Lockdown में घर बैठे बोर हो रहे लोगों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं इन डॉक्टर्स की कहानी
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Lockdown में घर बैठे बोर हो रहे लोगों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं इन डॉक्टर्स की कहानी
आगरा के सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ प्रभात अग्रवाल 16 लोगों की उस टीम में शामिल हैं, जो कोरोना पीड़ितों के डायरेक्ट संपर्क में हैं.

आगरा (Agra) के सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ प्रभात अग्रवाल कहते हैं कि ड्यूटी के 7 दिन पूरे होने के बाद वह क्वारेंटाइन सेंटर में चले जायेंगे. वहां अगले 14 दिन उन्हें अकेले ही बिताने पड़ेंगे. 14 दिन का टाइम पूरा होने के बाद ही वे घरवालों से मिलेंगे. वहीं एसएन मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड के इंचार्ज डॉ बलवीर सिंह 2 बच्चों और डॉक्टर पत्नी के साथ रहकर भी वे उनसे दूर हैं.

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लखनऊ. "लोगों को 21 दिन का लॉक डाउन (lockdown) बहुत बड़ा लग रहा है और वो भी अपने परिवार के साथ. ज़रा हमारे बारे में कोई सोचे. हम तो परिवारवालों से दूर हैं और तब तक दूर रहेंगे, जब तक कोरोना पीड़ितों का इलाज करते रहेंगे. पिछले 6 दिनों से लगातार या तो हॉस्पिटल या फिर इसके गेस्ट हाउस में रह रहे हैं. 7 दिन की ड्यूटी पूरी होने के बाद 14 दिन तक क्वारंटाइन सेंटर में रहेंगे. उसके बाद ही घरवालों से मिल पाएंगे. हॉस्पिटल में रहते हुए तो फ़ोन पर ठीक से बात भी नही हो पाती लेकिन किया क्या जाए? बीमारों का इलाज भी तो करना है."

ये भावना उस डॉक्टर की है, जो कोरोना संक्रमित मरीजों (COVID-19 Positive Patients) का इलाज कर रहे हैं. आगरा (Agra) के सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ प्रभात अग्रवाल पिछले 6 दिनों से कॉलेज में भर्ती कोरोना पीड़ितों का इलाज कर रहे हैं. डॉ प्रभात ने बताया कि इन दिनों दिन-रात का कोई भेद नहीं रह गया है. मरीजों की सेहत के साथ-साथ बड़ा दबाव इस बात का भी रहता है कि संक्रमण से कैसे बचा जाए? क्योंकि ड्यूटी के दौरान मरीजों के ही सम्पर्क में रहना पड़ता है.

डॉ अग्रवाल 16 लोगों की उस टीम में शामिल हैं, जो कोरोना पीड़ितों के डायरेक्ट संपर्क में हैं. इनमें 2 कंसलटेंट, 3 रेजिडेंट डॉक्टर, 3 नर्स, 3 वार्ड बॉय और 3 स्वीपर शामिल हैं. 2 फार्मासिस्ट भी हैं.



तो संक्रमण से बचने के लिए क्या करते हैं डॉक्टर्स?
कोरोना का संक्रमण इतना तेज है कि इससे बचने के लिए lockdown करना पड़ा लेकिन जो कोरोना संक्रमित मरीजों के बीच रहते हैं उनके लिए ये चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि बड़ी संख्या में डॉक्टर्स और स्टाफ भी पॉजिटिव हुए हैं. डॉ अग्रवाल कहते हैं कि उन्होंने इसका बहुत ध्यान रखा है. हॉस्पिटल से गेस्ट हाउस आने के बाद अपने कमरे में घुसने से पहले ही सभी कपड़े उतारकर उसे ब्लीचिंग पाउडर में डाल दिया जाता है. उसके बाद साबुन और शैम्पू से नहाने के बाद ही वे अपने कमरे में दाखिल होते हैं. जूतों को सैनिटाइजर से अच्छी तरह साफ करते हैं. घर से ड्यूटी पर आते समय सिर्फ बहुत जरूरी सामान ही लाया गया था. घड़ी, चेन, अंगूठी, चश्मा और पर्स घर पर ही छोड़ दिया गया था. जरूरत के लिए थोड़े से पैसे रख लिए थे. अस्पताल से गेस्ट हाउस लौटने बाद मोबाइल फ़ोन को कई बार सेनिटाइजर से साफ करते हैं.

डॉ अग्रवाल कहते हैं कि ड्यूटी के 7 दिन पूरे होने के बाद वह क्वारेंटाइन सेंटर में चले जायेंगे. वहां अगले 14 दिन उन्हें अकेले ही बिताने पड़ेंगे. 14 दिन का टाइम पूरा होने के बाद ही वे घरवालों से मिलेंगे. घर पर माता-पिता, बीवी और 2 बच्चे हैं. सभी उनके लिए चिंतित हैं.

घर पर रहकर भी परिवार वालों से दूरी
वहीं एसएन मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड के इंचार्ज डॉ बलवीर सिंह की कहानी तो और भी इमोशनल करने वाली है. 2 बच्चों और डॉक्टर पत्नी के साथ रहकर भी वे उनसे दूर हैं. डॉ बलवीर सिंह ने बताया कि वे अस्पताल का कामकाज खत्म होने के बाद रात में अपने घर लौटते तो हैं लेकिन किसी घरवाले से उनका संपर्क नहीं होता. उन्होंने घर के ग्राउंड फ्लोर पर ही एक कमरे को अपने लिए चुन लिया है. अस्पताल से लौटने के बाद वे सीधे उसी कमरे में जाते हैं. कपड़ों को ब्लीचिंग पाउडर के घोल में डालते हैं. जूतों को सेनिटाइज करते हैं. अच्छे से नहाने-धोने के बाद खाना उसी कमरे में घरवाले दे जाते हैं. फिर अगली सुबह नाश्ता करके अस्पताल पहुंच जाना होता है.

गला खराब हुआ तो परिवार को बिना बताए भाप से किया इलाज

डॉ बलवीर कहते हैं कि पिछले 3 दिनों से उनका गला खराब था लेकिन कोरोना की जांच कराने से पहले उन्होंने भाप लिया और इससे आराम हो गया. गला खराब होने की बात उन्होंने घरवालों को नहीं बताई थी. गर्म पानी मांगते वक़्त ये बताया कि एहतियात के लिए ऐसा कर रहे हैं. डॉ बलवीर ने बताया कि अपने घर में ही क्वारेंटाइन रहने का ये सिलसिला कब तक चलता रहेगा? ये कह पाना मुश्किल है लेकिन इसके अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं है.

बता दें कि आगरा ही वह पहला शहर है, जहां यूपी में पहली बार कोरोना से संक्रमण का मामला सामने आया था. हालांकि सुकून की बात ये है कि अभी तक किसी मरीज़ को वेंटिलेटर की जरूरत नहीं पड़ी है.

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