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यूपी उपचुनाव में मायावती के लिए आसान नहीं 'एकला चलो' की राह

मंगलवार को मायावती ने ऐलानिया तौर पर सपा के साथ संबंध विच्छेद कर लिया.

मंगलवार को मायावती ने ऐलानिया तौर पर सपा के साथ संबंध विच्छेद कर लिया.

मायावती ने भले ही अब आगे अकेले 'सफर' करने की बात कही हो, लेकिन उनकी राह आसान नहीं लग रही है.

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    मायावती ने भले ही यूपी में अब अकेले 'सफर' करने की बात कही हो, लेकिन उनकी राह आसान नहीं लग रही है. मंगलवार को मायावती ने ऐलानिया तौर पर सपा के साथ संबंध विच्छेद कर लिया. अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूपी उपचुनाव की है. हालांकि, लोकसभा चुनाव में दस सीटें जीतकर बीएसपी ने राजनीतिक ताकत थोड़ी मजबूत की है. लेकिन, इन दस सीटों पर उसने जीत तब हासिल की जब वो समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थी. बीएसपी ने 2014 का लोकसभा चुनाव मोदी लहर में अकेले लड़ा था और वो अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी. कुछ ऐसा ही 2017 के विधानसभा उपचुनाव में भी हुआ और पार्टी को महज 17 सीटों से समझौता करना पड़ा.
    12 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव का समीकरण

    लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करके यूपी के 11 विधायक, सांसद बन गए हैं. खाली हुई 11 सीटों में 8 पर बीजेपी का कब्जा था और 1-1 सीट समाजवादी पार्टी और बीएसपी के खाते में थी. इनके साथ हमीरपुर विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होना है.

    अगर 2017 के चुनावों के मुताबिक इन उपचुनावों के गणित को समझा जाए तो तीन या चार ही सीटें हैं जहां बीएसपी मजबूत प्रदर्शन कर सकती है. 2017 के आंकड़ों के मुताबिक बीएसपी तीन क्षेत्रों में ही दूसरे स्थान पर रही थी. जलालपुर सीट उसके कब्जे में थी. अब गठबंधन टूटने के बाद बीएसपी को सभी सीटों पर समीकरण इस तरह साधने होंगे कि उसके प्रत्याशी जीतें.
    बीजेपी की दलितों में पैठ

    बीएसपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी की है जो तेजी से दलित वोट बैंक में सेंध लगा रही है. मीडिया में ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं, जिनके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी दलित वोटरों को अपने साथ लाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है.
    असमंजस में अल्पसंख्यक

    समाजवादी पार्टी और बीएसपी के गठबंधन की वजह से यूपी में मुस्लिम वोटरों ने लोकसभा चुनाव में मोटे तौर पर एक जगह वोट किया था, लेकिन अब इस वोटर समूह के सामने भी असमंजस है. इस बार बीएसपी के जीते हुए प्रत्याशियों में बड़ा प्रतिशत अल्पसंख्यकों का है.
    अखिलेश की छवि

    समाजवादी पार्टी की तरफ से बयान आया है कि मायावती उनका विरोध इस वजह से कर रही हैं क्योंकि दलितों का समर्थन सपा को मिल रहा है. अखिलेश यादव लगातार अपनी छवि एक उदार नेता की बना रहे हैं. दोनों पार्टियों का संबंध जुड़ने से लेकर टूटने तक अखिलेश यादव ने लगातार संयमित भाषा और राजनीति का इस्तेमाल किया है. बीएसपी को इससे भी लड़ना होगा.
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