ANALYSIS: चंद्रशेखर की नई पार्टी से बसपा को कितना नुकसान?
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ANALYSIS: चंद्रशेखर की नई पार्टी से बसपा को कितना नुकसान?
मौजूदा दौर में मायावती की राजनीतिक साख गिरती जा रही है और दलित पॉलिटिक्स में एक वैक्यूम बन गया है.

चन्द्रशेखर आज़ाद 'रावण' उसी जाटव जाति से आते हैं जिस जाति की मायावती हैं. ऊपर से दलित युवाओं में चन्द्रशेखर को लेकर थोड़ा क्रेज़ बढ़ा है.

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लखनऊ. अब तक आंदोलन तक सीमित रहे भीम आर्मी चीफ चन्द्रशेखर आजाद ने सक्रिय राजनीति में उतरने का ऐलान कर दिया है. उनके ऐलान के साथ ही राजनीतिक पार्टियों में नफा-नुकसान को तौला जाने लगा है. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर ने तो उनसे आनन फानन में भेंट भी कर ली, लेकिन जानकारों का मानना है कि चन्द्रशेखर की पार्टी के अस्तित्व में आने से सबसे ज्यादा खलबली बहुजन समाज पार्टी में मची होगी. इस खलबली के पीछे एकमात्र कारण है- दलित राजनीति पर बसपा के एकाधिकार के टूटने का खतरा.

धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं विधानसभा चुनाव

इसी राजनीति के दम पर खड़ी हुईं मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग को साधा और सत्ता में आ बैठी थीं, लेकिन अब सबकुछ बिखरता हुआ नजर आ रहा है. लोकसभा के चुनाव तो दूर हैं, लेकिन विधानसभा के चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा की हालत बेहद खराब हो गई थी. उसे महज 17 सीटें ही मिलीं थीं.



भाजपा की आंधी में भी बसपा ने बाजी मारी
जाहिर है कि ये वो सीटें हैं जहां भाजपा की आंधी में भी बसपा ने बाजी मार ली यानी बेहद मजबूत किला. ऐसे में सवाल है कि क्या चंद्रशेखर रावण की पार्टी के चुनावी मैदान में इन 17 सीटों पर भी बसपा के लिए खतरा मण्डराने लगा है? बहरहाल, आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को जो 17 सीटें मिली थीं उनमें से 8 ऐसी सीटें हैं जिसे बसपा ने हारते-हारते जीत ली थीं. इनमें से 3 सीटों पर जीत का अंतर तो हजार वोटों से भी कम था. सहारनपुर की रामपुर मनिहारन, मथुरा की मांट, आजमगढ़ की मुबारकपुर सीट ऐसी ही हैं जिसे बसपा ने बहुत मुश्किल से जीती थी. इसके अलावा 5 सीटें ऐसी हैं जहां पार्टी के जीत का अंतर ढाई हजार के आसपास रहा.


बसपा के हाथ से ये सीटें जा सकती हैं

आजमगढ़ की लालगंज और दीदारगंज, गोरखपुर की चिल्लूपार, हापुड़ की धौलाना और सीतापुर की सिधौली ऐसी ही सीटें हैं. इन सीटों पर यदि 2022 के चुनाव में चन्द्रशेखर रावण की पार्टी थोड़ा भी संघर्ष करती है तो बसपा के हाथ से ये सीटें जा सकती हैं. मायावती पर किताब (बहन जी-दी पॉलिटिकल बायोग्राफी, बहन जी-दी राइज़ एण्ड फॉल ऑफ मायावती) लिखने वाले अजय बोस बताते हैं कि चन्द्रशेखर का उदय बसपा के लिए बड़ा डेंट हो सकता है.

युवाओं में चन्द्रशेखर को लेकर क्रेज़

चन्द्रशेखर उसी जाटव जाति से आते हैं जिस जाति की मायावती हैं. ऊपर से दलित युवाओं में चन्द्रशेखर को लेकर थोड़ा क्रेज़ बढ़ा है. हालांति अजय बोस ने ये भी बताया कि चन्द्रशेखर बसपा की जगह तो नहीं ले सकते, लेकिन अपनी अलग पार्टी की पहचान से बसपा को नुकसान जरूर पहुंचा सकते हैं. उन्होंने ये भी कहा कि मौजूदा दौर में मायावती की राजनीतिक साख गिरती जा रही है और दलित पॉलिटिक्स में एक वैक्यूम बन गया है. अब इसे चन्द्रशेखर रावण कितना भर पाते हैं, ये समय बतायेगा.

(इनपुट - मनीष कुमार, लखनऊ)

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