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UP उपचुनावः सपा ने मारी बाजी, गठबंधन तोड़ने से बसपा को हुआ सीधा नुकसान

News18 Uttar Pradesh
Updated: October 25, 2019, 2:34 PM IST
UP उपचुनावः सपा ने मारी बाजी, गठबंधन तोड़ने से बसपा को हुआ सीधा नुकसान
अखिलेश यादव और मायावती लोकसभा चुनाव साथ में लड़े थे.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 11 सीटों पर उपचुनाव के नतीजों ने सूबे में विपक्षी दलों की सियासी कद-काठी भी तय कर दी है. बाजी अखिलेश यादव की सपा ने मारी है तो मायावती की बसपा फिसड्डी साबित हुई, वहीं कांग्रेस के लिए नतीजों ने उम्मीदें जगाई हैं.

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रंजीव
लखनऊ.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 11 सीटों पर उपचुनाव के नतीजों ने सूबे में विपक्षी दलों की सियासी कद-काठी भी तय कर दी है. उपचुनाव में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी व कांग्रेस के बीच खुद को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी पार्टी नंबर 1 साबित करने की होड़ भी थी. इसमें बाजी अखिलेश यादव की सपा ने मारी है तो मायावती की बसपा फिसड्डी साबित हुई, वहीं कांग्रेस के लिए नतीजों ने उम्मीदें जगाई हैं.

विपक्षी दलों के प्रदर्शन के लिहाज से देखें तो यह उपचुनाव बसपा के पराभव की कहानी कह रहा है. बसपा करीब डेढ़ दशक बाद यूपी में उपचुनाव लड़ने उतरी लेकिन नतीजों में फिसड्डी रही. यह नतीजे इसलिए खास मायने रखते हैं क्योंकि मायावती ने पांच महीने पहले ही लोकसभा चुनावों के लिए सपा के साथ हुए गठबंधन को तोड़ने का ऐलान कर एकला चलो की घोषणा की थी. अकेले लड़कर सपा तो खुद को विपक्षियों में अव्वल स्थापित कर ले गई लेकिन बसपा ने सपा के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव में हासिल की अपनी बढ़त भी गंवा दी.

गठबंधन किया तो 10 सीटों पर मिली थी जीत

सपा के साथ गठबंधन में बसपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में दस सीटों पर जीत मिली थी जो कि यूपी में पिछले पांच साल में हुए चुनावों का उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा. वरना 2014 के लोकसभा चुनाव में वह अकेले लड़कर शून्य और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में वह सिर्फ 19 सीटों पर सिमट गई थी. इन उपचुनावों में वह अकेले लड़ी तो फिर शून्य पर आ गई. इन 11 सीटों में जलालपुर की सीट उसके पास थी लेकिन वह भी वह लोकसभा चुनाव की अपनी गठबंधन साथी सपा के हाथों ही हार गई.

Akhilesh yadav and mayawati
उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने तीन सीटें जीती है. (अखिलेश यादव और मायावती की फाइल फोटो)


