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OPINION: पुलिस कप्‍तान की जगह कमिश्‍नर बनाने से क्‍या वाकई बदल जाएगा पुलिस सिस्टम

News18 Uttar Pradesh
Updated: January 16, 2020, 4:55 PM IST
OPINION: पुलिस कप्‍तान की जगह कमिश्‍नर बनाने से क्‍या वाकई बदल जाएगा पुलिस सिस्टम
हाल ही में योगी आदित्यनाथ सरकार ने लखनऊ और नोएडा में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने को मंजूरी दी है. (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में सन 1977 में भी पुलिस कमिश्‍नर प्रणाली (Police Commissionerate System) लागू की गई थी, लेकिन इस पर अमल होने से पहले ही रोक लगा दी गई थी, अब 42 साद बाद इसकी वापसी के मायने जानना जरूरी है.

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(सुधीर जैन)

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के दो जिलों में पुलिस कमिश्‍नर प्रणाली (Police Commissionerate System) लागू हो गई है. इसे पुलिस सुधार (Police Reforms) का काम बताया जा रहा है. यह काम होते ही इस काम के नफे-नुकसान का विवाद भी चालू हो गया. हालांकि यह विवाद अभी अप्रत्यक्ष रूप से आईएएस और आईपीएस अफसरों के बीच तक सीमित है. बात बढ़ेगी तो अपराधशास्त्रियों और जागरूक नागरिकों तक पहुंचेगी. बहरहाल, यूपी पुलिस व्यवस्था में इस आंशिक बदलाव का विश्लेषण जरूर होना चाहिए.

क्या वाकई कोई नई बात

यह नई बात नहीं है. देश के 15 प्रदेशों में फुटकर-फुटकर यह प्रणाली पहले से है. देश के कोई 71 जिलों में यह लागू है. और तो और खुद यूपी में सन 1977 में कानपुर में इसे लागू कर ही दिया गया था. यह काम तीसरे पुलिस आयोग की सिफारिश पर हुआ था. लेकिन पता नहीं तब क्या हुआ कि कार्यभार संभालने जाते नवनियुक्त पुलिस आयुक्त को रास्ते में ही कह दिया गया कि अभी चार्ज न लें. बहरहाल, इस समय देश में जहां जहां यह प्रणाली पहले से है और जहां नहीं है, उनमें पुलिस की कार्यप्रणाली में क्या अंतर है? इसे भी देख लिया जाना चाहिए था. मसलन पुलिस आयुक्त प्रणाली वाले दिल्ली और मुंबई में पुलिस के कामकाज का आकलन आसानी से किया जा सकता था. कम से कम एक सवाल पर जरूर सोचा जा सकता था कि देश की राजधानी दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कई और जिलों में लागू इस प्रणाली से ऐसा क्या हासिल हो रहा है जो गैर पुलिस आयुक्त प्रणाली में नहीं है. अगर वाकई आयुक्त प्रणाली से पुलिस सुधार होता है तो इसे हर प्रदेश के हर बड़े जिले में लागू करने में संकोच क्यों?

संकोच बहुत है लेकिन...

दरअसल पुलिस और सामान्य प्रशासन के कामकाज में खासा अंतर है. अलबत्ता दोनों ही सरकार के एजंट ही समझे जाते हैं. अब चूंकि हमारी राजव्यवस्था का नाम वैधानिक लोकतंत्र है, इसलिए सरकार की मनमर्जी की गुंजाइश बचती नहीं है. अपने वैधानिक लोकतंत्र का मुख्य लक्षण यह बताया गया है कि सब कुछ विधान और संविधान की इच्छा से ही हो. जाहिर है कि कोई भी सरकार अपनी इच्छा से काम चलवाना चाहे तो पुलिस और सामान्य प्रशासन की मदद के बगैर करवाना आसान नहीं है. वैधानिक स्थिति यह है कि सरकारी आदेश किसी मंत्री या जनप्रतिनिधि के दस्तखत से जारी नहीं होते. छोटा बड़ा कोई भी सरकारी फैसला या आदेश किसी आईएएस के दस्तखत से जारी होता है और उसी को गवर्नमेंट आर्डर या जीओ कहा जाता है.

यह बिल्कुल खुली बात है कि अपनी इस वैधानिक हैसियत के कारण आईएएस अधिकारियों का प्रभुत्व है. ऐसा प्रभुत्व है कि कई बार सरकार के गैरवाजिब इरादों के मुताबिक काम करने में आईएएस अफसर आनाकानी या हीलाहवाली भी करते पाए जाते हैं. अब तक का अनुभव है कि किसी सरकार के अस्थायी तौर पर वफादार से वफादार अफसर भी अपने भविष्य की चिंता में रहते हैं. उन्हें पता होता है कि एक तय समय के लिए चुनी सरकार के बाद दूसरी सरकार भी आ सकती है. बहरहाल, अगर किसी शासन में आईएएस जैसा इतना प्रभुतासंपन्न वर्ग पुलिस आयुक्त प्रणाली से नाखुश होता हो तो हर प्रदेश या हर जिले में यह लागू करने में किसी सरकार को संकोच तो होगा ही होगा.आखिर झंझट है क्या?

