यूपी के वोट बैंक: मायावती, राहुल या मोदी ? यूपी का दलित आखिर क्या चाहता है ?

मायावती के सिर्फ इस एक बयान से बीजेपी को यूपी के 'दलित किले' में वो चोर दरवाज़ा दिख गया, जिसके बल पर उसने 2014 आते-आते यूपी की सभी रिजर्व लोकसभा सीटों पर न सिर्फ कब्जा जमाया, बल्कि सबसे बड़े वोट बैंक की प्रतिनिधि पार्टी बसपा को जीरो पर ऑल आउट कर दिया.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: April 2, 2019, 5:44 PM IST
यूपी के वोट बैंक: मायावती, राहुल या मोदी ? यूपी का दलित आखिर क्या चाहता है ?
यूपी का सबसे बड़ा वोट बैंक: दलित
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: April 2, 2019, 5:44 PM IST
साल 2006 की बात है, बसपा के राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के एक सम्मलेन के बाद मायावती पत्रकारों से बातचीत कर रही थीं. इसी दौरान उनसे सवाल किया गया कि उनके बाद बसपा की कमान कौन संभालेगा? मायावती थोड़ा मुस्कुरा दी थीं और जो जवाब दिया उसने यूपी की दलित राजनीति में अगले एक दशक में आने वाले उतार-चढ़ाव और संघर्ष के संकेत दे दिए थे. मायावती का जवाब था- 'मेरा उत्तराधिकारी 'चमार' (दलितों की एक उपजाति) ही होगा, उनमें से एक जिन्होंने मनुवादियों के हाथों सबसे ज्यादा ज़ुल्म सहे हैं.' यहीं से बीजेपी को यूपी की 'दलित किले' में वो चोर दरवाज़ा दिख गया जिसके बल पर उन्होंने 2014 आते-आते यूपी की सभी रिजर्व सीटों पर न सिर्फ कब्जा जमाया बल्कि सबसे बड़े वोट बैंक की प्रतिनिधि पार्टी को जीरो पर ऑल आउट कर दिया.

मायावती इस घटना के अगले ही साल (2007) यूपी विधानसभा चुनावों में 206 सीटों और 30.43% वोट के साथ पूर्ण बहुमत से मुख्यमंत्री बनीं और उनकी 'सोशल इंजीनियरिंग' की चर्चा हर जगह थी. 2009 में लोकसभा चुनाव हुए और बसपा ने 27.4% वोट हासिल किए और 21 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाया. हालांकि 2012 यूपी विधानसभा चुनावों तक मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की चमक फीकी पड़ने लगी और बसपा सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई. यहां तक कि वोट शेयर भी 5% घटकर 25.9% पर आ गया. 2014 लोकसभा चुनाव मायावती के लिए किसी बुरे सपने जैसा साबित हुआ और बसपा ने 20% वोट तो हासिल किए लेकिन उसका खाता नहीं खुल पाया. 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद तो मायावती की राजनीतिक ताकत ही सवालों के घेरे में आ गई. बसपा अपने सबसे मजबूत किले में 22.3% वोटों के साथ 19 सीटों पर सिमट गई.



जब 2007 विधानसभा चुनावों के बाद से लगातार मायावती और बसपा का वोट बैंक खिसक रहा था, इसी दौरान बीजेपी ने 2007 के ही यूपी विधानसभा चुनावों में 16.97% वोट शेयर के साथ 51 सीटें जीतीं और 2012 विधानसभा चुनावों में सपा की लहर में भी 15% वोट शेयर के साथ 47 सीटें जीतने में कामयाब रही. 2014 लोकसभा चुनावों में बसपा-सपा-कांग्रेस को ठिकाने लगाते हुए 42.63% वोटों के साथ बीजेपी ने 80 में से 71 सीटें जीतकर हर किसी को चौंका दिया. साल 2017 में भी बीजेपी का जलवा कायम रहा और 41.35% वोट शेयर के साथ उसने 325 सीटें हासिल की. बसपा और बीजेपी की इस यात्रा के अंतर्संबंध ही यूपी की दलित राजनीति का असली चेहरा भी हैं.



कौन हैं यूपी के दलित ?

