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यूपी के वोट बैंक: किसके जाट और किसके ठाठ?
Lucknow News in Hindi

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: April 4, 2019, 4:56 PM IST
यूपी के वोट बैंक: किसके जाट और किसके ठाठ?
पश्चिमी यूपी के जाट किसके ?

पश्चिमी यूपी में एक मशहूर कहावत भी है- जिसके जाट, उसी के ठाठ. लोकसभा चुनाव 2019 के लिए महागठबंधन और बीजेपी दोनों के लिए ही पश्चिमी यूपी में जाट चुनौती बने हुए हैं. असल में यहां जिसे भी ठाठ चाहिए, उन्हें जाट भी चाहिए.

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मशहूर टीवी सीरीज 'गेम ऑफ़ थ्रोंस' का मशहूर संवाद है- 'सन्स आर नॉट देयर फादर्स'. इस संवाद के ज़रिए यह कहने की कोशिश की गई है कि कितना अच्छा है कि बच्चे अपने बुरे पिताओं की तरह नहीं होते. बहरहाल, जाट नेताओं को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में मतलब उलट जाता है. यहां न तो अजीत सिंह और न ही नरेश-राकेश टिकैत वो बन पाए जो उनके पिता हुआ करते थे. 2014 में जाटों ने अपना जनादेश कुछ इस तरह दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी सीटें बीजेपी के पास गई थीं. 2019 में  आरएलडी महागठबंधन का हिस्सा हैं और जाट शिफ़्टिंग वोट बैंक माने जा रहे हैं. इस बार दूसरी पार्टियों की तरह बीजेपी के लिए भी जाट बड़ी चुनौती साबित होने जा रहे हैं.

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पश्चिमी यूपी में एक मशहूर कहावत भी है- जिसके जाट, उसी के ठाठ. इसकी कई कहानियां चौधरी चरण सिंह से जुड़ी हैं, तो कई किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत से. ठाठ भी ऐसे कि टिकैत दहाड़ दें तो यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह सिसौली गांव दौड़े चले आएं, और 'बड़े चौधरी' साहब के बिना केंद्र में सरकार बन पाना मुश्किल हो जाए. इन दोनों नेताओं ने 'जाटलैंड' में धर्म-जाति मुक्त किसान एकता और मुस्लिम-जाट जैसे मजबूत समीकरण को स्थापित किया था. हालांकि 1992, 2002 और 2013 वो साल रहे जिन्होंने पश्चिमी यूपी के 'संप्रदायमुक्त किसान समाज' का सपना धुंधला कर दिया.

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यूपी में जाट की अहमियत?
यूपी में जाटों की आबादी 6 से 8% बताई जाती है, जबकि पश्चिमी यूपी में वो 17% से ज्यादा हैं. ऐसी 18 लोकसभा सीटें हैं: सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी, और फिरोजाबाद जहां जाट वोट बैंक चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता है. विधानसभा की बात करें तो 120 सीटें ऐसी हैं जहां जाट वोटबैंक असर रखता है. फिलहाल संसद में 24 सांसद जाट हैं जिनमें सिर्फ 4 सांसद भारतेंदु सिंह, सत्यपाल सिंह, चौधरी बाबूलाल और संजीव बालियान यूपी से हैं. विधानसभा की बात करें तो फिलहाल 14 जाट विधायक हैं. लोकसभा सीटों की बात करें तो मथुरा में 40%, बागपत में 30%, सहारनपुर में 20% जाट आबादी है.



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यूपी की जाट राजनीति
बहुत कम जाट नेता ऐसे हैं जिनकी शुरुआत कांग्रेस से न रही हो. चौधरी चरण सिंह की राजनीति की शुरुआत भी कांग्रेस से ही हुई. 40 साल ईमानदारी से कांग्रेस के होकर रहे. साल 1937 से लेकर 1977 तक बड़े चौधरी छपरौली (तब मेरठ अब बागपत क्षेत्र) से लगातार विधायक रहे. बता दें कि बड़े चौधरी की छवि भले ही जैसी हो वे काफी पढ़े-लिखे ज़हीन आदमी थे. साल 1946 में ही वे संसदीय सचिव बन गए थे जिसका दर्ज़ा मंत्री के बराबर ही होता है. इसके बाद वे लगातार कैबिनेट मंत्री रहे. सुचेता कृपलानी के सीएम बनने के बाद से बड़े चौधरी नाराज़ रहने लगे थे और यहीं से उनका मन कांग्रेस से दूर होने लगा.



राममनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी वो शख्स थे जिन्होंने बड़े चौधरी को कांग्रेस छोड़ने के लिए मनाया था. जब 1967 में चरण सिंह ने कांग्रेस को अलविदा कहा तो बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोते हुए एक भाषण दिया. उन्होंने भारतीय क्रांति दल नाम की नई पार्टी बना ली और कांग्रेस के भी 16 विधायक उसमें शामिल हो गए. सिर्फ दो ही दिन के अंदर यूपी के पहले गैर-कांग्रेसी सीएम के बतौर शपथ ली. देश ने ऐसी गैर कांग्रेसी सरकार इमरजेंसी के बाद देखी थी लेकिन यूपी में ऐसी सरकार 8 साल पहले ही बन गई थी जिसमें जनसंघ, सोशलिस्ट, प्रजा सोशलिस्ट, स्वतंत्र पार्टी और यहां तक कि कम्युनिस्ट भी शामिल थे. हालांकि ये सरकार सिर्फ 328 दिन चली और यूपी में इसके बाद एक साल तक राष्ट्रपति शासन लागू हुआ. चरण सिंह 1970 में दूसरी बार यूपी के सीएम बने और ये सरकार भी 225 दिन चल पाई, 17 दिन तक फिर यूपी में राष्ट्रपति शासन रहा.

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वरिष्ठ पत्रकार बृजेश सिंह जाटों को 'मार्शल रेस' बताते हैं. उनका कहना है कि ओलंपिक में भारत को सबसे ज्यादा मेडल जाट खिलाड़ियों ने ही दिलाए हैं. सेना, पुलिस या अर्धसैनिक बलों में भी जाटों की मौजूदगी बाकी जातियों की तुलना में काफी ज्यादा है. बृजेश के मुताबिक जाट जाति का एक ऐसा गुण है जो उन्हें बाकियों से अलग खड़ा कर देता है. ये गुण है 'एंटी स्टैब्लिशमेंट' या फिर किसी भी सत्ता के विरोध में बिना हिचकिचाए खड़ा हो जाना. खुद चौधरी चरण सिंह की असली राजनीति राम मनोहर लोहिया के साथ जुड़कर नेहरू या कांग्रेस का विरोध करने से ही शुरू हुई थी. नेहरू की मौत हुए सिर्फ तीन साल हुए थे जब चरण सिंह ने पहली बार यूपी की सत्ता से कांग्रेस को बाहर कर दिया. बृजेश के मुताबिक ये जाटों का ही गुण है कि 40 साल कांग्रेसी रहा एक जाट जब कांग्रेस के विरोध में उतरा तो कोई कसर नहीं छोड़ी. यूपी में पहली गैर कांग्रेसी सरकार हो फिर देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार, दोनों का अहम हिस्सा रहा.

लोहिया के रास्ते सीएम फिर पीएम
कांग्रेस विरोध का सबसे अहम चेहरा रहे राममनोहर लोहिया ने सबसे पहले यूपी में पिछड़ों की ताकत को पहचाना था. लोहिया ने पूर्वी यूपी में यादवों और पश्चिमी यूपी में जाटों की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए मुलायम सिंह यादव और चौधरी चरण सिंह को साथ लाने का काम किया. लोहिया ने इसी दौरान पिछड़ी जातियों में कांग्रेस के खिलाफ यादव, कुर्मी, कोइरी और मुस्लिम का एक गठजोड़ बनाने की कोशिशें शुरू कर दीं थी. लोहिया ने नारा भी दिया- 'पिछड़ा पावै सौ में साठ'. हालांकि 1967 में लोहिया का निधन हो गया और जाट नेता चौधरी चरण सिंह ने इसी फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल करते हुए पश्चिमी यूपी के जाटों को भी इसमें शामिल कर लिया.



 

वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी, सिएटल में राजनीति विज्ञान एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफेसर रहे पॉल आर. ब्रास ने उन पर एक किताब लिखी है. 'चरण सिंह और कांग्रेस राजनीति-एक भारतीय राजनीतिक जीवन' नामक इस पुस्तक में वो लिखते हैं," भारतीय राजनीति के सभी स्तरों पर चरण सिंह का दखल रहा. ब्रास आगे लिखते हैं कि "चरण सिंह के राजनीतिक जीवन का तीसरा प्रमुख पहलू तथाकथित पिछड़ी जातियों के हितों से जुड़ी उनकी पहचान थी. चरण सिंह ने हमेशा अपने आप को जाट के रूप में देखा.... हालांकि उन्होंने खुद कभी पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व के मसले पर जनता में उग्र रवैया नहीं अपनाया. कभी-कभी वो निजी चर्चा में कुछ आक्रोश के साथ समाज और जनजीवन में ब्राह्मणों और ठाकुरों की स्थिति की बात करते थे....अक्सर वो ऐसे आंकड़ों का जिक्र करते जिनसे पता चलता कि खास सरकारी नौकरियों में 45 फीसदी तक ब्राह्मण, बनिए, खत्री और दूसरी उच्च जातियां हावी हैं. जबकि इन नौकरियों में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व न के बराबर और कुछ विभागों में एक प्रतिशत से भी कम है." वो कहते हैं, "चरण सिंह ने अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी और निष्ठा को बहुत महत्व दिया. लेकिन जो उनके कठोर मानदंडों पर नहीं चले वो उनकी नजरों में गिर गए."

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सियासत के 'अजगर' और 'मजगर' फार्मूले से सत्ता में अपनी पकड़ बनाए रखने वाले चरण सिंह यूपी के पहले गैर कांग्रेसी सीएम रहे. अजगर मतलब अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत, मजगर- मतलब मुसलमान, जाट, गुर्जर और राजपूत. ब्रास के मुताबिक इन जातियों को गोलबंद करके गैर कांग्रेसवाद की राजनीति करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का नाम अगर यूपी की जाट पॉलिटिक्स में सबसे पहले न लिया जाए तो अन्याय होगा.

