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आपके लिए इसका मतलब: UP विधान परिषद में भी भाजपा की बढ़ती जा रही है ताकत

लखनऊ में स्थित उत्तर प्रदेश विधानभवन (File Photo)
लखनऊ में स्थित उत्तर प्रदेश विधानभवन (File Photo)

विधान परिषद (Legislative Council) को राज्यसभा की तरह उच्च सदन कहा जाता है. इसके पीछे दो मंशा काम करती है. पहली तो ये कि यदि विधानसभा में किसी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिल भी जाये तो विधानपरिषद के सदस्य उसकी मनमानी रोक सकें. दूसरी हर क्षेत्र के प्रतिनिधि को मौका देना.

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लखनऊ. जितनी जबरदस्त चर्चा और गहमागहमी विधानसभा के चुनावों (Assembly Elections) में देखने को मिलती है, उतनी ही कम चर्चा और गहमागहमी विधान परिषद के चुनावों (MLC Elections) में रहती है. उच्च सदन परिषद में 6 साल के लिए विधायक चुने जाते हैं. देश के महज 6 राज्यों यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ही विधान परिषद है. यूपी में परिषद की 100 सीटें हैं. इनमें से खाली हुई 11 सीटों पर चुनाव हुए हैं.

जिन 11 सीटों पर चुनाव हुए हैं उनमें से 6 सीटें शिक्षक दल की जबकि 5 सीटें स्नातक दल की हैं. 100 विधायकों वाले उच्च सदन में 1/12 यानी 8 सीटें दोनों ही क्षेत्रों के लिए आरक्षित हैं. वैसे तो विधानपरिषद के चुनाव में पार्टियां भाग नहीं लेती हैं लेकिन, इस बार भाजपा के उतर जाने से सभी दलों ने अपने कैंडीडेट खड़े किए हैं.

11 सीटों में से कई सीटों के नतीजे आ गये हैं. इनमें भाजपा का दबदबा देखने को मिल रहा है. सबसे बड़ी खबर तो मेरठ-सहारनपुर से है, जहां से कई बार के शिक्षक विधायक ओम प्रकाश शर्मा चुनाव हार गए हैं.



कैसे बनती है परिषद
100 सीटों वाले उच्च सदन में हर क्षेत्र से विधायक चुने जाते हैं. पांच अलग-अलग तरीके से चुनकर विधायक सदन में पहुंचते हैं. 100 में से 36 स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि अपने विधायक को चुनते हैं. 8 विधायक शिक्षकों के द्वारा चुने जाते हैं. 8 विधायकों को वो मतदाता चुनते हैं, जो ग्रेजुएट होते हैं. 10 विधायकों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं. बाकी बची 38 सीटों पर विधानसभा के विधायक वोट करते हैं और विधान परिषद के विधायक चुनते हैं.

मौजूदा दलीय स्थिति

100 सीटों में सबसे ज्यादा विधायक सपा के हैं. 52 सपा के जबकि 19 भाजपा के हैं. बसपा के 8, कांग्रेस के 2, अपना दल (सोने लाल) के पास 1 सीट है. शिक्षक दल, स्नातक और निर्दलीयों के पास 4 सीटें हैं. इस तरह 86 सीटें भरी हैं जबकि 14 खाली हैं. इनमें से 11 पर चुनाव हुए हैं, जिनके नतीजे आने बाकी हैं.

कौन सी हैं 3 सीटें, जो हैं खाली

बदायूं की सीट खाली है. स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि इस सीट पर चुनाव करेंगे. इसके अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सदस्यता चले जाने से दूसरी सीट खाली रह गई है. ये बसपा से विधायक थे लेकिन, कांग्रेस में जाने के कारण इनकी सदस्यता चली गई थी. तीसरी खाली सीट मनोनीत सदस्य की है. सपा के राम सिंह यादव का कोरोना से निधन हो गया था. राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाने वाले 10 सदस्यों में से एक ये भी थे.

आपके लिए इसका मतलब

शिक्षक नेता डॉ. आर पी मिश्रा ने कहा कि शिक्षक दल और स्नातक दल के विधायकों का बहुत महत्व होता है. समाज के सबसे बुद्धिजीवी वर्ग का ये प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके मुद्दे सदन में सरकार के सामने उठाते हैं. समाज निर्माण में शिक्षकों और बुद्दीजीवियों का महत्व सभी को पता है. शिक्षक दल से विधायक रहे बहुत लोगों ने इस वर्ग के हित के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी है.

राजनीतिक दलों के इस चुनाव में उतर आने पर भाजपा से एमएलसी यशवंत सिंह ने कहा कि इससे विधायकों की आवाज और बुलंद होगी. सत्ताधारी पार्टी के विधायक होने के चलते ये सरकार के सामने नहीं बल्कि उनके साथ रहकर अपने क्षेत्र का बेहतर विकास कर सकेंगे. हालांकि पीसीएस अफसर रहे और इस बार चुनाव लड़े बाबा हरदेव सिंह ने कहा कि राजनीतिक दलों को इस चुनाव में नहीं उतरना चाहिए. इससे परिषद के गठन की मंशा को ठेस पहुंचती है. यदि उच्च सदन में भी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि पहुंच जायेंगे तो इसमें और विधानसभा में फर्क क्या रह जायेगा?

उच्च सदन कहा जाता है विधान परिषद, ये होती है मंशा

विधान परिषद राज्यसभा की तरह उच्च सदन कहा जाता है. इसके पीछे दो मंशा काम करती है. पहली तो ये कि यदि विधानसभा में किसी पार्टी को प्रचण्ड बहुमत मिल भी जाये तो विधानपरिषद के सदस्य उसकी मनमानी रोक सकें. विधानसभा में बहुमत वाली पार्टी का आमतौर पर पहले पांच सालों में परिषद में भी बहुमत नहीं रहता है. इससे सरकार पर अंकुश रहता है. दूसरी मंशा ये कि हर क्षेत्र के प्रतिनिधि को काम करने का मौका मिले. हालांकि परिषद को विधायक चुनने की बैक डोर इंट्री भी कहा जाता है.

हर सरकार की मंशा होती है कि उच्च सदन में भी उसका बहुमत हो, जिससे यदि कोई कानून बनाना हो तो कोई अड़चन न आए. सत्ताधारी भाजपा की भी यही मंशा है. फिलहाल उसके पास 100 में से 19 सदस्य हैं. जिन 11 सीटों पर चुनाव हुए हैं उनमें से ज्यादातर सीटों पर उसकी बढ़त हो गई है. ऐसे में पार्टी परिषद में बहुमत के थोड़ा और करीब पहुंचती जा रही है.
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