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  • यूपी में 20.7 % दलित आबादी है जो इस राज्य का सबसे बड़ा वोट बैंक भी है.

  • यूपी दलितों की प्रमुख जातियां : जाटव, वाल्मीकि, धोबी, कोरी, पासी

  • इनमें करीब 66 उपजातियां हैं, जो सामाजिक तौर पर बंटी हुई हैं. इन उप जातियों में जाटव/चमार 56%, पासी 16%, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15% जबकि गोंड, धानुक और खटीक 5% हैं.

  • दलित साक्षरता दर: यूपी- 60.9%, पुरुष:75.2%, महिला: 56.5%, अंतर: 18.7 %




रिजर्व सीटें: 17
नगीना, बुलंदशहर, आगरा, शाहजहांपुर, हरदोई, मिश्रिख, मोहनलालगंज, इटावा, जालौन, कौशांबी, बाराबंकी, बहराइच,बांसगांव, लालगंज, मछलीशहर, रॉबर्ट्सगंज

रिजर्व सीटों पर बसपा है ही नहीं!
लोकसभा चुनाव 2014 में बीएसपी के खाते में एक भी सीट नहीं आने के पीछे मोदी लहर को एक बड़ी वजह बताया जाता है. खासकर यूपी की सभी 17 आरक्षित लोकसभा सीटों पर बीजेपी की जीत को इस नजरिए से देखा जाता रहा है. सिर्फ लोकसभा ही नहीं 2017 विधानसभा चुनावों में भी सुरक्षित 86 सीटों में 76 पर बीजेपी ने ही जीत दर्ज की है. हालांकि रिजर्व सीटों के चुनावी इतिहास को देखा-परखा जाए तो पता चलता है कि इनमें से 9 सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी हमेशा से ही मजबूत रही है. 3 पर सपा मजबूत है जबकि 1 मिश्रिख सिर्फ ऐसी सीट है जहां बसपा सबसे मजबूत नज़र आती है. हरदोई सीट पर सपा-बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर होती है जबकि लालगंज सीट पर बसपा-सपा के बीच मुकाबला होता है. शाहजहांपुर इकलौती ऐसी आरक्षित सीट है जिस पर कांग्रेस मजबूत है. नगीना और कौशांबी सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई हैं, लेकिन यहां भी बीते दो चुनावों में सपा और बीजेपी ने ही जीत दर्ज की है.



हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार आशीष मिश्र की बसपा के आरक्षित सीटों पर कमजोर होने के पीछे राय अलग है. आशीष का कहना है कि ये तो सिर्फ लोकसभा ही नहीं विधानसभा चुनावों का इतिहास रहा है कि बीएसपी रिजर्व सीटों पर सबसे कमज़ोर साबित होती है. ऐसा इसलिए होता है कि रिजर्व सीटों पर हर पार्टी दलित चेहरा ही मैदान में उतारती है और ऐसे में दलित वोट बैंक बंट जाता है. बीएसपी की ताकत ही दलित वोट बैंक को एकजुट रखने से बनती है ऐसे में रिजर्व सीटों पर दलित वोट बंटते ही बसपा सबसे कमजोर पार्टी साबित होती है. रिजर्व सीटों पर अक्सर उस पार्टी को सफलता मिलती है जिसकी दलितों के बाद उस सीट पर मौजूद दूसरे सबसे बड़े वोट बैंक पर पकड़ मजबूत होती है. ऐसे में बंटे हुए दलित वोट बैंक के साथ एक अन्य वोट बैंक जैसे ही जुड़ता है, सीट पर विनिंग इक्वेशन बन जाती है. हालांकि विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2012 विधानसभा चुनावों में बीजेपी के हिस्से सिर्फ 3 रिजर्व सीटें आई थीं जबकि सपा ने 58 पर जीत दर्ज की थीं, जबकि बसपा 15 पर ही सिमट गई थी. बता दें कि मायावती की 2007 में 206 सीटों पर मिली एतिहासिक जीत में 62 आरक्षित सीटों पर मिली जीत का भी योगदान था.



