कोरोना काल में बदल रही यूपी की राजनीति, जाति, धर्म से इतर इस बार हावी हो रहे जनता से जुड़े असली मुद्दे?
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कोरोना काल में बदल रही यूपी की राजनीति, जाति, धर्म से इतर इस बार हावी हो रहे जनता से जुड़े असली मुद्दे?
समाजवादी पार्टी ने सोमवार को पूरे प्रदेश में किया था जोरदार प्रदर्शन

यूपी में विपक्षी पार्टियां (Opposition Parties) सरकार को घेरने में जुटी हैं. मुद्दे जाति या धर्म से जुड़े नहीं हैं. ये जरूर सच है कि जिन मुद्दों पर पार्टियों ने आंदोलन शुरु किया है, ऐसा करने के लिए उन्हें विवश होना पड़ा है. सोशल मीडिया के जरिये उन मुद्दों को काफी जोर मिला है.

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लखनऊ. लम्बे समय बाद ऐसा दिखाई दे रहा है कि यूपी (Uttar Pradesh) में जनता के असली मुद्दों पर बात हो रही है. जातिवाद की हवा कुछ दिन पहले बहुत तेज बही थी लेकिन, अब उस पर गर्द जमती जा रही है. उसकी जगह वे मुद्दे ले रहे हैं जिनका लोगों के जीवन से सीधा सरोकार है. ठाकुर-ब्राह्मण राजनीति (Thakur-Brahmin Polituics) को छोड़कर पार्टियां बेरोजगारी, किसान और भ्रष्टाचार पर आंदोलन करने में जुट गयी है. वैसे तो ये आदर्श स्थिति है. लाख टके का सवाल ये है कि कितने दिनों तक ये मुद्दे टिके रहेंगे.

तो विवश हो रही हैं पार्टियां?

यूपी में विपक्षी पार्टियां सरकार को घेरने में जुटी हैं. मुद्दे जाति या धर्म से जुड़े नहीं हैं. ये जरूर सच है कि जिन मुद्दों पर पार्टियों ने आंदोलन शुरु किया है, ऐसा करने के लिए उन्हें विवश होना पड़ा है. सोशल मीडिया के जरिये उन मुद्दों को काफी जोर मिला है. किसानों की आत्महत्याओं को लेकर कांग्रेसी नेता बुन्देलखण्ड के दौरे पर रहे तो आम आदमी पार्टी ने कोरोना किट में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलन किया. देर से ही सही लेकिन, समाजवादी पार्टी ने भी बेरोजगारी पर पूरे प्रदेश में आंदोलन किया. दूसरी तरफ सत्ताधारी बीजेपी भी मुद्दों को लेकर बात कर रही है. विपक्षी पार्टियों के सवालों पर योगी सरकार का एक्शन यही तो दिखाता है कि बीजेपी को भी मुद्दों पर बात करनी पड़ रही है. कोरोना किट घोटाले की जांच के आदेश इन्हीं कदमों में से से एक है. तो क्या यूपी की राजनीति में इसे बदलाव के तौर पर देखा जाये?



कोरोना काल में राजनीति के मुद्दे भी बदल गये
प्रयागराज के गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण तिवारी ने कहा कि काश ऐसा ही होता रहे. इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना काल में राजनीति के मुद्दे भी बदल गये हैं लेकिन, डर इस बात का है कि ये कितने दिनों तक टिके रहेंगे. अक्सर ऐसा देखा गया है कि जिन मुद्दों पर आंदोलन होता है उनपर चुनाव नहीं होते.

कब तक टिकेंगे ये मुद्दे?

आगरा विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान विभाग के हेड रह चुके प्रो बृजेश चन्द्रा ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों को मुद्दों पर बात करनी पड़ रही है लेकिन, मीडिया को भी ऐसा करना पड़ेगा या ऐसा करना चाहिए. वैसे तो सोशल मीडिया के जरिये काफी बात हो रही है लेकिन, मेनस्ट्रीम मीडिया में इसकी चर्चा बिना चर्चा ये सिलसिला बहुत लम्बा नहीं चल सकता. तो आखिर फिर ये मुद्दे टिके कैसे रहेंगे? क्योंकि चुनाव में तो अभी बहुत वक्त है. युवाओं को गोलबन्द करने में लगे पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने कहा कि देखिये आज के समय न तो कोई जयप्रकाश नारायण हो सकता है और ना ही अन्ना हजारे. अरविंद केजरीवाल भी नहीं. इनमें से कुछ की छवि तो बरकरार है लेकिन, कुछ डिसक्रेडिट भी हुए हैं. हम मुद्दों को तब तक जिन्दा रखेंगे जब तक इनका समाधान नहीं हो जाता. कम से कम बेरोजगारी तो चुनावी मुद्दा रहेगी ही. जाहिर है सोशल मीडिया के जरिये आंदोलन को जब तक जिन्दा रखा जायेगा तब तक राजनीतिक दल भी इसपर मुखर रहेंगे.
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