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ANALYSIS: सीट बंटवारे से मायावती की उम्मीदें बढ़ीं, अखिलेश को हो सकता है घाटा!

ANALYSIS: सीट बंटवारे से मायावती की उम्मीदें बढ़ीं, अखिलेश को हो सकता है घाटा!

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने अपने 6 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है. इस लिस्ट में समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव को इस बार मैनपुरी से चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है. पार्टी की संसदीय समिति के अध्यक्ष रामगोपाल यादव ने इन छह उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है. मुलायम परिवार के वारिस और बदायूं से सिटिंग एमपी धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से सिटिंग एमपी सांसद अक्षय यादव पर इस बार भी भरोसा दिखाया गया है.

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने अपने 6 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है. इस लिस्ट में समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव को इस बार मैनपुरी से चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है. पार्टी की संसदीय समिति के अध्यक्ष रामगोपाल यादव ने इन छह उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है. मुलायम परिवार के वारिस और बदायूं से सिटिंग एमपी धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से सिटिंग एमपी सांसद अक्षय यादव पर इस बार भी भरोसा दिखाया गया है.

दरअसल सीट बंटवारे पर गौर करें तो समाजवादी पार्टी के खाते में जो सीटें आई हैं, उनमे से करीब 9 से 10 सीटें ऐसी हैं, जहां उसकी राह आसान नहीं होगी.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी को रोकने के लिए सपा-बसपा गठबंधन में कौन किस सीट से लड़ेगा? इसका ऐलान हो चुका है. सपा 37 तो बसपा 38 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. सीट बंटवारे में कोई एक फ़ॉर्मूला लागू नहीं हुआ है. हालांकि कई समीकरणों को साधते हुए 2014 के परिणामों को प्राथमिकता दी गई है लेकिन सीट बंटवारे में बसपा सुप्रीमो मायावती की पसंद को तरजीह दी गई है. विशेषज्ञों और आंकड़ों को देखें तो यह सौदा समाजवादी पार्टी के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है.

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दरअसल सीट बंटवारे पर गौर करें तो सपा के खाते में जो सीटें आई हैं, उनमे से करीब 9 से 10 सीटें ऐसी हैं, जहां उसकी राह आसान नहीं होगी. वहीं बसपा के खाते में सपा की तुलना में बेहतर उम्मीदों वाली सीटें गई हैं. गठबंधन का फ़ॉर्मूला यही तय हुआ था कि 2014 में जो जहां से दूसरे नंबर पर था, वह वहीं से चुनाव लड़ेगा. लेकिन इस फ़ॉर्मूले को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. साथ ही सपा को अधिकतर शहरी सीटें हासिल हुई हैं, जो कि बीजेपी की गढ़ मानी जाता है. बसपा को अधिकांश ग्रामीण अंचल की सीटें मिली हैं.

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पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी. वहीं सपा 31 सीटों पर दूसरे और पांच सीटें उसकी झोली में गई थी. दो उपचुनाव में भी सपा जीती. इस लिहाज से सपा 38 सीटों पर भारी थी. लेकिन सीट बंटवारे में उसे एक सीट कम मिली तो बसपा को पिछले प्रदर्शन के मुकाबले चार सीट ज्यादा मिली है.

2014 में ख़राब प्रदर्शन वाली सीटें भी बसपा को

2014 के चुनाव नतीजे में 13 सीटें ऐसी हैं, जहां बसपा पहले या दूसरे स्थान पर भी नहीं थी. लेकिन उसे वह सीटें मिली हैं. ये सीटें हैं- सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, मेरठ, गौतमबुद्ध नगर, आंवला, फर्रुखाबाद, हमीरपुर, कैसरगंज, श्रावस्ती, बस्ती और लालगंज.

2014 में ख़राब प्रदर्शन वाली सीटें भी सपा को

वहीं सपा को 15 सीटें ऐसी मिली हैं, जहां वह पहले या दूसरे स्थान पर नहीं थी. ये सीटें हैं- कैराना, गाजियाबाद, हाथरस, खीरी, हरदोई, लखनऊ, कानपुर, बांदा, फूलपुर, फैजाबाद, कौशाम्बी, महाराजगंज, चंदौली, मिर्जापुर और राबर्ट्सगंज.

28 से 30 सीटों पर ही मजबूत दिख रही सपा

सपा के कोटे में वाराणसी, लखनऊ, गाजियाबाद व गोरखपुर जैसी मुश्किल सीटें भी गई हैं. सपा के एक पूर्व मंत्री का कहना है कि बंटवारे में असंतुलन अधिक हो जाने से सपा 37 सीटों के बजाय 28 से 30 सीटों पर ही मजबूती से लड़ पाएगी. इतना ही नहीं पश्चिम में संगठन को बचाना भी सपा के लिए मुश्किल होगा. दरअसल मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पश्चिम के जिले सपा के लिए कठिन माने जाते रहे हैं. बसपा का दलित व मुस्लिम गठजोड़ और रालोद का जाट मुस्लिम समीकरण मजबूत होगा तो सपा के लिए भविष्य में दिक्कतें और बढ़ेंगीं. मेरठ और सहारनपुर मंडल में सपा के कोटे में एक-एक सीट ही आई है. मुस्लिम बाहुल्य इस इलाके में बसपा की ओर मुसलमानों का रुझान बना रहा तो आने वाले दिनों में सपा को अपना संगठन बचा पाना भी आसान नहीं होगा.

शुरू हो सकता है इस्तीफों का दौर

इस सीट बंटवारे का नुकसान सपा को अपने भीतर भी होगा. इस बात के संकेत गुरुवार को सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव दे चुके हैं. मुलायम का कहना है कि इस गठबंधन से दूरगामी नतीजों की अनदेखी हुई है क्योंकि 80 में से आधी सीटें तो हम बिना लड़ाई के ही हार गए. जिन सीटों पर मजबूत उम्मीदवार थे और चुनाव के लिए तैयारी में जुटे थे, उनमे नाराजगी स्वाभाविक है. एक-दो दिन में इस्तीफों का दौर भी शुरू हो जाएगा. इस संभावना को भांपते हुए ही मुलायम ने नेताओं से कहा कि टिकट और चुनाव चिन्ह देना अखिलेश के हाथ में है. लेकिन किसे हटाना है? उनके हाथ में है. वे अपनी-अपनी दावेदारी उन्हें और राम गोपाल यादव को दे सकते हैं.

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Tags: Akhilesh yadav, BSP, Lok Sabha Election 2019, Mayawati, Samajwadi party, Up news in hindi

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