दलित वोट बैंक का बिखराव और जाटव vs गैर-जाटव
बीजेपी के बढ़ते वोट प्रतिशत को आधार बनाकर यूपी की दलित राजनीति में आए बदलाव को समझा जा सकता है. बीजेपी को 2009 के लोकसभा चुनावों में मिले 17.5% वोट और 10 सीटों के मुकाबले 2014 में उसे 42.3% वोट और 71 सीटें मिली थीं. अब सवाल यही है कि ये 25% वोट किसका था जो बीजेपी ने हासिल किया? समाजशास्त्री बद्री नारायण अपनी किताब 'फैसिनेटिंग हिन्दुत्वः सैफ़रन पॉलिटिक्स और दलित मोबिलाइजेशन' में बीजेपी की इसी रणनीति को लेकर बात की है. बद्री नारायण इस किताब में दलितों-पिछड़ों के भीतर मौजूद जातीय अंतर्विरोध और जातिवाद के आधार पर अति दलित और अति पिछड़ी जातियों में मौजूद गुस्से और उनके लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के विशेष कार्यक्रमों का विवरण देते हैं.

बद्री नारायण लिखते हैं कि दलितों के बीच सामाजिक समरसता अभियान के तहत आरएसएस ने उस दलित वोट बैंक पर निशाना साधा जिस पर बीएसपी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया था. इसी रणनीति का फायदा बीजेपी को सीधे-सीधे देखने को मिला. तक़रीबन 60 गैर-जाटव दलित जातियों को 30 साल पुराने बहुजन आंदोलन में न तो नेतृत्व में जगह मिली, न आवाज़ मिली, न पहचान, न ही लालबत्ती और और न ही सत्ता. बद्री नारायण का मानना है कि दलित वोट बीएसपी के लिए जीत में तभी तब्दील होते हैं जब वे अन्य सामाजिक समूहों के मतों से जुड़ते हैं, जबकि 2014 में तो दलितों का एक हिस्सा मायावती से दूर हो गया.

कहां हुई गलती?
पूर्व आईपीएस और दलित चिंतक एसआर दारापुरी का कहना है कि बाबा साहब अंबेडकर का मानना था कि पहले सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन होगा तब राजनीति बदलेगी लेकिन बसपा और अन्य दलितों के नेतृत्व कर रहीं अन्य राजनीतिक पार्टियां सत्ता पाने के चक्कर में मनुवादियों से हाथ मिलाकर यथास्थितिवादी हो गई हैं. उनका कहना है कि 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है' का नारा देने वाली मायावती और आरएसएस की सामाजिक समरसता में कोई अंतर ही नहीं है तो ये ज़मीन पर मौजूद दलित मतदाता को कैसे नज़र आएगा? दारापुरी आरोप लगाते हैं कि मायावती, उदित राज, रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने ही बीजेपी को ये रास्ता दिखाया कि कैसे आंबेडकर की फोटो लगाकर दलितों के वोट हासिल किए जा सकते हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि यूपी जैसे बड़े राज्य में जाटव और चमार को छोड़कर अन्य दलित जातियां बीजेपी और सपा जैसी पार्टियों के साथ चली गई हैं, जिसका नुक़सान मायावती को हुआ.



दारापुरी आरोप लगाते हैं कि बीजेपी ने गैर-जाटव दलित उपजातियों में अभियान चलाया कि मायावती ने अंबेडकर और कांशीराम के मिशन को सिर्फ एक जाति की जागीर बना दिया है. इससे दलित वोटों में विभाजन हुआ जिसके नतीजे में बसपा दलितों के आरक्षित सीटों पर भी हार गई. दूसरी बात ये है कि इस समय पूरे देश में उत्पीड़न, आरक्षण में कटौती, जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर दलित केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं लेकिन उनका कोई बड़ा नेता सड़क पर था ही नहीं. दो अप्रैल 2018 के भारत बंद जिसमें 10 दलितों की जान गई, के दौरान मायावती सड़क पर क्यों नहीं थीं ये सवाल लगातार पूछा जाता रहेगा.



