख्यमंत्री बने. उनकी सरकार जोड़-तोड़ पर चलती रही. जब अप्रैल 1991 में कांग्रेस ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो अल्पमत में आने के बाद उनकी सरकार गिर गई.

अखिलेश के सीएम बनने तक यूपी में प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थी बसपा
1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आ गई और मुलायम सिंह यादव की पार्टी चुनाव हार गई. इसके बाद मुलायम ने जनता परिवार से अलग होते हुए 4 अक्टूबर 1992 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी बनाई और बसपा से दोस्ती कर मिलकर अगला विधानसभा चुनाव लड़ा और सीएम बन गए. बाद में मुलायम सिंह यादव तीसरी बार भी सीएम बने. जब उनकी पार्टी को 2012 में पहली बार पूर्ण बहुमत मिला तो उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को सीएम बनाया. प्रदेश में सपा और बसपा की राजनीति के बीच बीजेपी दूर दिखाई दे रही थी. उस समय अखिलेश यादव की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी थी.
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पीएम मोदी का मुलायम परिवार के कार्यक्रम में आना और चर्चा
इमरजेंसी के दौरान की दोस्ती का नतीजा ही था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी 2015 में मुलायम सिंह यादव के पोते तेजपाल यादव के तिलक समारोह में शामिल होने इटावा पहुंचे थे. बीजेपी का ये बड़ा राजनीतिक स्ट्रोक माना गया. प्रदेश में अखिलेश य़ादव की सरकार थी और समाजवादी पार्टी को भान भी नहीं था कि ये बीजेपी का राजनीतिक स्ट्रोक आगे कितना कारगर होगा.

इसके बाद समाजवादी पार्टी के कुनबे में फूट पड़ गई और अखिलेश यादव की राजनीति की धार कुंद पड़ गई. अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ समझौता किया, जिसका फायदा सपा को नहीं मिला. बीजेपी दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आई. ऐसे में बीजेपी ने अखिलेश के चाचा और शिवपाल यादव का भी भरपूर इस्तेमाल किया. 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव ने खुलकर सपा का विरोध किया.

इसी साल पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव की जब तबियत खराब थी तो पूर्व सीएम राजनाथ सिंह ने तो हाल चाल लिया ही सीएम योगी भी मुलायम सिंह के आवास पहुंचे और स्वास्थ्य का हाल-चाल लिया. आज भी सीएम योगी मुलायम सिंह से मिले और उनको दिवाली की शुभकामना दी और स्वास्थ्य का हाल चाल लिया. दोनों ही मौकों पर शिवपाल यादव मौजूद रहे, लेकिन आज अखिलेश यादव वहां मौजूद नहीं थे. अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के कार्यालय में कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे.

सीएम योगी के मुलायम से मुलाकात के हैं ये मायने
वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव कहते हैं कि पिता से याराना और बेटे से दुश्मनी कैसे? वह कहते हैं कि निश्चित तौर पर बीजेपी इस मामले में बड़ी रणनीति के साथ चल रही है क्योंकि हिंदुत्व का चेहरा माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ के मुलायम सिंह यादव से मिलने से समाजवादी पार्टी की 'बेस पॉलिटिक्स' को धक्का लगता है. वहीं अखिलेश की बात करें तो वह सिर्फ बीजेपी से ही दूर दिखना चाहते हैं क्योंकि कांग्रेस और बसपा से वह गठबंधन कर चुनाव लड़ चुके हैं. जाहिर है  एक तरफ इमरजेंसी के दौरान की दोस्ती के बहाने मुलायम के करीब दिख रही भाजपा, अखिलेश की एंटी बीजेपी राह को रोकती दिख रही है. अब अखिलेश के लिए राजनीतिक रूप से ये कहा जा सकता है कि बड़ी कठिन है डगर पनघट की.

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First published: October 30, 2019, 3:00 PM IST
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