'जाट के ठाठ' ने गिरा दी सरकार
कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से बड़े चौधरी ने 28 जुलाई, 1979 को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने निर्देश दिया था कि चरण सिंह 20 अगस्त तक लोकसभा में अपना बहुमत साबित करें. वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली के मुताबिक इंदिरा गांधी अपने 12 विलिंग्टन क्रेसेंट के निवास पर इस बात का इंतज़ार कर रहीं थीं कि चौधरी साहब शपथ लेने के बाद उन्हें धन्यवाद देने आएंगे. बहरहाल चरण सिंह जाने वाले थे लेकिन किसी ने उनसे कह दिया कि अब आप पीएम हैं, इंदिरा गांधी को आपसे मिलने आना चाहिए. बड़े चौधरी को बात जंच गई और वो नहीं गए.



 

इसी के बाद इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त को ही यह घोषणा कर दी कि वह चरण सिंह सरकार को संसद में समर्थन नहीं देंगी. जाट के इस ठाठ का नतीजा ये हुआ कि चरण सिंह ने लोकसभा का सामना किए बिना ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया. राष्ट्रपति ने 22 अगस्त, 1979 को लोकसभा भंग करने की घोषणा कर दी. लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी 14 जनवरी, 1980 को प्रधानमंत्री बन गईं. बता दें कि चरण सिंह ने ही बतौर गृह मंत्री इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था, हालांकि अगले ही दिन मजिस्ट्रेट ने उनकी रिहाई के आदेश दे दिए. कुरबान अली के मुताबिक इंदिरा के ख़िलाफ़ उनका पूर्वाग्रह जाहिर था और इमरजेंसी के दौरान लाखों लोगों के खिलाफ लगे फर्जी मुकदमों और जेल से चरण सिंह काफी खफा थे. एक बार चरण सिंह ने यहां तक कह दिया था कि- 'मैं तो चाहता हूं कि इंदिरा गांधी को कनॉट प्लेस में खड़ा कर कोड़े लगवाए जाएं.'

वो जाट जिससे सीएम-पीएम घबराते थे!
सिर्फ 8 साल की उम्र में सर्वजातीय बालियान खाप की जिम्मेदारी उठाने वाले महेंद्र सिंह टिकैत की एक चेतावनी पर सीएम दौड़े चले आते थे और पीएम खुद फोन कर हाल-चाल लेने लगते थे. चरण सिंह को अगर किसानों का अंबेडकर कहा जाता है तो टिकैत भी किसानों के मसीहा की तरह याद किए जाते हैं. चरण सिंह पर तो अवसरवादी और सांप्रदायिक होने के आरोप भी लगे, टिकैत ऐसे शख्स थे जिनकी एक आवाज़ पर लाखों किसान इकठ्ठा हो जाते थे, देश की दूसरी सबसे बड़ी यूनियन- भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के नेता होने के बावजूद वे अराजनैतिक बने रहे. टिकैत ने कभी बड़ी-बड़ी बातें नहीं की, किसी भी घर की छत पर माइक लेकर चढ़ जाते और जाति-संप्रदाय से परे लाखों किसान उन्हें सुनने के लिए घंटों धूप में खड़े रहते.



वरिष्ठ पत्रकार आवेश तिवारी लिखते हैं कि टिकैत का अंदाज़ ही अलग था, वो किसानों की मांग जैसे शब्दों से ही परहेज करते थे. उनका कहना था कि किसान इस देश का मालिक है और सरकारों से वो मांग नहीं करेगा, किसान की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सरकारें बनाई जाती हैं. किसी सरकार की लाठी-बंदूक में इतनी ताकत नहीं की किसान को रोक सके. टिकैत ने बार-बार करके भी दिखाया था. साल 1986 में ट्यूबवेल की बिजली दरों को बढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ टिकैत के नेतृत्व में मुज़फ्फरनगर के शामली से एक बड़ा आंदोलन शुरु हुआ. मार्च 1987 में प्रदर्शन उग्र हो गया और संघर्ष के दौरान दो किसान और एक पीएसी के जवान की मौत हो गई. टिकैत ने सरकार के लिए चेतावनी जारी की, जिसका असर ये हुआ कि अक्टूबर 1987 को सिसौली में किसानों की महापंचायत हुई जिसमें 30 लाख किसानों ने हिस्सा लिया. इस पंचायत को संबोधित करने के लिए खुद यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह आए और बिजली दरों में कटौती की गई.