दलित चिंतक ओपी धामा कहते हैं, "दलितों में जो प्रमुख जातियां हैं उनमें आपस में रोटी-बेटी का संबंध नहीं है. इसका सभी पार्टियां अपने-अपने तरह से फायदा उठाती हैं. दलित नेताओं का भी अपनी जाति में ही ज्यादा झुकाव रहता है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि इस समाज में कोई ऐसा सुधारक नहीं है जो उनके अंदर से जाति के इस भेद को खत्म करे. क्षेत्र के हिसाब से कोई जाति मजबूत है और कोई कमजोर. कहीं जाटव (चमार) मजबूत हैं तो कहीं वाल्मीकि. हां, हम ये बात कह सकते हैं कि दलितों में जाटव सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा है. "



मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं- 'बसपा के राजनीतिक उदय के समय उसमें कई राज्यों के दलितों ने अपना नेता खोजा था, लेकिन मायावती ने न तो ध्यान दिया और न ही कांग्रेस और बीजेपी की तरह क्षेत्रीय नेता पैदा किए. जिसके सहारे उनकी राजनीति आगे बढ़ सकती थी. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के आगे बढ़ने का बहुत स्कोप था लेकिन क्षत्रपों के अभाव में वह धीरे-धीरे जनाधार खोती गई. यही वजह है कि चंद्रशेखर और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं का उभार हो रहा है जो मायावती की सियासी जमीन खा सकते हैं. हालांकि ये इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में कितने सफल होंगे यह नहीं कहा जा सकता.'

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं, अगर राष्ट्रीय राजनीति में दलित-उत्पीड़ित समाज के बड़े मुद्दों पर गौर करें तो हैदराबाद में विश्वविद्यालय के उच्चाधिकारियों के दमन से तंग रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या कोरेगांव-प्रकरण का, मायावती किसी बड़े प्रतिरोध आंदोलन के लिए आगे नहीं आईं. इसके उलट, वह अपनी पार्टी के नेताओं को प्रतिरोध आंदोलन में शामिल होकर अपना ज्यादा वक्त खराब न करने की सलाह देती रहीं. अचरज की बात कि जुलाई, 2017 मे उन्होंने यह कहते हुए राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया कि अब वह दलित-उत्पीड़न के खिलाफ संसद छोड़कर सड़क पर उतरेंगी. पर ऐसा कुछ नहीं दिखा. आंदोलन और जनसभाओं के एक कार्यक्रम की घोषणा भी हुई, लेकिन घोषणा से बात आगे नहीं बढ़ी.



वह एक अजीब किस्म की वैचारिकी बुनती रहीं कि बहुजन को संगठन पर जोर देना चाहिए, आंदोलन पर नहीं. बसपा के कई प्रमुख नेताओं के मुताबिक ‘सड़क पर उतरकर आंदोलन करने की वैचारिकी’ को अंबेडकरी-धारा से जोड़ने के लिए नेतृत्व की तरफ से यह भी कहा जाता रहा कि डॉ. अंबेडकर और कांशीराम ने संगठन पर जोर दिया, सड़क पर उतरकर संघर्ष करने या आंदोलन करने पर नहीं! कितनी हास्यास्पद दलील! कौन नहीं जानता कि अंबेडकर ने उस दौर में अपनी सीमित सांगठनिक शक्ति के बावजूद महाराष्ट्र में कितने बड़े-बड़े प्रतिरोध अभियानों का नेतृत्व किया.

बीजेपी इस बार भी आगे?
वरिष्ठ पत्रकार आशीष मिश्र के मुताबिक आरएसएस और बीजेपी ने यूपी में गैर-जाटव वोट बैंक के लिए बेहद बारीक रणनीति बनाई और पिछले एक दशक में लगातर उस पर काम भी किया. मायावती से नाराज़ जाटवों के एक वर्ग को साधने के लिए इस बार भी बहराइच और बाराबंकी से जाटव उम्मीदवार उतारे जाने की उम्मीद है. कांता कर्दम को राज्यसभा भेजा गया और बेबी रानी मौर्या को उत्तराखंड का राज्यपाल बनाया गया. इसके अलावा मोहनलालगंज में पासी पर फोकस किया गया और कौशल किशोर इससे मजबूत हुए. पूर्वांचल में विद्या सागर सोनकर को 2009 लोकसभा और 2017 विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद जौनपुर से एमएलसी बनाया गया. कोरी जाति से संबंध रखने वाले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाकर संदेश देने का काम किया गया है. इसके अलावा यूपी के बजट में इस बार इंडस्ट्री लगाने के लिए 10% की रियायत देने का वादा किया गया है अगर एससी/एसटी को प्रमुखता से नौकरियां दी जाती हैं. यूपी बोर्ड की किताबों में दलित महापुरुषों की कहानियों को शामिल किया गया है.



