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लोकसभा चुनाव 2019: पश्चिमी यूपी में राजनीतिक दलों को देना होगा 'सरप्राइज टेस्ट'

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

यूपी में पहले चरण के मतदान में आठ सीटों पर गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, बागपत, सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और कैरा ...अधिक पढ़ें

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    (प्रांशु मिश्रा)

    लोकसभा सीटों की दृष्टि से देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में चुनावी लड़ाई तेज हो गई है. 11 अप्रैल को होने वाली पहले चरण की वोटिंग में पश्चिमी यूपी की आठ महत्वपूर्ण सीटों पर मतदान होने हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च को मेरठ से पार्टी के प्रचार की शुरुआत की है. लोकसभा चुनाव के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री मोदी की यह पहली चुनावी सभा थी.

    संभावना है कि पीएम मोदी सहारनपुर में 5 अप्रैल को एक और रैली को संबोधित करेंगे. इसके दो दिन बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सहारनपुर में एक संयुक्त रैली होने वाली है. यूपी में सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती राष्ट्रीय लोकदल के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं.

    पश्चिमी यूपी मेंं बीजेपी के 'ब्रांड मोदी' और विपक्षी गठबंधन की जाति अंकगणित के बीच रणनीतिक लड़ाई महसूस हो रही है. हालांकि इस क्षेत्र में गैर उच्च जाति हिंदू वोटर निर्णायक एक्स फैक्टर के तौर पर उभर सकता है. यहां पर कांग्रेस का प्रभाव केवल सहारनपुर क्षेत्र में ही है. पिछली बार के चुनाव परिणाम और हाल फिलहाल की राजनीतिक स्थिति पर अगर गौर किया जाए तो पिछड़ा वर्ग और दलित हिंदू वोट बैंक के नतीजे काफी हद तक निर्णायक साबित हो सकते हैं. अगर उनका रुख बदलता है तो वे चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकता है.

    पहले चरण के मतदान में आठ सीटों पर गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, बागपत, सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और कैराना में मतदान होगा. बीजेपी के पास वर्तमान में कैराना को छोड़कर सभी सीटें हैं. कैराना की सीट बीजेपी पिछले साल हुए उपचुनावों में सपा बसपा और रालोद के गठबंधन से हार गई थी.

    अगर राजनीतिक स्थिति पर गौर किया जाए तो कांग्रेस यहां नदारद है. जबकि यहां के अधिकांश मुस्लिम गठबंधन का साथ दे रहे हैं. अल्पसंख्यक इस क्षेत्र के लिए मजबूत वोट बैंक हैं. कांग्रेस यहां पर तीसरे स्थान पर है. दूसरी ओर, कांग्रेस ने सहारनपुर से इमरान मसूद को मैदान मेंं उतारा है. जबकि यहां के उच्च जाति के हिंदुओं का बड़े पैमाने पर बीजेपी को समर्थन मिल सकता है.

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    सहारनपुर में लगभग 38 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले मसूद और गठबंधन के उम्मीदवार हाजी फजलुर रहमान के बीच वोट बंटने की उम्मीद है. जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मसूद रनर-अप रहे थे. वहीं बिजनौर में मुस्लिम वोट बैंक 32 फीसदी, मेरठ और मुज़फ्फरनगर में 31 फीसदी, कैराना में 26 फीसदी, बागपत में 20 फीसदी, गाजियाबाद में 18.5 फीसदी और गौतम बौद्ध नगर में लगभग 14 फीसदी है.

    हालांकि कांग्रेस ने बिजनौर से नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मैदान में उतारा है, लेकिन वहां पर उन्हें बाहरी माना जाता है. इसलिए अब चुनाव में यह देखना बाकी है कि सिद्दीकी की उम्मीदवारी अल्पसंख्यक वोटों को कैसे प्रभावित करती है? यहां के अल्पसंख्यक उम्मीदवार खुद को बीजेपी का सीधा दावेदार मान सकते हैं. यहां पर गठबंधन के उम्मीदवार मलूक नागर गुर्जर समुदाय से हैं. जबकि बीजेपी सांसद और वर्तमान उम्मीदवार कुंवर भारतेंद्र जाट समुदाय से हैं. इसलिए दोनों के बीच सीधा मुकाबला होता दिख रहा है.

    बीजेपी को उच्च जाति के मतदाताओं की वफादारी पर पूरा भरोसा है, जिन्होंने पिछले चुनाव में भी उनका समर्थन किया था और जो उनका पारंपरिक वोटर है. बीजेपी ने यहां की आठ सीटों मेंं से चार सीटों पर उच्च जाति के उम्मीदवारों को उतारा है. पार्टी ने गाजियाबाद से जनरल वीके सिंह, गौतम बुद्ध नगर से महेश शर्मा, सहारनपुर से राघव खलनपाल और मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल को उतारा है.

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    इस वक्त गैर सवर्ण हिंदू वोटर बीजेपी और विपक्षी गठबंधन दोनों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. पिछले आम चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में इसी आधार पर एक बड़ा वर्ग बीजेपी में शामिल हो गया था. जाटों और गुर्जरों ने इन सीटों पर इसकी क्षतिपूर्ति की है. औसतन, इनमें से प्रत्येक सीट पर उनकी आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है.

    आंकड़ों के अनुसार, बागपत में गुर्जरों और जाटों की आबादी 38 फीसदी है. मुजफ्फरनगर में जाटों की आबादी 12 फीसदी और बिजनौर में 10.8 फीसदी है. जबकि इस क्षेत्र के कुछ निर्वाचन क्षेत्र जाट केंद्रित हैं जबकि गुर्जर आबादी समान रूप से बिखरी हुई है. कैराना में लगभग 7, गौतम बौद्ध नगर में 6.5%, मेरठ, सहारनपुर और गाजियाबाद में 5.5%, और बिजनौर में 6% गुर्जर आबादी है.

    इस क्षेत्र में अनुसूचित जातियों में चमार या जाटव समुदाय शामिल है. कैराना में चमार वोट बैंक 9 फीसदी है जबकि सहारनपुर में कुल दलित वोटबैंक 20 फीसदी है इसमें से 17 फीसदी चमार वोटबैंक है. यह क्षेत्र बीएसपी का पारंपरिक गढ़ रहा है. लेकिन बीजेपी ने वर्ष 2014 और 2017 के चुनाव में यहां पर बड़ी सेंधमारी की थी. हालांकि इस बार पिछले चुनाव के हिसाब से मोदी लहर नहीं दिख रही है.

    अब सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी दलित और ओबीसी वोटों में बड़ी सेंधमारी लगा पाएगी? क्या वे इस बार भी सफलता को दोहरा पाएगी और निर्णायक वोट 'जाट' को अपने पाले में करने में सफल रह पाएगी? इस बार यह भी देखना है कि गुर्जर वोट बैंक किसके पाले में जाएगा?

     

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    Tags: Akhilesh yadav, Lok Sabha Election 2019, Mayawati, Pm narendra modi, Politics, Uttar pradesh news

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