टिकैत 20 बार से ज्यादा जेल भी गए. जनवरी 1988 को मेरठ में 25 दिन तक कमिश्नरेट का घेराव, मार्च 1988 में रजबपुर सत्याग्रह आंदोलन हो या 25- 31 अक्टूबर 1988 तक नई दिल्ली में बोट क्लब पर धरना या फिर अगस्त 1989 में नईमा कांड को लेकर यूपी सरकार के विरूद्व 39 दिनों तक भोपा गंगनहर पर धरना, हर बार टिकैत की ललकार ने सरकारों को किसानों की मांगों को मानने के लिए मजबूर कर दिया. टिकैत में ही ये हिम्मत थी कि बोट क्लब से ललकार कर कह दे- इंडिया वालों खबरदार, अब भारत दिल्ली में आ गया है. टिकैत ने सर्वजातीय खाप के जरिए दहेज प्रथा, मृत्यु भोज, नशाखोरी, भ्रूण हत्या, धार्मिक आडंबर जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी आंदोलन चलाया. ऐसा बताया जाता है कि देश के 3 पीएम और यूपी के 6 सीएम ऐसे रहे जो टिकैत से मिलने सिसौली गांव जाते थे. पीएम रहते हुए एचडी देवगौड़ा हर दूसरे महीने टिकैत से मिलने सिसौली जाते थे.

जाट-मुस्लिम और चरण सिंह-टिकैत
चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत को उनका जाट होना तो जोड़ता ही है साथ ही उन्होंने अपनी-अपनी लड़ाई के लिए जिस सामाजिक ताने-बाने को बुना वो लगभग एक जैसा ही था. चरण सिंह भी लगातार किसानों के राजनीतिक रिप्रेजेंटेशन को लेकर काम करते रहे और उन्होंने भी मुसलमानों के बिना इसे असंभव माना बल्कि लोकदल और बाद में आरएलडी का कोर वोट बैंक भी यही समीकरण रहा. उधर टिकैत ने भी भारतीय किसान यूनियन में मुसलमानों को प्रमुखता से जगह दी थी. हालांकि ब्रास ने अपनी किताब में इस बात का तफसील से जिक्र किया है कि कैसे मुस्लिमों को लेकर चरण सिंह के विचार काफी नकारात्मक थे. लेकिन फिर भी वे मुस्लिमों को खूब टिकट देते थे.



कुरबान अली के मुताबिक भी इस्लाम के बारे में चरण सिंह की राय अच्छी नहीं थी. लेकिन वो मुस्लिम वोट बैंक और उसके मनोविज्ञान को बहुत अच्छी तरह समझते थे. वो मुसलमानों को चुनाव लड़ने के लिए बहुत टिकट देते थे. जब भी वो उत्तरप्रदेश में रहे या केंद्र में रहे, दंगों के ख़िलाफ़ उन्होंने बहुत कड़ा रुख़ अपनाया. 1977 से 1980 के बीच उत्तरप्रदेश में दो तीन बड़े दंगे हुए - अलीगढ़ ,बनारस और संभल में. इस दौरान उन्होंने सीएम रामनरेश यादव को बहुत सख़्ती से डांट कर कहा था कि 'ये दंगे हर हालत में रुकने चाहिए.' चरण सिंह का सबसे बड़ा योगदान था हिंदु और मुस्लिम सांप्रदायिकता को कमज़ोर करना. चरण सिंह जाटों के नेता भी थे और मुलायम सिंह के उभार से पहले यादवों का भी एक गुट उनका सपोर्टर था. पश्चिमी यूपी के जाट-मुस्लिम समीकरण की तरह ही मुलायम सिंह यादव ने एमवाई यानी यादव-मुस्लिम समीकरण को आगे बढ़ाया.

मुसलमान भी टिकैत के समर्थक क्यों थे इसका जवाब इस एक घटना से मिल जाता है. मुजफ्फरनगर के एक मुस्लिम किसान की बेटी नईमा का साल 1989 में अपहरण कर लिया गया था. बलात्कार के बाद नईमा की हत्या कर दी गई. नईमा की हत्या के खिलाफ टिकैत ने मोर्चा संभाला, टिकैत ने नेतृत्व में भाकियू ने नईमा के शव को लेकर हाईवे पर जाम लगा दिया और दिल्ली का पश्चिमी यूपी से संपर्क पूरी तरह से काट दिया. टिकैत के समर्थकों ने कई पुलिसवालों को बंधक बना लिया और मामले की जांच और पीड़ित परिवार को मुआवजे की मांग कर रहे थे. करीब एक हफ्ते के विरोध प्रदर्शनों और बातचीत के बाद आखिरकार टिकैत के समर्थक नईमा के शव को दफनाने को राजी हुए. इस घटना से पश्चिमी यूपी के किसान एकजुट हो गए थे. एक जाट नेता से इस तरह का खुला समर्थन मुसलमानों ने पहली बार महसूस किया. इस घटना के बाद टिकैत किसानों के निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित हो गए थे. उनका कद चरण सिंह से भी बड़ा माना जाने लगा था. बताया जाता है कि वीपी सिंह ने जब राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ आंदोलन किया तो टिकैत के कहने पर पश्चिमी यूपी के जाटों और मुसलमानों दोनों वीपी सिंह के समर्थन में खड़े हो गए.

