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आखिर क्यों राहुल-प्रियंका को कूदना पड़ा चाची मेनका गांधी के खिलाफ प्रचार में?

फाइल फोटो

फाइल फोटो

दरअसल 1984 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ने के बाद संजय गांधी और राजीव गांधी का परिवार कभी भी चुनाव में आमने-सामने नहीं आया.

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2019 का लोकसभा चुनाव कई मायने में दिलचस्प है. इस चुनाव में प्रियंका गांधी की सक्रिय राजनीति में एंट्री हुई है तो वहीं दो धुर राजनैतिक विरोधी सपा व बसपा के बीच गठबंधन देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. इसके अलावा यह पहला मौका है, जब गांधी परिवार की युवा पीढ़ी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अपनों के ही खिलाफ चुनाव प्रचार में कूद पड़े हैं.

दरअसल 1984 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ने के बाद संजय गांधी और राजीव गांधी का परिवार कभी भी चुनाव में आमने-सामने नहीं आया. चाहे चुनाव प्रचार में बयानबाजी की बात हो या फिर एक-दूसरे के लोकसभा क्षेत्र में प्रचार की, दोनों ही परिवार कभी भी आमने-सामने नहीं आए. पारिवारिक मर्यादाओं को हमेशा से राजनीति की बिसात से दूर रखा गया. राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया से लेकर राहुल और प्रियंका किसी ने भी मेनका और उनके बेटे वरुण को लेकर न तो कभी टिप्पणी की और न ही एक दूसरे के क्षेत्र में गए. ठीक ऐसा ही मेनका के परिवार ने भी किया.



लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग है. चुनाव की शुरुआत होते ही सबसे पहले मेनका गांधी की प्रतिक्रिया आई, जब उनसे राहुल गांधी की न्याय योजना पर सवाल किया गया. मेनका ने कहा, "मैं शेखचिल्लियों की बातों का जवाब नहीं देती." इसके बाद राहुल गांधी सुल्तानपुर से कांग्रेस प्रत्याशी डॉ संजय सिंह के प्रचार के लिए पहुंचे. यहीं से उनकी चाची मेनका गांधी भी बीजेपी की प्रत्याशी हैं. इन दो घटनाओं के बाद दोनों परिवारों के बीच दशकों पुरानी मर्यादा की दीवार टूट गई. अब गुरुवार को प्रियंका गांधी भी सुल्तानपुर में चाची मेनका के खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी के लिए रोड शो कर रही हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और पॉलिटिकल मामलों के जानकार रतनमणि लाल कहते हैं कि यह ठीक उस पटीदारी की लड़ाई की तरह ही है, जैसा आम परिवारों में देखने को मिलता है. मां-बाप और ताऊ-ताई के पिक्चर से बाहर होते ही नई पीढ़ी उन रिश्तों को ढोने में विश्वास नहीं करती. उन्होंने कहा जब तक सोनिया गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रहीं थी, तब तक देवरानी-जेठानी और भतीजा-भतीजी का सम्मान बरकरार था. अब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान राहुल और प्रियंका को दे दी है. लिहाजा वह सम्मान या मर्यादा देखने को नहीं मिलेगा.

उन्होंने कहा कि क्योंकि राहुल और प्रियंका की जिम्मेदारी बढ़ गई है. कांग्रेस का अच्छा या बुरा जो भी होगा, उसकी जिम्मेदारी भी दोनों ही पर होगी. इसके अलावा अब उस रिश्ते को सियासत में सम्मान देने की परवाह भी दोनों ही परिवार नहीं करेंगे. मेनका भी अपने बेटे के बारे में सोचेंगी. वह भी खामोश नहीं रहेंगी. उसी तरह राहुल और प्रियंका भी उस रिश्तों को ढोते नजर नहीं आएंगे.

उन्होंने कहा कि हालांकि अभी दोनों ही परिवार खुलकर एक-दूसरे के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं. लेकिन आने वाले समय में अगर एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी भी होती है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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