वास्तविक झंझट आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की कानूनी हैसियत कम ज्यादा होने की ही है. आमतौर पर आईएएस अधिकारियों के पास मजिस्ट्रेटी अधिकार भी होते हैं. कानून-व्यवस्था के काम में जब कर्फ्यू या धारा-144 लगाना हो या फिर धरने, विरोध प्रदर्शनों और कई तरह के दंगे-फसाद से निपटने के लिए गोली या दूसरे बल प्रयोग करना हो तो चलन के मुताबिक पुलिस को अमूमन आईएएस अफसरों से आदेश लेने पड़ते हैं. सरकार अपने वफादार पुलिस अफसरों से कहीं सख्ती करवाना चाहे तो सीधे पुलिस से वैसा आसानी से करवा नहीं पाती.

आमतौर पर सरकार के मंत्री उस जिले के जिलाधिकारी के जरिए ही करवा पाते हैं. अब चूंकि ये आईएएस अफसर अपनी हैसियत के मुताबिक ना-नुकुर भी कर सकते हैं सो कोई भी सरकार चाहेगी कि कानून-व्यवस्था कि मामले में मजिस्‍ट्रेटी ताकत उन अफसरों को मिल जाए जो आमतौर पर ज्यादा वफादारी निभा सकते हों. सामान्य अनुभव है कि हर सरकार के पास इस काम के लिए अनुशासित और आज्ञाकारी पुलिस पाई जाती है. गौरतलब है कि पुलिस आयुक्त प्रणाली में पुलिस के पास मजिस्‍ट्रेटी अधिकार आ जाते हैं और कानून-व्यवस्था के मामले में आईएएस अफसर एक किनारे बैठा दिए जाते हैं.

नैतिकता का पहलू

पुलिस आयुक्त प्रणाली को पुलिस सुधार के नजरिए से प्रचारित किया जाता रहा है. दरअसल 1977 में धर्मवीर आयोग ने अपनी अंतरिम सिफारिशों में इस प्रणाली का सुझाव दिया था. इस लिहाज से यूपी में इसे लागू करने का एक नैतिक आधार मौजूद है. वैसे भी हर सुधार को अच्छा या नैतिक ही मान लिया जाता है. भाषा के लिहाज से सुधार, सकारात्मक भाव का शब्द है. जब भी किसी सरकार को अपनी सुविधा के लिए कोई बदलाव करना हो तो वह सुधार शब्द का ही इस्तेमाल करती है.

इसीलिए चाहे सामाजिक सुधार हों या आर्थिक या न्यायिक सुधार हों, उनकी नैतिकता या सहीपन पर ज्यादा सवाल उठते नहीं हैं. इस लिहाज से पुलिस सुधार का नारा लगाकर पुलिस आयुक्त प्रणाली के पक्ष में महौल बनाना आसान है. वैसे हो यह भी सकता है कि पुलिस आयुक्त प्रणाली वाकई बड़े काम की चीज हो. लेकिन यह भी तो लेखे में लेना चाहिए कि यह 15 प्रदेशों में कुछ जगह पहले से लागू है और अगर यह कानून-व्यवस्था के लाख दुखों की अजमाई हुई एक दवाई होती तो हर प्रदेश में चौतरफा कब की चालू हो गई होती. जाहिर है कि झंझट कुछ और है.

लोकतांत्रिक राजव्यवस्था के दायरे

ज्ञात इतिहास के आदिकाल से लेकर आज तक जितनी भी राजव्यवस्थाएं सोची गईं, उनमें पूरी तौर पर निरापद राजव्यवस्था ढूंढी नहीं जा सकी. हर राजव्यवस्था एक हद तक ही नैतिक या सही साबित हो पाती है. फिर भी राजनीतिशास्त्र में लोकतांत्रिक राजव्यवस्था को ही आमतौर पर सबसे कम हानिकारक माना जाता है. लोकतंत्र को और ज्यादा निरापद बनाने के लिए वैधानिक लोकतंत्र को आधुनिक खोज कहा जाता है. आजादी के बाद हमने वैधानिक लोकतंत्र को ही अपनाया था. विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका तीनों पर ही संविधान का अंकुश है. कोई संप्रभु नहीं है. यहां तक कि वैधानिक लोकतंत्र में लोक या लोग भी संप्रभु नहीं है. वह भी अपने बनाए या कबूल किए गए संविधान के अधीन है.

यानी पुलिस आयुक्त प्रणाली में पुलिस को संप्रभुता मिल जाती है यह उसका भ्रम ही है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह विधायिका या कार्यपालिका का आईएएस वाला तबका भी संप्रभु नहीं है. अब ये अलग बात है कि वे कभी कभी आपस में मिलीभगत करके संप्रभु जैसी हरकतें करने लगते हों. उसके बावजूद वे खुलकर मनमर्जी फिर भी नहीं चला पाते. वरना यूपी में दो जगह पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने के लिए यह नारा न लगाना पड़ता कि यह कदम पुलिस सुधार के लिए है.

कुल मिलाकर पुलिस आयुक्त प्रणाली नई चीज नहीं है. यहां तक कि वैचारिक रूप से यूपी के लिए भी यह नई बात नहीं है. बस एक ही नई बात है कि 43 साल पहले कानपुर के लिए नियुक्त किए गए पुलिस आयुक्त अपना कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाए थे. इस बार नया यह है कि गौतमबुद्धनगर और लखनऊ में पुलिस आयुक्तों को कार्यभार ग्रहण करवा दिया गया है.

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First published: January 16, 2020, 4:53 PM IST
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