पश्चिमी यूपी: BJP की प्रयोगशाला ?
यूपी में मुस्लिम जनसंख्या 19.5% है जबकि 13 सीटें लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30% से भी ज्यादा है. 15% को आधार बनाएं, तो यूपी की 32 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी प्रभावी वोट बैंक है. इनमें से ज्यादातर सीटें पश्चिमी यूपी की हैं जहां जाट वोट बैंक भी प्रमुखता से मौजूद रहा है. इस इलाके के प्रमुख वोट बैंक में दलित, मुसलमान के बाद तीसरा जाट ही है. जाट-मुस्लिम और यादव-मुस्लिम समीकरण से लड़ने के लिए ही मायावती ने सवर्ण-दलित फ़ॉर्मूला बनाया था, जो कुछ मौकों पर सफल भी रहा.

आरएलडी के जनरल सेक्रेटरी राजकुमार सांगवान बताते हैं कि पश्चिमी यूपी का इतिहास कम्युनल नहीं रहा है, यहां मुसलमानों की बड़ी तादाद है जो हिंदुओं से कन्वर्ट हुई और आज भी चौधरी, त्यागी जैसे सरनेम इस्तेमाल करती है. 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद से बीजेपी और संघ ने इस इलाके के सामाजिक ताने-बाने को निशाना बनाना शुरू किया. छपरौली से आरएलडी के पूर्व विधायक वीरपाल राठी बताते हैं गोधरा कांड के बाद माहौल बदलना शुरू हुआ और मुसलमान भी अपने संख्याबल और राजनीतिक ताकत को देखते हुए मुखर होना शुरू हो गए. हालांकि इलाके के सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश इसे ज्यादा बेहतर तरीके से समझाते हैं. बृजेश के मुताबिक बीजेपी से पहले भी जनसंघ और हिंदू कट्टरपंथी ताकतें मौजूद थीं लेकिन चौधरी चरण सिंह और टिकैत जैसे नेताओं ने किसान और गांव के नाम पर एक अन्य आइडेंटिटी में पश्चिमी यूपी के समाज को इकठ्ठा किया हुआ था.



वेस्टर्न यूपी का किला गिराए बिना यूपी और दिल्ली की गद्दी नहीं मिलेगी ये बीजेपी-संघ को समझ आ गया था. चौधरी चरण सिंह की विरासत को संभालने में अजीत सिंह नाकाम थे और 2011 में टिकैत भी एक ऐसी जगह खाली कर गए जिसे भरा जाना बेटों नरेश-राकेश टिकैत के लिए नामुमकिन था. बृजेश के मुताबिक पश्चिमी यूपी में मुसलमानों की अपेक्षाकृत ज्यादा जनसंख्या बीजेपी के काफी काम आई. पहले कांशीराम और फिर मंडल आंदोलन के बाद जैसे-जैसे जाति आधारित पार्टियों ने यूपी की राजनीति में पैंठ बनानी शुरू की, मुसलमानों की अहमियत भी बढ़ती गई. सपा जैसी पार्टियों ने मुस्लिम वोट के लिए इस समाज में मौजूद असामजिक तत्वों को भी खुलकर सपोर्ट किया. इससे जाट जो कि इलाके के बड़े और संपन्न किसान भी थे नाराज़ हो गए.

मुस्लिम डोमिनेंट सीटों पर भी बीजेपी ने लगातार दूसरी बड़ी जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया जबकि सपा, बसपा और आरएलडी लगातार मुसलमान उम्मीदवार उतार रहे थे. इसका नतीजा ये सामने आया कि 1991 के बाद हुआ लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने जाट बहुल सीटों पर बढ़िया प्रदर्शन किया. टॉप 10 जाट बहुल सीटों में से आगरा, बिजनौर, मुज़फ्फरनगर, अलीगढ़, मथुरा और मेरठ ऐसी सीटें हैं जहां बीजेपी काफी मजबूत है. वीरपाल बताते हैं कि बीजेपी ने सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत तो गोधरा के बाद से ही बड़े पैमाने पर शुरू कर दी थी लेकिन 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद जाट-गुर्जरों की पहचान को हिंदू में सफलतापूर्वक तब्दील किया गया. पहले इनके पास मोदी जैसा करिश्माई नेता नहीं था लेकिन 2014 में ये कसर भी पूरी हो गई. हालांकि वीरपाल का दावा है कि जाटों ने भी बीजेपी को नहीं बल्कि मोदी को वोट दिया था. बीजेपी ने छोटे-छोटे विवादों को हवा दी और चुनाव में उन्हें इसका फायदा हुआ. जाट-मुस्लिम एकता ख़त्म हुई तो गन्ना किसान यूनियन भी ख़त्म हो गई और 2015 में तो उसके तो टुकड़े ही गए.



