जानिए यूपी के सबसे बड़े गैंगवार की कहानी, मुन्ना बजरंगी तो महज एक शूटर के किरदार में था

ब्रजेश सिंह (बाएं) और मुख्तार अंसारी. Photo: File

ब्रजेश सिंह (बाएं) और मुख्तार अंसारी. Photo: File

मुन्ना बजरंगी की हत्या में भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के माफिया का नाम आ रहा हो लेकिन कहीं न कहीं लोग इसे यूपी के अब तक के सबसे बड़े गैंगवार की कड़ी मान रहे हैं.

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बागपत जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद एक बार​ फिर उत्तर प्रदेश उसी गैंगवार के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जिसने अब तक पूर्वांचल में दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतार दिया. उत्तर प्रदेश सरकार ने एहतियातन जेल में बंद सभी माफियाओं की सुरक्षा बढ़ा दी है. लेकिन पूर्वांचल में चर्चाओं का बाजार गर्म है. मुन्ना बजरंगी की हत्या में भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के माफिया का नाम आ रहा हो लेकिन कहीं न कहीं लोग इसे यूपी के अब तक के सबसे बड़े गैंगवार की कड़ी मान रहे हैं.



दरअसल करीब तीन दशक में यूपी के दो बड़े माफिया ब्रजेश सिंह और मुख्तार अंसारी के बीच वर्चस्व की जंग में न जाने कितनी लाशें गिर चुकी हैं. कहा जाता है कि इस गैंगवार में कभी मुन्ना बजरंगी को ब्रजेश की कमर तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया तो कभी मुख्तार पर जानलेवा हमला हुआ. गैंगवार की इस कहानी में एके-47 से लेकर सियासी रंजिशें और जेल में हत्या से लेकर बीच बाजार में चलती गोलियां शामिल हैं.



पिता की हत्या ने पैदा कर दिया गैंगस्टर 





ब्रजेश सिंह (File Photo)

ये कहानी शुरू होती है गाजीपुर से. ब्रजेश सिंह बनारस से बीएससी कर रहा था. मूलरूप से वह गाजीपुर के धौरहरा का रहने वाला था. 80 के दशक में गाजीपुर में ब्रजेश के पिता रवींद्र सिंह की हत्या कर दी गई. आरोप लगा कि प्रधानी के चुनाव और जमीन की रंजिश में ये हत्या की गई. इस जघन्य हत्याकांड में गांव के ही हरिहर सिंह और पांचू सिंह, लातूर सिंह उर्फ ओम प्रकाश ठाकुर और नरेंद्र सिंह, ग्राम प्रधान रघुनाथ पर आरोप लगा. इसी के बाद ब्रजेश सिंह ने पढ़ाई छोड़ दी.



पूर्वांचल में पहली बार एके-47 की गूंज



1985 में ब्रजेश सिंह ने पांचू के पिता हरिहर सिंह को गोलियों से भून दिया. इसके बाद उसने कचहरी में धौरहरा के ग्राम प्रधान रघुनाथ को भी सरेआम गोलियों से भून दिया. इस घटना में ब्रजेश सिंह ने एके-47 से हमला किया. कहा जाता है कि पूर्वांचल में पहली बार एके-47 गूंजी. उधर पुलिस भी सक्रिय हुई और एक एनकाउंटर में नामी बदमाश पांचू भी मारा गया. लेकिन इसके बाद भी हत्याओं का सिलसिला नहीं थमा.



1985 में ही बनारस के चौबेपुर पुलिस थाने के सिकरौरा गांव में 6 लोगों को मार दिया गया. उस गैंगवार में ब्रजेश को भी गोली लग गई. इस बार वो पकड़ा गया. पुलिस कस्टडी में वो अस्पताल में भर्ती रहा और वहीं से भाग निकला. उसके बाद हाथ नहीं आया. इसके बाद ब्रजेश सिंह के गैंग ने कई कारोबार में हाथ आजमाना शुरू किया. इनमें रेलवे स्क्रैप के ठेके, शराब, कोयला, प्रॉपर्टी के काम प्रमुख थे.



यहां से मुख्तार और ब्रजेश सिंह गैंग आए आमने-सामने



मुख्तार अंसारी (File Photo)




कहा जाता है कि जेल में ब्रजेश की मुलाकात त्रिभुवन सिंह से हुई. उसकी अदावत मकनू सिंह और साधु सिंह गैंग से थी. मुख्तार अंसारी के संबंध मकनू सिंह गैंग से थे. इन पर त्रिभुवन सिंह के पिता की हत्या का आरोप था, वहीं 1988 में इसी गैंग पर त्रिभुवन सिंह के भाई हेड कॉन्स्टेबल राजेंद्र सिंह की हत्या का भी आरोप लगा. इस मामले में साधु सिंह और मुख्तार अंसारी नामजद किए गए.