इतना ही नहीं जहां सपा ने न सिर्फ अपने कब्जे की रामपुर सीट बचाई बल्कि भाजपा से जैदपुर की सीट छीन ली और भाजपा के खिलाफ पांच सीटों पर मुख्य मुकाबले में रहते हुए दूसरे नंबर पर आई. वहीं बसपा सिर्फ इगलास में ही भाजपा के खिलाफ मुख्य मुकाबले में रह सकी. शायद उसकी एक वजह यह भी रही कि इगलास में सपा का कोई प्रत्याशी नहीं था. उसने यह सीट राष्ट्रीय लोकदल के लिए छोड़ी थी लेकिन उसका प्रत्याशी समय पर पर्चा नहीं भर पाया. तीन सीटों पर बसपा तीसरे नंबर पर तो बाकी जगह चौथे यहां तक कि पांचवे नंबर पर उतर गई. चार सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई. उसका वोट प्रतिशत भी पहले से घटकर करीब 17% पर आ गया जबकि सपा का पहले बढ़कर करीब 23% हो गया.
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गठबंधन तोड़ा तो उठे सवाल
बसपा के इस निराशाजनक प्रदर्शन के कारण ही लोकसभा चुनावों के बाद सपा से गठबंधन तोड़ने के मायावती के एकतरफा ऐलान पर सवाल उठने लगे हैं. उन्होंने तब कहा था कि सपा से गठबंधन कर कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि सपा अपना वोट बसपा को नहीं दिला पाई. उपचुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि इन क्षेत्रों में भाजपा के खिलाफ वोट देने वाले मतदाताओं ने मायावती के निष्कर्ष को गलत ठहराते हुए बसपा की बजाय सपा को चुना. इनमें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित बलहा सीट भी शामिल है जहां भाजपा के खिलाफ सपा मुख्य मुकाबले में रही और बसपा तीसरे नंबर पर चली गई. इसलिए यह सवाल भी उठने लगे हैं कि बसपा के जिस दलित वोट आधार में भाजपा पहले ही सेंध लगा चुकी थी क्या अब उसमें सपा ने भी अपना प्रभाव बनाना शुरू कर दिया है?

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यूपी के उपचुनाव में सभी दलों की प्रतिष्ठा दांव पर थी. (फाइल फोटो)


कांग्रेस के लिए संतोषप्रद नतीजे
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व राजनीति विश्लेषक मनीष हिंदवी कहते हैं, “विपक्षी दलों के प्रदर्शन के नजरिए से देखें तो सपा के लिए नतीजे उत्साहप्रद और कांग्रेस के लिए संतोषप्रद रहे हैं लेकिन असली हार बसपा की हुई है. 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए जहां सपा एवं कांग्रेस को उपचुनाव के नतीजों से मनोवैज्ञानिक ताकत मिली है वहीं मायावती के लिए खतरे की घंटी है.” कांग्रेस के लिए नतीजे वाकई संतोषप्रद हैं, भले ही वह सीट एक भी नहीं जीत पाई. यूपी की राजनीति में लंबे अरसे बाद उसका वोट प्रतिशत दहाई की संख्या छूकर इस उपचुनाव में 11.5 प्रतिशत रहा. भाजपा के खिलाफ वह दो सीटों, सहारनपुर की गंगोह एवं कानपुर के गोविंदनगर में मुख्य मुकाबले में रहते हुए दूसरे नंबर पर आई.

कांग्रेस के प्रदर्शन के खास मायने क्यों
गोविंदनगर में कांग्रेस के प्रदर्शन के खास मायने इसलिए हैं क्योंकि भाजपा का मजबूत गढ़ माने जानेवाले कानपुर की इस सीट पर उसने एक युवा चेहरे को उतारा था. खास बात यह कि उपचुनावों में कांग्रेस ने यह प्रदर्शन बेहद विपरीत परिस्थितियों में हासिल किया है. लोकसभा चुनावों में बुरी हार, उपचुनावों के बीच में ही नए प्रदेश अध्यक्ष व नई राज्य कमेटी का गठन और राष्ट्रीय स्तर के किसी नेता के प्रचार के लिए न आने के बावजूद कांग्रेस ने अपने लिए उम्मीद कायम रखने के संकेत दिए हैं. उत्साहित कांग्रेस इसे प्रियंका गांधी की यूपी में सक्रियता का प्रभाव मान रहे हैं लेकिन हिंदवी कहते हैं, कांग्रेस इन नतीजों से संतोष जरूर कर सकती है लेकिन यूपी में प्रभाव बढ़ाने के लिए उसे प्रभावी संगठन बनाना होगा क्योंकि 2022 में सिर्फ ग्यारह नहीं बल्कि विधानसभा की सभी सीटों पर मुकाबला होगा.

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First published: October 25, 2019, 2:34 PM IST
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