बृजेश बताते हैं कि ऐसा माना जाता है कि कवाल कांड के बाद मुज़फ्फरनगर में दंगे शुरू हुए थे, हालांकि सच ये हैं कि ऐसी छोटी-मोटी वारदातों का सिलसिला पहले से ही चल रहा था. सुधा पाई और सज्जन कुमार की किताब 'एवरीडे कम्युनलिज्म: राइट्स इन कंटेपररी उत्तर प्रदेश' में भी यूपी में इन छोटे-छोटे दंगों की श्रृंखला को दर्ज किया गया है. इस किताब के मुताबिक 2012 में सपा की सरकार आने के बाद से मुज़फ्फरनगर दंगों के बीच 104 कम्युनल टेंशन की घटनाएं दर्ज की गईं. प्रतापगढ़, मथुरा, फैजाबाद और बरेली इसके सबसे बड़े शिकार हुए. इन घटनाओं में 34 लोगों की मौत हुई जबकि 456 लोग घायल हुए. बृजेश बताते हैं कि मुज़फ्फरनगर दंगों का सीधा फायदा बीजेपी को हुआ. दंगा हुआ और पुलिसिया कार्रवाई में जाटों के लड़के उठाए गए. इसी सेंटिमेंट पर संजीव बालियान, संगीत सोम और सुरेश राणा जैसे लोग नेता बन गए. अजीत सिंह न तो मुस्लिम वोट खोना चाहते थे और न ही जाट, वो चुप रहे और बीजेपी ने सपा, बसपा और आरएलडी को मुसलमानों की पार्टी घोषित कर दिया.

लड़के जो अपने पिता जैसे नहीं थे!
बृजेश मानते हैं कि चौधरी साहब की विरासत संभालने वाले अजीत सिंह के पास न तो वो करिश्माई व्यक्तित्व और संघर्ष की कहानी थी और न ही उन्हें इसमें कोई ख़ास दिलचस्पी भी थी. अजीत पहले IIT गए फिर कंप्यूटर साइंस पढ़ने अमेरिका चले गए... अजीत पढ़ाई के बाद अमेरिका में ही सेटल हो गए और 17 साल वहीं नौकरी की. लौटे भी तब जब पिता की सेहत जवाब दे चुकी थी. राजनीतिक करियर की शुरुआत ही राज्यसभा से की और पिता की सेहत ख़राब थी इसलिए लोकदल के अध्यक्ष चुन लिए गए. 1987 में जब चरण सिंह नहीं रहे तब पैतृक सीट बागपत से जीतकर लोकसभा पहुंचे.



अजीत भी पिता की विरासत को वैसे ही नहीं संभाल पाए जैसे इंदिरा गांधी के बाद पहले राजीव और अब राहुल नेहरू-गांधी परिवार की विरासत को 2014 में 44 लोकसभा सीटों तक ले आए हैं. बृजेश कहते हैं कि अजीत के काम करने का तरीका पश्चिमी यूपी के जाट-गुर्जरों को कभी समझ नहीं आया. वो अक्सर चुनावों के वक़्त दिन में इलाके में प्रचार करते लेकिन रात होते ही दिल्ली चले जाया करते थे. चरण सिंह इन लोगों के बीच का आदमी था, लेकिन अजीत सिंह हमेशा से ही 'दिल्ली वाले नेता' की तरह पेश आते रहे. इसके अलावा आरएलडी के कई पुराने नेता थे, जिनमें अमरपाल सिंह और हरेन्द्र सिंह जैसे थे, जो 4-4 बार विधायक बन चुके थे लेकिन उन्हें लगने लगा था कि अजीत तो खुद मिनिस्टर बन जाते हैं लेकिन उन्हें यूपी कैबिनेट में भी जगह नहीं मिल पाती. इन नेताओं ने सपा, बीजेपी जैसी पार्टियों का दामन थाम लिया.

उधर महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत भी नरेश और राकेश टिकैत के लिए संभाल पाना नामुमकिन साबित हुआ है. वैसे तो साल 1996 में ही टिकैत ने अजित सिंह के साथ मिलकर भारतीय किसान कामगार पार्टी बनाई थी लेकिन ये साथ ज्यादा चला नहीं. सब जानते हैं कि टिकैत बड़े चौधरी की तो बहुत इज्ज़त करते थे लेकिन अजीत सिंह के काम करने का तरीका उन्हें कभी रास नहीं आया. हालांकि 2008 में जब तत्कालीन सीएम मायावती पर टिकैत की जातिवादी टिप्पणी को लेकर पुलिस ने सिसौली घेरी तो अजीत सिंह ने उनका साथ दिया था लेकिन दूरियां बनी ही रहीं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए बड़े किसान आंदोलनों में टिकैत ने अजीत को कभी स्पेस नहीं दिया. टिकैत ने कभी सियासी लोगों को मंच तक पर चढ़ने नहीं दिया.



टिकैत बीमार रहने लगे थे और साल 2000 तक बेटे राकेश टिकैत ने आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था लेकिन बेटे अक्सर पिताओं जैसे नहीं होते. राकेश में राजनीतिक महत्वकांक्षाएं थीं और वे ज्यादा दिन तक किसानों की इस ताकत को अराजनीतिक नहीं रखना चाहते थे. राकेश ने 2007 में खतौली से निर्दलीय विधानसभा चुनाव लड़ा पर जीत नहीं सके. 2009 में राकेश टिकैत ने बिजनौर सीट से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा लड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी लेकिन अजीत सिंह भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे, आरएलडी-बीजेपी का गठबंधन हुआ और अजीत ने बिजनौर सीट अपने खाते में लेकर संजय चौहान को टिकट दे दिया.