साधु गिरफ्तार हो गया और जेल चला गया. लेकिन रंजिश खत्म नहीं हुई. आरोप है कि ब्रजेश सिंह और उसके गैंग ने पुलिस यूनि​फॉर्म में साधु सिंह की हत्या कर दी. यही नहीं उसके परिवार के 8 सदस्यों को मुदियार गांव में मार दिया गया. इन लगातार हत्याओं के बाद ब्रजेश सिंह गैंग धीरे-धीरे मजबूत होता चला गया. उसकी धमक यूपी से बाहर भी महसूस की जाने लगी. बिहार, झारखंड से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र तक उसने कई घटनाओं को अंजाम दिया.



दाऊद की बहन हसीना पारकर, सुभाष ठाकुर और ब्रजेश सिंह



कहा जाता है कि इसी दौरान ब्रजेश ने अंडरवर्ल्ड डॉन सुभाष ठाकुर से हाथ मिला लिया. सुभाष दाऊद का नजदीकी था. आरोप है कि दाऊद के कहने पर ब्रजेश ने मुंबई में दिनदहाड़े जेजे हॉस्पिटल शूटआउट को अंजाम दिया. जेजे अस्पताल में अरुण गवली गिरोह का हल्दंकर भी मारा गया. माना जाता है कि दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर के पति की हत्या में यही शामिल था.



लेकिन मुंबई बम धमाके के बाद दाऊद और सुभाष ठाकुर अलग हो गए. तब बनारस के गैंगवार में भी एक तरफ दाऊद तो दूसरी तरफ सुभाष ठाकुर का दखल दिखने लगी. उधर ब्रजेश ने खनन के कारोबार में अच्छी पैठ बना ली.



...और शुरू हुई वर्चस्व की जंग 



इस बीच गाजीपुर के सैदपुर में एक प्लॉट को हासिल करने के लिए गैंगस्टर साहिब सिंह के गिरोह का दूसरे गिरोह के साथ जमकर झगड़ा हुआ. ब्रजेश सिंह साहिब सिंह से जुड़ा था. इसी क्रम में उसने 1990 में गाजीपुर जिले के तमाम सरकारी ठेकों पर कब्जा करना शुरू कर दिया. अपने काम को बनाए रखने के लिए बाहुबली मुख्तार अंसारी का इस गिरोह से सामना हुआ.



इस दौरान बनारस में वर्तमान में कांग्रेस नेता अजय राय के भाई अवधेश राय की हत्या 1991 में हो गई. इसमें मुख्तार ग्रुप का नाम सामने आया. ये ब्रजेश के नजदीकी माने जाते थे. इसी के बाद ब्रजेश से मुख्तार की तल्खी बढ़ गई. वहीं ब्रजेश के नजदीकी त्रिभुवन और मुख्तार शुरू से ही एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे. इसके बाद मुख्तार और ब्रजेश की गैंगवार शुरू हुई, जिसने दर्जनों लोगों की जान लीं.



2001 में हुआ मुख्तार अंसारी पर जानलेवा हमला



1996 में मुख्तार अंसारी पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए. इसके बाद ब्रजेश पर दबाव बढ़ गया. उसके एक करीबियों पर कई हमले हुए. जुलाई 2001 में गाजीपुर के उसरी चट्टी में मुख्तार अंसारी के काफिले पर बड़ा हमला किया गया. कहा जाता है कि मुख्तार किसी तरह गाड़ी से निकलकर गोलियां चलाते हुए खेतों की तरफ भाग निकला. इस हमले में मुख्तार के तीन लोग मारे गए. ब्रजेश सिंह के भी इस हमले में घायल होने की खबर थी. इसके बाद ब्रजेश के मारे जाने की अफवाह उड़ी. इसके बाद बाहुबली मुख्तार अंसारी पूर्वांचल में अकेला गैंग लीडर बनकर उभरा.



कृष्णानंद राय की हत्या में सामने आया मुन्ना बजरंगी का नाम



स्वर्गीय कृष्णानंद राय (बाएं) व मुन्ना बजरंगी. (File Photo)




कहा जाता है कि भाजपा विधायक कृष्णानंद राय ने ब्रजेश सिंह की मदद की. 2005 में मुख्तार जेल में बंद था. अक्टूबर 2005 में मऊ में दंगे हुए थे. अंसारी पर खुली जीप में घूमते हुए दंगे भड़काने का आरोप था. हालांकि कोर्ट में इन आरोपों को खारिज कर दिया गया था. उसी दौरान उसने गाजीपुर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. इस दौरान नवंबर 2005 में गाजीपुर-बक्सर के बॉर्डर पर विधायक कृष्णानंद राय को उनके 6 अन्य साथियों के साथ सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसी मामले में मुख्य आरोपी के रूप में मुन्ना बजरंगी का नाम सामने आया. यही नहीं इस हत्याकांड के महत्वपूर्ण गवाह शशिकांत राय की भी एक साल बाद 2006 में रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई.



