कौन से हैं वो 5 कारण जिनकी वजह से यूपी में इस बार का उपचुनाव बाकी उपचुनावों से होगा अलग

पिछले 25-30 सालों से चुनावों में कांग्रेस को कोई सीरियसली नहीं ले रहा था, लेकिन इस बार हालात बदले- बदले से हैं.  (फाइल फोटो)
पिछले 25-30 सालों से चुनावों में कांग्रेस को कोई सीरियसली नहीं ले रहा था, लेकिन इस बार हालात बदले- बदले से हैं. (फाइल फोटो)

2017 में सीएम बनने के बाद योगी राज में यूपी में ये तीसरा उपचुनाव (Bye Election) है. जानकार मानते हैं कि होने जा रहा उपचुनाव ही वास्तव में योगी आदित्यनाथ की असली व्यक्तिगत परीक्षा है.

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लखनऊ. उम्मीद तो थी कि बिहार विधानसभा चुनावों के साथ ही यूपी (UP) की 8 सीटों पर उपचुनाव (Bye- Election) की घोषणा भी हो जायेगी. लेकिन, ऐसा हो न सका. अब चुनाव आयोग मंगलवार यानि 29 सितम्बर को तारीखों का एलान कर सकता है. घोषणा के साथ ही सभी राजनीतिक पार्टियों की सरगर्मी भी तेज हो जायेगी. इस बार 8 सीटों (8 Seats) पर होने वाले उपचुनाव कई मायनों में पहले के उपचुनावों से अलग होगा. कौन से हैं वो 5 कारण जिसकी वजह से ये उपचुनाव पहले के उपचुनाव से अलग होने वाले हैं. कुछ एक बारी को छोड़ दिया जाये तो उपचुनाव बेहद ही निरस और मुद्देविहीन होते रहे हैं. हालांकि, इस बार होने वाले उपचुनाव पहले के उपचुनावों से बिल्कुल जुदा होगा.

1. सभी विपक्षी पार्टियों की भागीदारी
आम तौर पर यूपी में होने वाले उपचुनाव दो ही पार्टियों के बीच हुआ करते थे. इस बार भी ऐसा ही होता. इसमें सीधी टक्कर सत्ताधारी भाजपा और सपा के बीच होती, लेकिन बसपा ने इसमें कूदकर इसे खासा दिलचस्प बना दिया है. बसपा उपचुनाव में नहीं उतरती थी, लेकिन इस बार वो आठों सीटों पर लड़ने जा रही है.

2. कांग्रेस की मजबूत उपस्थिति 
पिछले 25-30 सालों से चुनावों में कांग्रेस को कोई सीरियसली नहीं ले रहा था, लेकिन इस बार हालात बदले- बदले से हैं. कांग्रेस के उम्मीद्वारों को कितने वोट मिलेंगे ये अलग बात है, लेकिन पहली बार किसी चुनाव से पहले कम से कम इसकी चर्चा तो हो रही है. संगठन के नये- नये पदाधिकारियों ने खासकर प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू के सड़क पर संघर्ष करके चर्चा तो हासिल की ही है.



3. मुद्दों की भरमार 
लखनऊ स्थित गिरि इन्सटीट्यूट ऑफ डेवलॉपमेण्ट स्टडीज में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिल्पशिखा सिंह कहती हैं कि "उपचुनाव में जनता की वैसी भागीदारी नहीं देखने को मिलती है जैसी दूसरे चुनावों में. इसीलिए मुद्दों की भी चर्चा तेजी नहीं पकड़ पाती." हालांकि,  होने जा रहे उपचुनाव में मुद्दे तो भरपूर उठेंगे. कानून व्यवस्था, ब्राह्मण राजनीति, दलित उत्पीड़न, कोरोना मैनेजमेण्ट, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को विपक्षी पार्टियां तेजी से हवा दे रही हैं.

4. सीएम योगी की व्यक्तिगत परीक्षा 
2017 में सीएम बनने के बाद योगी राज में यूपी में ये तीसरा उपचुनाव है. जानकार मानते हैं कि होने जा रहा उपचुनाव ही वास्तव में योगी आदित्यनाथ की असली व्यक्तिगत परीक्षा है. इससे पहले के उपचुनावों में पीएम का चेहरा सामने था लेकिन, पहली बार योगी सरकार के कामकाज और उनके चेहरे पर चुनाव होने जा रहा है.

5. 2022 के मुख्य चुनाव का सेमीफाइनल 
इसे इस रूप में भी देखा जा रहा है. 8 सीटों पर हार जीत से विधानसभा में कुछ भी नहीं बदलेगा लेकिन, पार्टियों का राजनीतिक आधार जरूर कुछ बदल जायेगा. आठों सीटें भाजपा जीत जाती है तो उसे कहने का मौका मिलेगा कि कोई नहीं है टक्कर में. जबकि कुछ सीटें वो नहीं जीत पाती तो विपक्षी पार्टियों को कई गुणा ज्यादा ये कहने का अवसर मिल जायेगा कि सरकार जनता का विश्वास खो चुकी है.
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