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UP Poll-Tricks: मुख्तार कबूल करेंगे AIMIM की पेशकश? देखें, लाभ-नुकसान का गणित

ओवैसी की पार्टी ने अपना हित साधने के लिए मुख्तार अंसारी को खुला निमंत्रण दिया है.

ओवैसी की पार्टी ने अपना हित साधने के लिए मुख्तार अंसारी को खुला निमंत्रण दिया है.

Political Equation : मुख्तार अंसारी AIMIM का दामन थामेंगे या नहीं? हालांकि उनके ऐसा करने के रास्ते में कई दुश्वारियां दिखाई दे रही हैं. मुख्तार के AIMIM ज्वॉइन करने से किसको क्या फायदा और किसको क्या नुकसान होगा - यह समझना दिलचस्प होगा.

  • News18Hindi
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लखनऊ. जेल में बंद माफिया डॉन मुख्तार अंसारी को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपने टिकट पर चुनाव लड़ने की खुली पेशकश की है. मजलिस के प्रवक्ता असीम वकार ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि मायावती ने भले ही मुख्तार अंसारी का टिकट काट दिया हो, लेकिन AIMIM के दरवाजे हमेशा खुले हैं. अब चर्चा चल पड़ी है कि क्या मुख्तार अंसारी AIMIM का दामन थामेंगे. हालांकि उनके ऐसा करने के रास्ते में कई दुश्वारियां दिखाई दे रही हैं. तो मुख्तार के AIMIM ज्वॉइन करने से किसको क्या फायदा और किसको क्या नुकसान होगा, आइए समझते हैं राजनीतिक समीकरण :

ओवैसी के साथ से मुख्तार का नुकसान

मुख्तार अंसारी और उनके परिवार का प्रभाव मऊ, गाजीपुर, बलिया और वाराणसी के कुछ इलाकों में माना जाता है. अंसारी परिवार ज्यादा ताकतवर मऊ और गाजीपुर में रहा है. मुख्तार खुद मऊ से विधायक हैं और उनके भाई अफजाल अंसारी गाजीपुर से सांसद. अफजाल ने भाजपा के कद्दावर नेता मनोज सिन्हा को 2019 की भाजपा की आंधी में हराया था. ज्यादातर लोगों को लगता है कि अंसारी परिवार मुस्लिम वोटों की बदौलत फतह हासिल करता है. लेकिन यह सच नहीं है. मऊ में तो मुस्लिम आबादी थोड़ी ज्यादा है, लेकिन गाजीपुर में तो मुस्लिम वोटरों की संख्या कई पायदान नीचे है. अंसारी परिवार का सदस्य यहां से इसलिए चुनाव जीतता है कि उसे हिंदुओं का वोट जबरदस्त मिलता रहा है. ऐसे में मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली पार्टी AIMIM ज्वॉइन करने का मतलब है अपने इस विनिंग कॉम्बीनेशन को खुद ही नष्ट करना. ऐसा करके मुख्तार को घाटा ही होगा.

AIMIM को नाउम्मीदी ही हाथ लगने के कयास

5 बार से लगातार विधायक मुख्तार अंसारी पहले बसपा में थे. फिर पार्टी से निकाले गए. अपनी पार्टी कौमी एकता दल बनाई. फिर उसका विलय बसपा में कर लिया. पार्टी में आने और जाने के बावजूद वे विधायक चुने जाते रहे. यानी मऊ में मुख्तार अंसारी की अपनी पकड़ उन्हें चुनाव जीताती है. पार्टी का सिंबल कोई खास रोल अदा नहीं करता. ऐसे में AIMIM को नाउम्मीदी ही हाथ लगने के कयास लगाए जा रहे हैं. मुख्तार क्यों फिर से नई पार्टी ज्वॉइन करेंगे.

सपा और बसपा के काडर वोटों की दरकार

बसपा ने मुख्तार अंसारी से किनारा कर लिया है, लेकिन उनके भाई अफजाल अंसारी बसपा से ही गाजीपुर के सांसद हैं. वे पार्टी में बने हुए हैं. दूसरी तरफ उनके एक और भाई सिगबतुल्लाह अंसारी ने सपा ज्वॉइन कर ली है. कहने का मतलब ये कि अब तक अंसारी परिवार का जुड़ाव या तो सपा से रहा है या बसपा से. इसके भी राजनीतिक कारण हैं. गाजीपुर और मऊ में पिछड़ी और दलित जातियों की संख्या बहुतायत में है. खुद की पैठ के बावजूद इस परिवार को सपा या बसपा से कुछ काडर वोटों की दरकार बनी रहती है. AIMIM ज्वॉइन करके वे इस वोटबैंक का नुकसान क्यों उठाना चाहेंगे.

विधानसभा सीट पक्का करना चाहती है AIMIM

मुख्तार अंसारी यदि AIMIM ज्वॉइन करते हैं, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा ओवैसी की पार्टी को होगा. ओवैसी की कोशिश है कि बिहार की तरह उसे यूपी में भी कुछ सीटें मिल जाएं. मुख्तार की सीट उसे पुख्ता लग रही है. अतीक अहमद को साथ लाने का भी यही गणित दिखाई दे रहा है. AIMIM को यूपी में जीत मिली तो इसके निहितार्थ राष्ट्रीय स्तर पर निकाले जाएंगे.

मुस्लिम हितों की सरपरस्ती का मेसेज

AIMIM की पुरजोर कोशिश है कि वह मुस्लिमों की सबसे बड़ी सरपरस्त पार्टी बनकर यूपी में उभरे. इसी कोशिश के तहत AIMIM के प्रवक्ता असीम वकार ने न सिर्फ मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल करने का न्यौता दिया बल्कि सपा और बसपा पर हमले भी किए. उन्होंने कहा कि जब सपा और बसपा को अतीक और मुख्तार की दरकार थी तब वे माफिया नहीं थे. उन्होंने ये कहा कि मुश्किल वक्त में पार्टियों ने इनका दामन छोड़ दिया, लेकिन वे थामने को तैयार हैं. अतीक अहमद को AIMIM ने अपने साथ कर लिया है. अब यदि मुख्तार भी साथ हो लेते हैं तो AIMIM का मकसद बहुत हद तक कामयाब हो जाएगा.

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