मुन्ना बजरंगी के दो करीबियों की जेल में हत्या



इसके बाद 2005 में मुन्ना बजरंगी के शार्प शूटर अनुराग त्रिपाठी उर्फ अन्नू त्रिपाठी की वाराणसी जिला जेत में गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसके बाद मुन्ना के करीबी रहे मुख्तार गिरोह के प्रिंस अहमद की 2010 में जेल में हत्या कर दी गई. प्रिंस अहमद कृष्णानंद राय हत्याकांड में मुख्तार और मुन्ना बजरंगी के साथ नामजद था.



तीन साल फरार रहने के बाद ओडिशा में पकड़ा गया ब्रजेश सिंह



कृष्णानंद राय की हत्या के बाद ब्रजेश सिंह गाजीपुर-मऊ इलाके से फ़रार हो गया. 2008 में वह ओडिशा से गिरफ़्तार कर लिया गया और कुछ समय बाद प्रगतिशील मानव समाज पार्टी का हिस्सा बन गया. किसी को नहीं पता था कि वह अरुण कुमार सिंह के नाम से भुवनेश्वर में रहता था.  उधर 2008 में मुख़्तार अंसारी ने बसपा की ओर वापस रुख किया और दावा किया कि उसे अपराध के केस में फंसाया गया था. बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुख्तार को ‘गरीबों का मसीहा’ बताया और जोर-शोर से चुनाव प्रचार शुरू हो गया.



इसके बाद 2010 में बसपा ने मुख़्तार के आपराधिक मामलों को स्वीकारते हुए उसे पार्टी से निकाल दिया. अब मुख़्तार ने अपने भाइयों के साथ नयी पार्टी बनाई, कौमी एकता दल. जिससे वह 2012 में मऊ चुनाव जीत गया. 2014 में मुख़्तार ने ऐलान किया कि वह बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ेगा, लेकिन बाद में उसने ये कह कर आवेदन वापस ले लिया कि इससे वोट सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएंगे.



उधर गैंगवार जारी रहीं. 4 मई 2013 को ब्रजेश सिंह के बेहद खास कहे जाने वाले अजय खलनायक पर जानलेवा हमला हुआ. अजय खलनायक की गाड़ी में दर्जनों गोलियां दागी गई थीं. इसके बाद 3 जुलाई 2013 को इनके चचेरे भाई सतीश सिंह की बनारस के थाना चौबेपुर क्षेत्र में ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर हत्या कर दी गई.



ब्रजेश गुट को लगातार कमजोर करने की वारदातों के बीच जब 3 फरवरी 2014 को लखनऊ के किंग जाॅर्ज मेडिकल काॅलेज में अलग-अलग जेलों से आए मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी मिले तो पूर्वांचल में फिर गैंगवार को लेकर अटकलें लगाई जाने लगीं.



2016 में मुख्तार अंसारी को सपा में शामिल करने की नाकाम कोशिशें हुईं. इसके बाद 2017 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी ने अपनी पार्टी कौमी एकता दल का मायावती की पार्टी बीएसपी में विलय कर दिया. मायावती ने तब मुख्तार के लिए कहा कि ​वह किसी भी मामले में दोषी साबित नहीं हुए हैं. उधर ब्रजेश सिंह ने भी विधानपरिषद सदस्य के रूप में अपनी राजनीतिक पारी शुरू की.



मुन्ना बजरंगी की हत्या कहीं न कहीं इसी गैंगवार का नतीजा है: रिटायर्ड डीजीपी



उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह. (File Photo)




इस संबंध में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं कि 1990 के आसपास से इन दोनों गैंगों के बीच गाजीपुर, बनारस, गोरखपुर, लखनऊ से लेकर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा तक मुठभेड़ होती रहीं.

विक्रम ​सिंह ने बताया कि ऐसे ही गिरोहों का खात्मा करने के लिए अजय राज शर्मा की अगुवाई में एसटीएफ का गठन हुआ. उस एसटीएफ में मैं तीन साल तक प्रथम आईजी के रूप में कार्यरत रहा.

उन्होंने कहा कि इन गिरोहों का काम जबरन धन वसूली करना, बूथ कैप्चरिंग, ठेके पर हत्या और जेल में रहते हुए अपना साम्राज्य चलाना था. एसटीएफ आैर यूपी पुलिस ने इन गिराेहों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया. लेकिन ये लोग राजनीतिक भ्रष्टाचार का लाभ उठाने में कामयाब रहे हैं.



उन्होंने कहा कि मुन्ना बजरंगी की हत्या कहीं न कहीं इसी गैंगवार का नतीजा है. आगे और भी ये गुट एक-दूसरे पर हमला करेंगे. कभी ब्रजेश सिंह आगे होते हैं, तो कभी मुख्तार अंसारी. उन्होंने कहा कि वर्तमान यूपी सरकार में इच्छाशक्ति है और पुलिस ठान ले तो जल्द ही दोनों गैंग को पूरी तरह काबू कर लिया जा सकता है.



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