दिल्ली से बीजेपी सांसद उदित राज को उम्मीद है कि पार्टी को दलितों का 2014 की तरह की समर्थन मिलेगा. वो इसकी वजह बताते हैं, "पीएम मोदी ने दलितों के बाबा साहब आंबेडकर के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए हैं. एसएसी/एसटी एक्ट को कमजोर होने से बचाया. रोस्टर मामले पर उनके साथ खड़े हुए. इसलिए मुझे लगता है कि दलितों का समर्थन बीजेपी को मिलेगा." तो फिर दलितों में नाराजगी क्यों दिख रही है और सांसदों ने भी क्यों अपना गुस्सा प्रकट किया? इसके जवाब में उदित राज कहते हैं, "जो दलित मंत्री हैं वो समाज में कम्युनिकेट नहीं कर पाए."

2014 की लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन में ये मालूम करने की कोशिश की गई कि राज्य में बीजेपी को ये उभार क्यों मिला. अध्ययन में पाया गया कि बीजेपी को सभी वर्गों से पर्याप्त वोट मिले- 70 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों से, 60 फीसीद ओबीसी, 53 फीसदी कुर्मी और 45 प्रतिशत अन्य दलितों से. इससे ये भी पता लगा कि बीजेपी ने किस तरह दूसरी पार्टियों के वोट काटे. 2014 के चुनाव पूर्व सर्वे में पाया गया कि बीएसपी औसत तौर पर 20 फीसदी जाटव (परंपरागत बीएसपी वोटर) के वोट मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में गंवा रही है. एमपी में जाटव वोटों में 13 से 26 फीसदी, राजस्थान में छह से 11 फीसदी, हरियाणा में 16 से 40 फीसदी, दिल्ली में 16 से 40 फीसदी और यूपी में 69 से 85 फीसदी तक की गिरावट हुई.



सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक प्रोफेसर एके वर्मा कहते हैं कि- 'बीजेपी में दलितों ने अपनी जगह बना ली है. जहां तक मायावती की बात है तो उनसे जाटव तो खुश है लेकिन गैर जाटव दलित संतुष्ट नहीं हैं. इस समय अगर सबसे महत्वपूर्ण चुनाव क्षेत्र यूपी की बात करें तो रिजर्व सीटों वाले सभी सांसद बीजेपी के हैं. 85 में से 75 रिजर्व सीटों पर बीजेपी के विधायक हैं. इसीलिए बीजेपी दलितों तक अपनी बात पहुंचा पा रही है. मुझे नहीं लगता कि बीजेपी को दलित वोट नहीं मिलेगा.'
जानकारों के मुताबिक एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में हुई हिंसा की घटनाओं ने बीजेपी के खिलाफ माहौल तैयार किया था. हालांकि CSDS के ताजा सर्वे में तीनों राज्यों में 22% दलितों ने बीजेपी के पक्ष में अपनी राय दी थी और कांग्रेस 23% के साथ सिर्फ 1% से ही आगे थी.

बसपा क्या कह रही है ?
बीएसपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया कहते हैं, "मायावती दलितों की सबसे बड़ी नेता हैं. इस बात को सभी स्वीकार करते हैं. 2014 के बाद जिस तरह से दलितों पर अत्याचार हुए हैं उसे समाज भूला नहीं है. चाहे वो ऊना में दलितों की पिटाई हो या सहारनपुर में. चाहे वो रोहित वेमुला का प्रश्न हो चाहे डॉ. आंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने का मामला. मायावती जी ने दलितों की आवाज संसद से सड़क तक उठाई है. उन्होंने दलितों के लिए संसद से इस्तीफा दिया. निश्चित तौर पर दलित उनके साथ थे, हैं और रहेंगे. हम नहीं मानते कि दलित वोट बीएसपी से छिटका था."

