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यूपी विधानसभा उपचुनाव: लखनऊ कैंट में कम वोटिंग से मुकाबला हुआ दिलचस्प, बीजेपी की बढ़ीं धड़कनें

News18 Uttar Pradesh
Updated: October 22, 2019, 1:45 PM IST
यूपी विधानसभा उपचुनाव: लखनऊ कैंट में कम वोटिंग से मुकाबला हुआ दिलचस्प, बीजेपी की बढ़ीं धड़कनें
लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर कम वोटिंग प्रतिशत ने मुकाबला दिलचस्प कर दिया है.

दरअसल 2012 को छोड़ दें तो 1991 से ही इस सीट पर बीजेपी (BJP) का कब्जा रहा है. हाल ही में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीतने वाली डॉ रीता बहुगुणा जोशी ने ही यहां बीजेपी को 2012 में कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर मात दी थी, फिर 2017 में उन्होंने यहां से बीजेपी का परचम दोबारा लहराया था.

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लखनऊ. यूपी विधानसभा उपचुनाव (UP Assembly By-election) में इस बार लखनऊ की कैंट विधानसभा (Lucknow Cantt Assembly Seat) में कम वोटिंग से बीजेपी (BJP) की धड़कनें बढ़ा दी हैं. बीजेपी का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है क्योंकि पहली बार बसपा भी उपचुनाव मैदान में है. 2017 की बात करें तो यहां बीजेपी ने सपा प्रत्याशी अपर्णा यादव काे हराया था, बसपा उस चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी. दरअसल इस बार उपचुनाव में कैंट में कुल 29.55 लोगों ने ही अपने वोट डाले. इससे कम वोटिंग 1991 के विधानसभा चुनाव में हुई थी, जब इस सीट पर 28.42 फीसदी वोटिंग हुई थी. 27 साल बाद कम हुई वोटिंग से बीजेपी में चर्चाओं का दौर शुरू है. दरअसल 2012 को छोड़ दें तो 1991 से ही इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा है. हाल ही में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीतने वाली डॉ रीता बहुगुणा जोशी ने ही यहां बीजेपी को 2012 में कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर मात दी थी, फिर 2017 में उन्होंने यहां से बीजेपी का परचम दोबारा लहराया था.  इस बार उन्हीं के सीट खाली करने से ये उपचुनाव हुआ है.

बता दें उपचुनाव में बीजेपी ने अपने पूर्व विधायक को टिकट दिया. सुरेश तिवारी 1996 से 2007 तक लगातार विधायक रहे हैं. बीजेपी प्रत्याशी सुरेश तिवारी कहते हैं कि जनता चुनाव लड़ रही है. मुहर मोदी जी और योगी जी के नीतियों पर ही लगेगी. बाकी प्रत्याशियों को सुरेश तिवारी बाहरी बताते हैं.

सपा ने कभी नहीं जीता चुनाव
2017 के विधानसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी की अपर्णा यादव रही थीं. इस बार हो रहे उपचुनाव में सपा ने अपर्णा को प्रत्याशी नहीं बनाया है. इस बार मेजर आशीष चतुर्वेदी सपा के प्रत्याशी हैं, जो सपाईयों के लिए भी नए हैं. सैनिक कल्याण संघ के भूतपूर्व अध्यक्ष मेजर आशीष अपनी जीत का दावा कर रहे हैं.

वहीं कांग्रेस ने नया चेहरे के रूप में दिलप्रीत सिंह को उतारा है. कांग्रेस 2012 में जरूर ये सीट जीती थी, लेकिन उसमें रीता जोशी का प्रत्याशी होना भी अहम था. लखनऊ कैंट सीट पर पहाड़ के वोटरों की संख्या अच्छी-खासी है. 2012 के चुनाव में रीता जोशी को 63052 वोट मिले थे, उस समय बीजेपी प्रत्याशी सुरेश तिवारी को 41,299 वोट मिले थे. बसपा तीसरे नंबर पर रही थी. इस बार भी कांग्रेस दमखम लगा रही है.

पहली बार मैदान में है बसपा

इसके अलावा पहली बार बसपा भी उपचुनाव लड़ रही है. बसपा ने अरुण द्विवेदी को अपना उम्मीदवार बनाया है. भले ही बसपा पहली बार उपचुनाव लड़ रही हो, लेकिन उम्मीदवार अनुभवी हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में लखनऊ उत्तरी से अरुण द्विवेदी चुनाव लड़ चुके हैं. अब कैंट में दमखम लगाए हुए हैं. इनका मानना है कि बसपा पहली बार उपचुनाव में उतरी है लेकिन दावेदारी मजबूत है.
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बसपा और सपा कभी नहीं जीत पाई है कैंट विधानसभा सीट
लखनऊ जिले की कैंट विधानसभा सीट में कुल 385341 मतदाता हैं. इनमें से 209870 पुरुष मतदाता और 175447 महिला मतदाता है. इस सीट पर 24 मतदाता ट्रांसजेंडर भी हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की रीता बहुगुणा जोशी को कुल 95402 वोट मिले थे जबकि समाजवादी पार्टी की अपर्णा यादव को कांग्रेस समर्थन के बाद 61606 वोट मिले थे. बीएसपी को 26036 हजार वोट मिले थे. कैंट की सीट पर बीएसपी और सपा कभी जीत दर्ज नहीं करा पाई है.