2011 में बाबा टिकैत नहीं रहे तो उनकी रस्म पगड़ी में चौधरी अजीत सिंह भी पहुंचे थे. तय हुआ कि बाबा की किसान यूनियन को नरेश टिकैत और राजनीतिक विंग बीकेडी को राकेश टिकैत संभालेंगे. मुजफ्फरनगर दंगे के बाद अजीत सिंह ने जाट आरक्षण को मुद्दा बनाया और जाट महासभा के नेता चौधरी युद्धवीर सिंह ने राकेश टिकैत कको भी इस मुहिम में शामिल कर दोनों परिवारों की दूरियां कम करने में अहम् भूमिका निभाई. आरएलडी ने 2014 में राकेश को अमरोहा से मैदान में उतारा लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गई. अब 2019 लोकसभा चुनावों के लिए राकेश टिकैत ने मुज़फ्फरनगर में आरएलडी को सपोर्ट करने की अपील जारी की है.

कहां गलती हुई ?
इसके कई जवाब हो सकते हैं. पहला ये कि इस गलती की शुरुआत चौधरी चरण सिंह की राजनीति से भी मानी जा सकती है. उनकी राजनीति में मुसलमानों की जगह तो थी लेकिन उन्होंने कभी भी उनके प्रति नफरत या बैर के भाव से लड़ने के लिए न तो इस समाज को तैयार किया न ही उनके बेटे अजीत सिंह के पास इससे लड़ने के लिए कोई समझ मौजूद थी. प्रोफेसर पॉल आर. ब्रास लिखते हैं कि चरण सिंह सिर्फ मुसलमानों का इस्तेमाल कर रहे थे जबकि उन्होंने जाटों की जीवनशैली में उनके लिए कोई जगह नहीं तैयार की, वे हमेशा शायद बाहरी ही थे. इसलिए जब मुस्लिमों ने राजनीतिक ताकत दिखानी शुरू की तो जाटों को ये रास नहीं आया और बीजेपी को अपनी ज़मीन मिल गई. टिकैत ने फिर भी सामाजिक कुरीतियों से लड़ाई लड़ी थी लेकिन वो खुद अपने स्वाभाव में काफी पुराने ख्यालों के ही थे.



दूसरी गलती बीजेपी की राजनीति को जाटों तक पहुंचाना रहा. राजकुमार सांगवान मानते हैं कि हम बीजेपी के ट्रैप में फंस गए थे. बीजेपी के साथ 2009 लोकसभा चुनावों के लिए हुए गठबंधन के चलते आरएलडी को हुए नुकसान से जुड़े सवाल के जवाब में वीरपाल कहते हैं कि 1977 में भी हमने इनका साथ दिया था और तब भी हमारे वोट बैंक को इससे नुकसान पहुंचा था, 2009 में हालातों को देखते हुए जो फैसला लिया गया था यकीनन वो गलत साबित हुआ. चौधरी चरण सिंह के ज़माने से ही हम जाति की राजनीति से दूर रहने की कोशिश करते रहे थे, हम कभी भी जाटों की पार्टी नहीं थे बल्कि किसान और गांव-देहात के लोगों की पार्टी थे. यहां के लोग बीजेपी को पसंद भी नहीं करते थे क्योंकि वो धार्मिक संप्रदाय की राजनीति करती है, खुलकर मुस्लिम विरोधी पार्टी है. मुजफ्फरनगर दंगों, कैराना से पलायन, लव जिहाद जैसे मुद्दों को हवा दी गई जिसका फायदा बीजेपी को हुआ.



दरअसल उदारीकरण के बाद इन इलाकों में भी मध्यवर्ग पैदा हुआ जिसकी ज़रूरतें अलग थीं, इस मध्यवर्ग में जाट तो थे ही मुस्लिम भी शामिल हो गए. समाज में नए पावर सेंटर बने जिन्होंने समाज के पुराने पावर स्ट्रक्चर को न सिर्फ चुनौती दी बल्कि चुनावों के जरिए इसके नतीजे भी सामने आने लगे. जनसंख्या बढ़ी तो पहले ज़मीनें कम होती गईं, फिर नौकरियां भी नहीं रहीं, इंडस्ट्री नहीं थी और न ही व्यापार के मौके. इलाके के पुराने पावर सेंटर रहे जाटों को इस दुविधा से निकालने के लिए न तो अजीत सिंह ही काम आए न ही टिकैत के बेटे. उनके पास अपने लीडर ही नहीं थे, ऐसे में 'बाहरी ताकतों से डर' वाले ट्रैप में फंसते उन्हें देर नहीं लगी. हालांकि वीरपाल कहते हैं कि 2014-17 तो आंधी थी. बड़े चौधरी साहब कहा भी करते थे कि आंधी में बड़े-बड़े पेड़ भी उखड़ जाते हैं लेकिन आंधी ज्यादा देर तक टिक नहीं पाती, आखिर में पेड़ ही टिके रहते हैं. आरएलडी की राजनीति पेड़ बनने वाली रही है, जो आंधी बने थे इस बार थम जाएंगे.

