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OPINION: आंसुओं, चुनावी भाषणों के शोलों और बगावत से रोमांचक हुआ UP उपचुनाव का रण

News18 Uttar Pradesh
Updated: October 15, 2019, 1:52 PM IST
OPINION: आंसुओं, चुनावी भाषणों के शोलों और बगावत से रोमांचक हुआ UP उपचुनाव का रण
आंसुओं, चुनावी भाषणों के शोलों और बगावत से रोमांचक हुआ UP उपचुनाव का रण

योगी सरकार (Yogi Government) के आधे कार्यकाल पर हो रहे उपचुनाव को सत्तापक्ष के लिए मध्यावधि आकलन माना जा रहा है.

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रंजीव 

लखनऊ. मशहूर भले ही रामपुरी चाकू हो लेकिन इन दिनों रामपुर (Rampur) की चुनावी फिजां आंसुओं से सराबोर हो रही है! समाजवादी पार्टी के ताकतवर नेता आजम खां (Azam Khan) अपनी पत्नी और सपा प्रत्याशी के लिए वोट मांगते हुए चुनावी सभाओं में रो पड़ रहे हैं. उधर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के धुआंधार प्रचार ने 11 सीटों के इन उपचुनावों में आम चुनावों जैसा माहौल बना रखा है. वहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा (BJP) के सबसे बड़े स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ के भी मैदान में उतरने से चुनावी भाषणों को नई धार मिली है.

योगी सरकार के आधे कार्यकाल पर हो रहे उपचुनाव को सत्तापक्ष के लिए मध्यावधि आकलन माना जा रहा है. वहीं, विरोधी दलों के सामने यह उपचुनाव चुनौती है कि उनमें से कौन भाजपा के खिलाफ विपक्षी दल नंबर वन बनने की मनोवैज्ञानिक बढ़त ले पाएगा. लिहाजा कई निर्णयों और संभावित निष्कर्षों को समेटे यूपी के इस छोटे चुनाव का बड़ा सियासी संदेश निकलना तय माना जा रहा है. चूंकि उपचुनाव की सीटें यूपी के लगभग हर प्रमुख भौगोलिक इलाके में हैं, लिहाजा यह निर्णय भी होगा कि इन इलाकों का चुनावी जातीय गणित 2017, 2019 की तुलना में समान रहा या बदला.

विधानसभा चुनाव में भाजपा का कब्जा था

इन 11 सीटों में 9 पर 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का कब्जा था, जबकि एक-एक सीट सपा और बसपा के पास थीं. विपक्ष के पाले की दोनों सीटें भी झटक कर भाजपा 11 का दम दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ रही है. इसलिए भी क्योंकि इन दोनों सीटों- रामपुर और जलालपुर के बड़े प्रतीकात्मक मायने हैं. रामपुर की सीट पर लगातार आजम खां का वर्चस्व रहा है. वहीं, जलालपुर में गए करीब दो दशक से भाजपा कभी जीत नहीं पाई है. अंबेडकरनगर जिले की इस सीट पर बसपा और सपा ज्यादा बड़ी सियासी ताकत रहे हैं. लिहाजा इन दोनों सीटों पर भाजपा की खास नजर है. इनमें भी रामपुर के नतीजों के विशेष मायने होंगे. उपचुनाव नतीजों से यह भी निर्णय होगा कि रामपुर पर किसका राज चलेगा. क्या आजम खां इस मुस्लिम बहुल सीट पर अपनी पकड़ बरकरार रख पाएंगे या इसे उनके कब्जे से झटकने की भाजपा की कोशिशें परवान चढ़ेंगी.

घेरे में आए सांसद आजम खां
लोकसभा चुनाव के बाद दर्जनों एफआईआर के घेरे में आए सांसद आजम खां यदि सपा के लिए यह सीट बचा नहीं पाते हैं तो यह माना जाएगा कि उनके खिलाफ हुए मुकदमों की पृष्ठभूमि में क्षेत्र की जनता ने भी उनका साथ नहीं दिया. भाजपा को रामपुर में जीत मिली तो उसे यह कहने का अवसर मिलेगा कि सरकार की और से आजम खां के खिलाफ की जा रही कार्रवाई का जनता ने भी समर्थन कर दिया. वहीं, नतीजे इसके उलट हुए तो आजम खां को जनता की अदालत के निर्णय का हवाला देते हुए सत्तारूढ़ दल पर पलटवार का मौका मिलेगा. लिहाजा रामपुर में आंस भी बह रहे हैं और तीखे चुनावी भाषणों के शोले भी दग रहे हैं.
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सत्ताधारी दल ही बाजी मारता है
वैसे, उपचुनावों के बारे में यह सामान्य सियासी रही है कि इनमें सत्ताधारी दल ही बाजी मारता है. ऐसे में 11 सीटों के इन उपचुनावों में यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि विपक्षी दलों में कौन सी पार्टी अधिकतर सीटों पर भाजपा को टक्कर देकर या तो उसे हराने में कामयाबी पाती है या रनर-अप होती है, और संभवत: यही इन उपचुनावों का सवार्धिक रोमांचक पहलू भी है. सपा और बसपा बमुश्किल चार माह पहले तक गठबंधन में साथ थे. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद बसपा मुखिया मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ दिया.

सपा का प्रदर्शन बसपा से बेहतर रहता है तो
ऐसे में उपचुनावों में यदि सपा का प्रदर्शन बसपा से बेहतर रहता है तो अखिलेश यादव और उनकी टीम यह संदेश देने में सफल होंगी कि भाजपा को सपा ही टक्कर दे सकती है और यह भी कि बसपा को ताकतवर मानते हुए  गठबंधन तोड़ने का मायावती का फैसला गलत था. इसी तरह यदि उपचुनाव में सपा की तुलना में बसपा अच्छा प्रदर्शन करती है तो वैसा ही दावा मायावती करने की स्थिति में होंगी. हालांकि, करीब डेढ़ दशक बाद उपचुनावों में किस्मत आजमाने उतरी बसपा को पार्टी में बड़े बगावती तेवरों का भी सामना करना पड़ रहा है. सहारनपुर और कानपुर में कई पुराने और कद्दावर नेताओं ने बसपा छोड़ दी.

इस आपसी जोरआजमाइश के बीच कांग्रेस भी
विपक्षी पाले में सपा और बसपा की इस आपसी जोरआजमाइश के बीच कांग्रेस भी एक कोण बनाने को बैचैन है. लोकसभा चुनाव में बेहद खराब प्रदर्शन के बाद भी प्रियंका गांधी बीते कुछ महीनों में यूपी में लगातार सक्रिय रही हैं. उपचुनावों के दौरान ही उन्होंने अजय कुमार लल्लू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष भी नियुक्त करवाया और नई कमेटी भी बनवाई. कमजोर संगठन के बावजूद कांग्रेस भी उपचुनावों को बेहद शिद्दत से लड़ रही है. ऐसे में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि विपक्षी नंबर वन की होड़ में सपा और बसपा के मुकाबिल कांग्रेस कहां खड़ी दिखती है, क्योंकि उपचुनावों में विपक्ष का विपक्ष से मुकाबले का जो भी निष्कर्ष निकले, जो विपक्षी पार्टी बाजी मारेगी वह 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए अन्य विपक्षी दलों पर एक मनोवैज्ञानिक बढ़त कायम करने में सफल जरूर होगी.

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First published: October 15, 2019, 1:02 PM IST
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