वैसे मत प्रतिशत की बात करें तो 2007 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग की हालत जरूर पतली हो गयी थी, जब इस सीट पर महज 29.65 फीसदी वोट पड़े थे लेकिन, तब भी स्थिति इस बार से बेहतर थी. अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस कैंट के मतदाताओं ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 51 फीसदी वोटिंग की थी, इस बार उससे आधे से थोड़े ही अधिक वोटरों ने वोट डाले. चुनाव से ऐसी नीरसता में कैंट ने रिकार्ड कायम कर दिया है. प्रदेश की जिन 11 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें कैंट सीट पर ही सबसे कम वोटिंग हुई है.

1985 में मत प्रतिशत रहा था 23.92 फीसदी

साल 1985 से अभी तक हुए उपचुनाव के नतीजों पर गौर करें तो ये साफ दिखाई देता है कि कैंट में हमेशा ही वोटिंग कम होती रहती है लेकिन इस बार तो कम वोटिंग प्रतिशत ने रिकार्ड ही बना दिया. आईये जानते हैं कि पिछले विधानसभा चुनावों में इस सीट पर कितनी वोटिंग हुई

1985 - 23.92 फीसदी
1989 - 27.52 फीसदी
1991 - 28.42 फीसदी
1993 - 53 फीसदी
1996 - 36 फीसदी
2002 - 31 फीसदी
2007 - 29.65 फीसदी
2012 - 50.47 फीसदी
2017 - 51 फीसदी

1991 से लगातार ये सीट बीजेपी जीतती रही है

अब आखिर क्या वजह है इसके पीछे और कम वोटिंग प्रतिशत का आखिर क्या नतीजा निकाला जाये? वैसे तो ये बात गैर मामूली लगती है कि कम वोटिंग प्रतिशत से रूलिंग पार्टी को फायदा नहीं होगा. कम से कम कैंट सीट पर तो आंकड़े इसके पक्ष में गवाही नहीं देते. बीजेपी के जन्म के बाद से ही ये सीट उसकी पारम्परिक सीट बनकर उभरी है. वोटिंग कम हो या ज्यादा इस सीट पर बीजेपी जीतती जरूर है. 1991 से लगातार ये सीट बीजेपी जीतती रही है. सिर्फ 2012 में उसको हार का सामना करना पड़ा. तब कांग्रेस की नेता रहीं रीता बहुगुणा जोशी ने बीजेपी से ये सीट छीन ली थी. कितनी अजीब बात है कि उनके बीजेपी से सांसद बन जाने के कारण ही ये सीट खाली हुई और इस पर उपचुनाव हुआ है. मतलब साफ है कि भले ही वोटिंग कम हुई हो लेकिन, बीजेपी अभी तक ये सीट इस हालात में भी जीतती रही है.

एकतरफा चुनाव लगने के कारण हुआ वोटर का मोहभंग

अब कारणों की बात करते हैं तो कैंट के कई मतदाताओं और नेताओं से न्यूज़ 18 ने बात की. नामांकन के बाद से ही इस सीट पर कोई राजनीतिक सरगर्मी देखने को नहीं मिली. पूरे चुनाव कोई हलचल नहीं दिखी. भाजपा के नेता चेतन सिंह ने बताया कि इसके पीछे दो अहम वजह हो सकती हैं. पहला तो ये कि लोगों को पता है कि ये सीट बीजेपी जीतेगी. ऐसे में बीजेपी विरोधी वोटरों को वोट देने में कोई दिलचस्पी नहीं रही होगी. चुनाव तब चढ़ता है, जब संघर्ष दोनों ओर से हो. कैंट का चुनाव एकतरफा लगने के कारण भी लोगों का वोटिंग से मोहभंग हुआ होगा. दूसरा कारण छुट्टी में घरेलू कामकाज निपटाना माना जा सकता है क्योंकि इस उपचुनाव से सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लिहाजा लोगों ने वोट देने से ज्यादा जरूरी आने वाली दीवाली के लिए घरों की सफाई और खरीददारी को समझा. इसलिए भी पोलिंग बूथ पूरे दिन खाली रहे.

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First published: October 22, 2019, 1:40 PM IST
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