क्या जाट लौटेंगे ?
2019 का चुनाव सर पर है और लगातार ये सवाल उठ रहा है कि इस बार पश्चिमी यूपी के जाट किसका साथ देंगे? क्या आरएलडी ने ऐसा कुछ किया है जो जाटों का भरोसा दोबारा उन पर हो सके? बृजेश इस सवाल का जवाब देते हैं, उनके मुताबिक अजीत सिंह आजकल अपनी सभाओं में जो भाषण दे रहे हैं उन्हें सुनने से इन सवालों का जवाब मिल जाता है. अजीत न तो सड़क की बात कर रहे हैं न विकास की. बीते एक साल से वो लगातार इस इलाके में 'सद्भाव यात्रा' निकाल रहे हैं और पुराने वोट बैंक में आई दरार को भरने का काम कर रहे हैं. दूसरा उन्होंने 'जाट प्राइड' पर दांव खेला है. बागपत जाकर उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये सीट छोड़ रहा हूं जयंत के लिए, तुम्हारा लड़का है हराना है या जिताना है देख लो. मुज़फ्फरनगर जाकर कहा मेरे से जो गलती हुई है उसे कैसे सुधार सकता हूं ये बता दो ? कहोगे तो चुनाव लड़ूंगा और मना कर दोगे तो नाम वापिस ले लूंगा. अजीत सिंह का पूरा चुनावी कैंपेन जाटों की नाराज़गी दूर करने पर केन्द्रित है.

दूसरी तरफ जाटों के पास अपना लीडर ही नहीं है, आरएलडी अपने अस्तित्व की राजनीति कर रही है तो जाट भी बीजेपी में अपना अस्तित्व तलाश रहे हैं जो उन्हें फिलहाल नहीं मिल रहा. मुज़फ्फरनगर दंगा ही बीजेपी के आने की वजह नहीं थी, इन्होने वादा किया था कि 14 दिनों के अन्दर गन्ने का पेमेंट कर दिया जाएगा. इस महीने की शुरुआत में 12000 करोड़ रुपए बकाया है, जाटों को बकाया पैसे से भी नाराजगी नहीं है वो तो पहले भी रहता था लेकिन बीजेपी ने कमिटमेंट पूरा नहीं किया ये उन्हें अखर रहा है.



इलाके में गन्ने के बाद गेहूं प्रमुख फसल है. आवारा पशु एक बड़ा मुद्दा बन गया है, गन्ने का पेमेंट नहीं होता और गेहूं की फसल को आवारा पशुओं से बचाना मुश्किल हो गया है. या तो फसल बर्बाद हो रही है या फिर उसे बचाने के लिए कर्जा लेना पड़ रहा है. रोज़गार एक बड़ा मुद्दा बन गया है, वादा था कि 2 करोड़ नौकरी हर साल देंगे लेकिन भर्तियां ही नहीं निकली और पढ़े-लिखे जाट युवा बेरोजगार घूम रहे हैं. किसान से आमदनी दोगुनी करने का वादा किया था वो भी पूरा नहीं हुआ है.

अखिल भारतीय जाट महासभा के महामंत्री युद्धवीर सिंह कहते हैं कि जाट अक्सर मुद्दों पर निर्णय लेने वाली कौम रही है. सामाजिक भागीदारी जाटों की ताकत रही है. जाट अधिकतर किसान हैं इसलिए उनका सबसे तालमेल बेहतर रहा है. हालांकि, मुजफ्फरनगर दंगे को जिस तरह से जाट बनाम मुसलमान बनाया गया, उससे बहुत कुछ प्रभावित हुआ. जाट माहौल बनाने के काम तो आता है लेकिन चुनाव जैसे फैसलों में तात्कालिक मुद्दा भी अहम होता है. जैसे गन्ना मूल्य भुगतान, जाट आरक्षण और बेरोज़गारी का मुद्दा इस बार वेस्ट यूपी में जाट वोटरों का रूख तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है.

कालिका रंजन कानूनगो ने जाटों के इतिहास पर किताब लिखी है. उसमें वह जिक्र करते हैं कि 'जाट मरते वक्त भी अपने उत्तराधिकारी को यह बताकर मरता है कि किस-किस का कितना कर्ज चुकाना है.' जाट अगर किसी को पैसा उधार दे तो सिर्फ एक बार पूछता है कि कब लौटाएगा, दिए गए दिन तक कभी पूछता नहीं और जब वो दिन आ जाए तो बिना लिए मानता नहीं है. इसलिए हठी लोगों को 'जाट बुद्धि' भी कह दिया जाता है. जाटों का यह कमिटमेंट और मुखरता ही सियासी दलों को उनको अपने पाले में खींचने के लिए मजबूर करती रही है. पश्चिमी यूपी का जाट या तो आन पर वोट करता रहा है या फिर वादा तोड़ने वालों को सबक सिखा देता है. और पश्चिमी यूपी में राजनीति की दिशा अब भी जाट ही तय करते हैं इसलिए यह आम धारणा है कि जिसके साथ जाट, उसकी ठाठ है.

साथ में ओम प्रकाश, ग्राफिक्स डिजाइन- अनिकेत सक्सेना/समर्थ सारस्वत

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First published: April 1, 2019, 12:46 PM IST
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