बीजेपी नहीं कांग्रेस से डरी हुई हैं मायावती
गौरतलब है कि बसपा संस्थापक कांशीराम ने बसपा आंदोलन के प्रथम चरण में अति पिछड़े, पिछड़े और मुसलमानों को जोड़ने का प्रयास किया था. हालांकि सपा कि मौजूदगी के चलते ज़मीन पर पिछड़ों और दलितों के बीच सामाजिक और आर्थिक टकराव की स्थिति बनी रही. पिछड़े कभी बसपा के साथ नहीं आए लेकिन गैर यादव वोट बैंक और मुस्लिम वोट बैंक का एक हिस्सा भी मायावती के पक्ष में वोट करता रहा है. साल 2007 और 2009 के चुनावों में मायावती ने अपनी रणनीति बदली और 'सामाजिक भाई चारा' समिति अभियान विकसित कर ब्राह्मण, सवर्ण का फ़ॉर्मूला विकसित किया ये कुछ वक़्त सफल भी रहा लेकिन ये टिक नहीं पाया.



अब यूपी में भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण के उदय से मायावती परेशान नज़र आ रही हैं. आशीष का भी मानना है कि कांग्रेस को लेकर मायावती लगातार आक्रामक बयान इसलिए ही दे रही हैं क्योंकि चंद्रशेखर भी 'जाटव' जाति से आते हैं और कम से कम सहारनपुर में वो बसपा को नुकसान पहुंचाने का काम कर सकते हैं. भले ही चंद्रशेखर बसपा का सपोर्ट करते हों लेकिन कांग्रेस ने इमरान मसूद को टिकट देकर ट्रंप कार्ड खेला है. चंद्रशेखर कई बार जनसभाओं में इमरान को अपना भाई बता चुके हैं. इसके अलावा आज़ादी के बाद से ही दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पास रहा जो अगर वापस लौटा तो बसपा को ही नुकसान उठाना पड़ेगा.

2019 किसी के लिए आसान नहीं!
राजस्थान, गुजरात और यूपी में कई जगहों पर दलितों के साथ हुई अत्याचार की घटनाओं के बाद खुद पीएम नरेंद्र मोदी को सामने आकर कहना पड़ा था कि 'मेरे दलित भाइयों पर वार करना बंद कीजिए, अगर वार करना है तो मुझ पर हमला कीजिए'. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के नतीजों से बीजेपी के लिए जो संदेश आया है उससे ये साफ़ हो गया है कि 2019 में दलित किसे वोट करेगा ये बड़ा सवाल बना रहेगा.



बता दें कि तीनों राज्यों की कुल 78 आरक्षित सीटों में से कांग्रेस ने 43 पर जीत दर्ज की है. मध्य प्रदेश की बात करें तो कुल 35 रिजर्व सीटों में से साल 2013 में बीजेपी ने 28 जीती थीं लेकिन 2018 में वो सिर्फ 18 पर ही सिमट गई है जबकि कांग्रेस 4 से 17 पर पहुंच गई है. राजस्थान की भी कुछ ऐसी ही कहानी है. कांग्रेस जिसके पास 2013 में एक भी आरक्षित सीट नहीं थी उसने 2018 में 19 सीटों पर जीत हासिल की है जबकि पहले 31 सीटों पर जीतने वाली बीजेपी 10 पर सिमट गई है. छत्तीसगढ़ में भी दलितों के बीजेपी से दूर होने का सीधा फायदा कांग्रेस को हुआ है. कांग्रेस ने यहां 2013 में सिर्फ 1 रिजर्व सीट जीती थी जो 2018 में बढ़कर 7 हो गई हैं जबकि बाजेपी 9 सीटों से अब 2 सीटों तक सिमट कर रह गई है.

