राम मंदिर विवाद: 67 एकड़ जमीन वापस करने की अपील, इस ताजा कदम के क्या हैं मायने

कहते हैं जहां चाह वहां राह. इसी बीच राम जन्भूमि न्यास ने अपनी 42 एकड़ जमीन वापस करने की एक ताजा अपील सरकार के पास भेज दी. उसे मानते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर न्यास को जमीन लौटाने की इजाजत मांगी है.

अमिताभ सिन्हा | News18 Uttar Pradesh
Updated: January 30, 2019, 1:21 AM IST
राम मंदिर विवाद: 67 एकड़ जमीन वापस करने की अपील, इस ताजा कदम के क्या हैं मायने
अयोध्या
अमिताभ सिन्हा
अमिताभ सिन्हा | News18 Uttar Pradesh
Updated: January 30, 2019, 1:21 AM IST
कुछ महीनों से राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का मामला लगातार टलता ही जा रहा था और मोदी सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें भी बढ़ती चली जा रहीं थीं. अध्यादेश लाने का दबाव बढ़ता चला जा रहा था. संघ के शीर्ष नेता हों या फिर वीएचपी राम मंदिर निर्माण जल्दी शुरू करने के लिए एक के बाद एक बयान दे रहे थे. बीजेपी आलाकमान अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए ज्यादा चिंतित था क्योंकि राम मंदिर उनकी भावनाओं से जुड़ा मुद्दा था. पीएम नरेंद्र मोदी कह चुके थे कि सरकार संवैधानिक प्रक्रिया का ही पालन करेगी. अब रास्ता क्या निकलता.

कहते हैं जहां चाह वहां राह. इसी बीच राम जन्‍मभूमि न्यास ने अपनी 42 एकड़ जमीन वापस करने की एक ताजा अपील सरकार के पास भेज दी. उसे मानते हुए सरकार ने अपनी तैयारी कर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि न्यास को जमीन लौटाने की उन्हें इजाजत दी जाए. सरकारी सूत्र बताते हैं कि सिर्फ 0.313 एकड़ जमीन पर विवाद है जबकि नरसिम्हा राव सरकार ने कुल 67 एकड़ जमीन अधिगृहित की थी.



1993 में जब इस्माइल फारुकी केस में जब फैसला आया तो कहा गया कि ये जमीन मामले के निबटारे तक लोगों की सहूलियत के लिए इस्तेमाल किया जाए. जब कोर्ट से पूछा गया कि उनकी जमीनें क्यों लीं तो कोर्ट ने कहा कि सरकार रिसीवर के तौर पर जमीन ले रही है. अंतिम फैसले तक सरकार की ही जिम्मेदारी होगी कि जमीन लौटानी है या नहीं. यह एक पॉलिसी से जुड़ा मसला होगा. इसे ही मानते हुए सरकार ने मास्टर स्ट्रोक तय कर लिया और राम जन्मभूमि न्यास को जमीन लौटाने का फैसला लेते हुए कोर्ट से इसकी इजाजत मांग ली.

सरकार के सूत्र बताते हैं कि इस्माइल फारुकी केस में कोर्ट के फैसले से कई अहम बातें निकलीं-

1) मुसलमानों की विवादित इलाके से बाहर की जमीन में कोई दिलचस्पी नहीं.
2) मुसलमानों ने 0.313 एकड़ भूमि से बाहर किसी भी जमीन पर दावा नहीं ठोका.
3) जिन हिंदुओं की जमीनें अधिगृहित की गईं उन पर कोई विवाद नहीं. इसलिए उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता.
Loading...

4) पैरा 57 के मुताबिक पूरी जमीन को उनके मालिकों को वापस देना सरकार की ड्यूटी थी.
5) अगर मुसलमान टाइटल सूट जीत जाते हैं तो फिर उनको रास्ता देने के लिए जमीन का मालिकाना तय करना होगा.

असलम भूरे केस पर हुए फैसले ने राम जन्मभूमि पर होने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले तक स्टेटस को बनाए रखने को कह दिया था. लेकिन सरकार ने अपनी चाल चलते हुए इस्माइल फारुकी केस का हवाला दिया. सूत्र बताते हैं कि अधिगृहित जमीन को लेकर सरकार अंतिम फैसला खुद ही ले सकती थी लेकिन उन्होंने कोर्ट का सम्मान रखा. असलम भूरे केस के फैसले के हिसाब से चलते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से ही 0.313 एकड़ विवादित जमीन से बाहर 67 एकड़ जमीन का मालिकाना हक लौटाने का फैसला ले लिया है.

सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों का मानना है कि राम मंदिर को लेकर दबाव बहुत था. दो हफ्ते पहले जब बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अमित शाह ने राम मंदिर का जिक्र किया था तब पूरा सभागार 10 मिनट तक जय श्रीराम के नारों से गूंजता रहा था और जिसे शांत करने के लिए अमित शाह को भारत माता की जय का नारा लगवाना पड़ा था. जब पार्टी के कार्यकर्ताओं में ऐसी भावना थी तो सुप्रीम कोर्ट में तारीख पर तारीख पड़ना तो उन पर भारी पड़ ही रहा था.

पीएम मोदी और अमित शाह तो संवैधानिक प्रक्रिया पालन करने की बात कर रहे थे. इसलिए सरकार ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राम जन्भूमि न्यास की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी.

ये भी पढ़ें: सरकार का राम मंदिर बनाने का ये है मास्टर प्लान!

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...