राज्यसभा चुनाव से गए तीन बड़े सियासी संदेश, बीजेपी और सपा की रणनीति रही सफल, बसपा को सर्वाधिक नुकसान

बीजेपी के दांव से बसपा चित
बीजेपी के दांव से बसपा चित

अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने जिस तरह से बीजेपी द्वारा बसपा को 'वाक ओवर' देने की योजना को निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाश बजाज को मैदान में उतार कर बेनकाब किया, उससे वे 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और बसपा में सांठगांठ का संदेश देने में लगभग सफल रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 29, 2020, 10:03 AM IST
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लखनऊ. यूपी के 10 राज्यसभा सीटों (Rajya Sabha Election) के लिए हो रहे चुनाव में बुधवार को दिन भर चले उठा-पटक के बीच भले ही बसपा सुप्रीमो मायावती ()Mayawati ने आखिरी वक्त में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) को मात दे दी हो लेकिन, प्रदेश में नया सियासी सन्देश भेजने में अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) कामयाब रहे. अखिलेश यादव ने जिस तरह से बीजेपी द्वारा बसपा को 'वाक ओवर' देने की योजना को निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाश बजाज को मैदान में उतार कर बेनकाब किया, उससे वे 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और बसपा में सांठगांठ का संदेश देने में लगभग सफल रहे. उधर 9वां प्रत्याशी मैदान में उतारकर बीजेपी जो सियासी संदेश देना चाहती थी उसमें ज्यादा सफल रही. बीजेपी की कोशिश 2022 में विपक्षी एकता को धूमिल करने की थी और उसमे वह सफल भी रही.

रणनीति बदलकर बीजेपी ने विपक्ष को उलझाया

26 अक्टूबर को जब बीजेपी ने राज्यसभा के लिए अपने आठ उम्मीदवारों की घोषणा की तो यह सियासी दलों के साथ ही राजनैतिक पंडितों को भी चौंकाने वाला था. लोगों को लगा कि 9 सीट जीत सकने वाली बीजेपी ने बड़ी रणनीतिक चूक कर दी. लेकिन यह उसकी सोची समझी चाल का हिस्सा था. उसने अपने इस चाल से विपक्ष को ही आपस में उलझा कर रख दिया. समाजवादी पार्टी ने बसपा को बीजेपी की बी टीम साबित करने के चक्कर में वकील प्रकाश बजाज का ऐन वक्त नामांकन करवा दिया. इतना ही नहीं बीजेपी के वाक ओवर देने की कोशिश को नाकाम करने के लिए बसपा में ही फोड़ करवा दिया. सब कुछ ठीक वैसे ही हुआ जैसा बीजेपी चाह रही थी. वह 2022 के विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता की कोशिशों को ही धूमिल नहीं किया बल्कि यह भी संदेश दिया कि बीजेपी को निपटाने की बात करने वाले विपक्ष की कोशिश एक दूसरे से ही निपटने की है.



बसपा की बढ़ गई चुनौती
2017 विधानसभा चुनाव के बाद से यूपी में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही बसपा की चुनौती अब और ज्यादा बढ़ गई है. पार्टी भले ही रामजी गौतम को राज्य सभा भेजने में सफल होती दिख रही है, लेकिन बहुजन समाज का विश्वास खोने का खतरा भी मंडराने लगा है. इसका खामियाजा उसे आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है. दरअसल, जिन छह विधायकों ने बगावती तेवर दिखाए हैं, उसमें तीन मुस्लिम, दो पिछड़ा वर्ग और एक दलित विधायक शामिल है. ऐसे जिस बहुजन समाज की बात पार्टी करती है उसका विश्वास पाना उसके लिए आसान नहीं होगा. क्योंकि बहुजन वोटों के तहत अल्पसंख्यक मतों को सहेजना एक बड़ी चुनौती होगी.

बसपा को ज्यादा नुकसान

वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक मामलों के जानकार रतनमणि लाल ने बताया कि राज्यसभा चुनाव में जो भी उठा पटक देखने को मिला उससे 2022 के विधानसभा चुनाव और आगामी उपचुनाव में भी असर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि इस सियासी खेल में अगर किसी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा तो वह है बसपा. उसकी विश्वसनीयता साख पर है. उन्होंने कहा कि बीजेपी की रणनीति में उलझी बसपा को अब अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़ों को भरोसा फिर से जीतना आसान नहीं होगा. वहीं उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी यह संदेश देने में सफल रही कि प्रदेश में सबसे बड़े विपक्ष के तौर पर वही है और उसी के नेतृत्व में बीजेपी का मुकाबला संभव है.
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