लाइव टीवी

UP ATS के फर्जी दस्तावेज से पासपोर्ट बनाने के केस में तत्कालीन सहायक पासपोर्ट अफसर बरी, 4 को सजा

News18 Uttar Pradesh
Updated: October 26, 2019, 2:09 PM IST
UP ATS के फर्जी दस्तावेज से पासपोर्ट बनाने के केस में तत्कालीन सहायक पासपोर्ट अफसर बरी, 4 को सजा
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट बनाने के मामले में चार लोगों काे सजा सुनाई गई है, वहीं मुख्य अभियुक्त बरी हो गए हैं.

यूपी एटीएस के फर्जी दस्तावेज पर पासपोर्ट बनाने के केस में एडीजे (भ्रष्टाचार निवारण) की कोर्ट ने चार दाेषियों को तीन-तीन साल की सजा के साथ 4000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया है. खास बात ये है कि मामले में गिरफ्तार किए गए तत्कालीन सहायक पासपोर्ट अफसर सुधाकर रस्तोगी को कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है.

  • Share this:
लखनऊ. उत्तर प्रदेश एंटी टेरेरिस्ट स्क्वॉड (UPATS) द्वारा गिरफ्तार फर्जी दस्तावेज की मदद से पासपोर्ट (Passport) ब नवाने वाले गिरोह के 4 सदस्यों मामले में अरमान खान, मारूफ, राजा सरदार उर्फ कुलविंदर सिंह और जावेद नकवी को लखनऊ की एडीजे कोर्ट 6 (भ्रष्टाचार निवारण) ने तीन साल की सजा सुनाई है. मुकेश कुमार सिंह, एडिशनल सेशन जज, (भ्रष्टाचार निवारण) की कोर्ट ने ये सजा सुनाई है. इसके साथ हर दोषी पर 4000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया है. खास बात ये है कि मामले में एटीएस द्वारा सबूतों से छेड़छाड़ और पासपोर्ट जारी करने में भ्रष्टाचार करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए तत्कालीन सहायक पासपोर्ट अफसर सुधाकर रस्तोगी को कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है. उनके खिलाफ एटीएस कोर्ट में आरोपियों के साथ कोई लिंक साबित नहीं कर सकी.

बता दें UP ATS ने 27 मार्च 2017 को लखनऊ में पांच स्थानों पर दबिश देकर पासपोर्ट कार्यालय के कुछ कर्मचारियों की मिली भगत से पैसा लेकर जाली दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट बनवाने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया था. मामले में यूपी एटीएस ने वर्ष 2017 में नजीराबाद निवासी अरमान खान, अर्शफाबाद निवासी मारूफ, कृष्णानगर निवासी राजा सरदार उर्फ कुलविंदर सिंह और गुईन रोड निवासी जावेद नकवी को गिरफ्तार किया था. सभी आरोपी लखनऊ के रहने वाले हैं. जिनके पास से कुल 73 पासपोर्ट, लैपटॉप, कम्प्यूटर प्रिन्टर और अन्य अवैध कागजात आदि बरामद हुए थे.

इनके खिलाफ एटीएस थाने में आईपीसी की धारा 419, 420, 467,468,471, 120बी व 12 पासपोर्ट अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की रोजाना सुनवाई कर 6 माह में निस्तारित करने का आदेश दिया था.

सबूतों से छेड़छाड़ और भ्रष्टाचार में गिरफ्तार हुए थे सुधाकर रस्तोगी

बता दें मामले में एटीएस ने 2017 में ही लखनऊ में पासपोर्ट सेवा केन्द्र पर तैनात सहायक पासपोर्ट अधिकारी सुधाकर रस्तोगी को गिरफ्तार किया था. उन पर विवेचना के दौरान सबूतों से छेड़छाड़ और पासपोर्ट जारी करने में भ्रष्टाचार करने के आरोप लगाया था. एटीएस के अनुसार सुधाकर रस्तोगी के खिलाफ थाना एटीएस, गोमतीनगर लखनऊ पर अभियोग संख्या 7/2017 के अंर्तगत आईपीसीधारा की धारा 419/420/467/468/471 और 12 पासपोर्ट अधिनियम का मुकदमा पंजीकृत किया गया है.

कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सका अभियोजन पक्ष

मामले में बरी किए गए सुधाकर रस्तोगी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता पुरनेंदु चक्रवर्ती और अधिवक्ता अनुज टंडन ने पैरवी की. अनुज टंडन ने बताया कि अभियोजन पक्ष सुधाकर रस्तोगी पर लगाए गए किसी भी आरोप के पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं कर सका. नहीं षड्यंत्र में लेकर किसी आरोपी के साथ उनके लिंक का सबूत पेश कर सका. अनुज टंडन ने बताया कि आरोप था कि सुधाकर रस्तोगी से पासपोर्ट दलाल मारूफ ने फोन कर गुलशेर, अयाज और फैजान का फर्जी दस्तावेज पर पासपोर्ट बनाने की बात कही. लेकिन अभियोजन इसे साबित नहीं कर सका.
Loading...

अनुज टंडन ने बताया कि कोर्ट ने साफ कहा कि अभियुक्तों के मोबाइल कॉल डाइवर्जन, सुनने व रिकॉर्ड किए जाने के संबंध में आईजी, एटीएस द्वारा प्रत्याशा में दी गई अनुमति व शासन द्वारा दी गई अनुमति की मूल या प्रमाणित प्रति प्रस्तुत नहीं की गई. जब एटीएस के सर्वर पर कॉल रिकॉर्ड की जा रही थी तो सभी ट्रांसक्रिप्ट, जो न्यायालय में पेश की गई, उनकी सीडी व धारा-65 (बी) भारतीय साक्ष्य अधिनियम का प्रमाण पत्र क्यों नहीं पेश किया गया. इसका भी कोई स्पष्टीकरण साक्ष्य के दौरान प्रस्तुत नहीं किया गया.

दस्तावेजों के वैरिफिकेशन पर उठे सवाल

मामले में ये साफ था कि पासपोर्ट सही थे, वहीं जो आरोप था कि फर्जी दस्तावेज लगाकर ये कार्य करवाया गया, तो फर्जी दस्तावेजों के वैरिफिकेशन का सुधाकर रस्तोगी से कोई लेना-देना साबित नहीं हो सका क्योंकि पासपोर्ट कार्यालय इस तरह का वैरिफिकेशन करता ही नहीं है. मामले में सुनवाई के बाद कोर्ट ने सुधाकर रस्तोगी को बरी करने का आदेश दिया है.

कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट बनने की प्रक्रिया में अंकपत्रों की जांच व पासपोर्ट ग्रांट करने के संबंध में वैरिफिकेशन ऑफिसर व ग्रांटिंग आफिसर की भूमिका भी कोई जांच नहीं की गई. आवेदक द्वारा शैक्षणिक प्रपत्रों के सही होने के संबंध में स्वयं शपथ पत्र दिया जा रहा है, ऐसी स्थिति में पासपोर्ट कार्यालय के वैरिफाइंग अफसर की क्या भूमिका है और उसके द्वारा आवेदक के शैक्षिणिक प्रपत्रों का सत्यापन किस स्तर तक अपेक्षित है, इस दिशा में भी विवेचना नहीं की गई. यह स्पष्ट नहीं हो सकता कि विधिक रूप से वैरिफाइंग अफसर के अधिकार व दायित्व क्या है.

कोर्ट ने कहा- आतंक से जुड़ा मामला नहीं, ये स्पष्ट नहीं जांच एटीएस से क्यों कराई गई?

कोर्ट ने ये भी कहा कि सम्पूर्ण साक्ष्य के विश्लेषण में राष्ट्र या राज्य की सुरक्षा या आतंकवाद का कोई पहलू प्रकरण में प्रारंभ से ही नहीं था, जिसे प्रस्तुत मामले के विवेचकों द्वारा भी स्वीकार किया गया है. आतंकवाद निरोधी दस्ते का गठन राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा व आतंकवाद की गतिविधियों के निरोध की दृष्टि से विशेष उद्देश्यों के अंतर्गत किया गया है. ऐसी स्थिति में हालांकि बचाव पक्ष द्वारा स्पष्ट रूप से क्षेत्राधिकार का प्रश्न नहीं उठाया गया लेकिन ये स्पष्ट नहीं हो सका कि विवेचना आतंकवाद निरोधी दस्ते जैसी संस्थान द्वारा क्यों की गई?

ये भी पढ़ें:

डायल 112 सेवा शुरू कर बोले सीएम योगी- समय के साथ यूपी पुलिस ने किए कई सुधार

अयोध्या विवाद: SC के फैसले से पहले CM योगी की अपील- साधु-संत बरतें संयम

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लखनऊ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: October 26, 2019, 2:09 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...