मेरठ यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर और दलित मामलों के जानकार सतीश प्रकाश कहते हैं, "दलितों की एकता के लिए जो काम उनके संगठन नहीं कर पाए वो सोशल मीडिया और 2 अप्रैल 2018 के आंदोलन ने कर दिया. जिसमें जाटवों के साथ वाल्मीकि समाज और अन्य उप जातियों के लोगों ने शिरकत की. वाल्मीकि आमतौर पर बीजेपी की वोट करता रहा है लेकिन जिस तरह से बीजेपी के शासन में उन पर अत्याचार हुए हैं वो अब एक हो गया है. जहां तक 2014 की बात है तो वो एक आंधी थी और इसमें सभी जातियां फंसी थीं. यहां तक मुस्लिम भी. इस आंधी में दलित तो बहुत कम (24%) फंसे."

बीजेपी का दलित नेतृत्व ही नाराज़:

  • बीजेपी एमपी उदित राज कई बार खुलेआम कह चुके हैं कि पार्टी को अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों की नाराज़गी दूर करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने होंगे. उदित राज पहले भी कह चुके हैं कि मोदी सरकार के दलित मंत्री समुदाय के प्रति अपना फर्ज भूल गए हैं. इस वजह से दलित समाज बीजेपी से दूर जा रहा है.

  • बहराइच से बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले का इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस में शामिल होना भी बीजेपी के लिए झटका है.

  • उत्तर प्रदेश के रॉबर्ट्सगंज से बीजेपी सांसद छोटेलाल खरवार भी सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार से अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं. उन्होंने पीएम मोदी को एक चिट्ठी भी लिखी थी कि सीएम ने उन्हें डांटकर भगा देते हैं.

  • यूपी के इटावा से सांसद अशोक दोहरे भी सीएम योगी समेत बीजेपी नेताओं के खिलाफ अपना गुस्सा निकाल चुके हैं. उन्होंने पीएम मोदी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि 2 अप्रैल 2017 को 'भारत बंद' के बाद एससी/एसटी वर्ग के लोगों को उत्तर प्रदेश सहित दूसरे राज्यों में सरकारें और स्थानीय पुलिस झूठे मुकदमे में फंसा रही है. उन पर अत्याचार हो रहा है.' उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस निर्दोष लोगों को जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए घरों से निकाल कर मारपीट कर रही है. इससे इन वर्गों में गुस्सा और असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है.

  • यूपी के नगीना से बीजेपी सांसद यशवंत सिंह ने भी मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि उनकी ओर से 4 साल में 30 करोड़ की आबादी वाले दलित समाज के लिए प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी नहीं किया गया. बैकलॉग पूरा करना, प्रमोशन में आरक्षण बिल पास करना, प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण दिलाना आदि मांगें नहीं पूरी की गईं. उन्होंने पीएम मोदी को खत लिखकर कहा था कि बीजेपी के दलित सांसद प्रताड़ना के शिकार बन रहे हैं.




वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि भले ही दलित वोट बैंक पर बसपा अपना दावा करे लेकिन ये शुरुआत में कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहा है. बाद में ये बिखर गया और बसपा समेत कई दलों के पास चला गया. जिन पार्टियों ने दलित मुद्दों पर काम करने का वादा भी किया था वो भी सभी मोर्चों पर असफल साबित हुए. आज जो हालत बने वो इन्हीं क्षेत्रीय दलों की असफलता की वजह से है. कश्मीर, केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक के अलावा कहीं भी भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर बात नहीं हुई, जबकि आप देखेंगे कि जहां इन पर बात हुई वहीं दलित उत्पीड़न की घटनाएं लगातार कम होती गईं. उर्मिलेश आगे कहते हैं कि 2014 में दलितों के एक हिस्से ने कुछ ऐसी पार्टियों को वोट दिया जिन्हें आमतौर पर दलित वोट नहीं मिलता था. हालांकि एससी/एसटी एक्ट, प्रमोशन में आरक्षण, 13 पॉइंट रोस्टर, दलितों के खिलाफ अत्याचार, रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे कई मुद्दे रहे जिन्होंने उन पार्टियों से भी दलित बीते पांच सालों में लगातार दूर होते गए हैं.

साथ में ओम प्रकाश 
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First published: March 19, 2019, 9:40 AM IST
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