कोरोना संकट के बीच योगी सरकार की बड़ी उपलब्धि, पिछले साल के लगभग बराबर रही गेहूं खरीद
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कोरोना संकट के बीच योगी सरकार की बड़ी उपलब्धि, पिछले साल के लगभग बराबर रही गेहूं खरीद
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कोरोना संकट के दौर में पिछले साल की तरह ही गेहूं खरीद की है.

उत्तर प्रदेश में कोरोना (COVID-19) संकट में भी पिछले साल के मुकाबले गेहूं की लगभग खरीद बराबर ही हुई है. पिछले साल 37.04 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की गई थी. इस साल 35.75 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की गई.

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में सरकार द्वारा गेहूं खरीद की समय सीमा समाप्त हो गई है. 30 जून को गेहूं की खरीद खत्म हो गई. सरकारी केंद्रों पर 15 अप्रैल से 30 जून तक 35.75 लाख मीट्रिक टन गेहूं की कुल खरीद खाद्य विभाग के द्वारा की गई. खास बात यह रही कि कोरोना (COVID-19) संकट में भी पिछले साल के मुकाबले गेहूं की लगभग खरीद बराबर ही हुई है. पिछले साल 37.04 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की गई थी. इस साल 35.75 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की गई. यानी पिछले साल के मुकाबले 1.29 लाख मीट्रिक टन गेहूं ही कम खरीदा गया है.

सरकार ने खाद्य विभाग को 55 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीद का लक्ष्य दिया था. इसके सापेक्ष 65 फ़ीसदी गेहूं की खरीद की गई. 2019 में भी खरीद का लक्ष्य इतना ही रखा गया था. खरीद इसके सापेक्ष 67 फीसदी हुई थी.

खरीद से खाद्य विभाग के अफसर हैं संतुष्ट और उत्साहित



खाद्य विभाग के अधिकारी इस साल हुई गेहूं खरीद से काफी उत्साहित हैं. कारण यह है कि गेहूं की खरीद के समय पूरा लॉकडाउन (Lockdown) चल रहा था. लॉकडाउन के बीच न सिर्फ खाद्य विभाग के अधिकारियों बल्कि किसानों के सामने भी मंडियों तक पहुंचने की बहुत दिक्कत थी. खाद्य आयुक्त मनीष चौहान ने बताया कि "गेहूं खरीद के लक्ष्य को ज्यादा से ज्यादा पूरा करने के लिए 3 तरीके से खरीद की व्यवस्था बनाई गई. पहली व्यवस्था के तहत सरकारी मंडियों में खरीद की गई. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में खरीद केंद्र भी बनाए गए. तीसरी और सबसे अहम व्यवस्था मोबाइल खरीद केंद्रों (सचल खरीद गाड़ी) की तैयार की गयी. इसके जरिए किसानों के घर या खलिहान से ही गेहूं की खरीद विभाग ने कर ली.”
उन्होंने कहा कि गेहूं बेचने के लिए उन्हें मंडियों या केंद्रों तक आने की मजबूरी नहीं रही. हालांकि कोरोना संकट की वजह से समस्याएं भी तमाम आई. बाहर न निकलने की बाध्यता के साथ सबसे बड़ी बाधा गेहूं भरने के लिए बोरों की कमी के रूप में सामने आई. जूट के बोरे कोलकाता से मंगाए जाते हैं. ट्रेनों के संचालन के ठप होने से भीषण संकट खड़ा हो गया था.

खाद्य सुरक्षा के मुद्दों पर काम करने वाली अरुंधति धुरू ने उठाए सवाल

खाद्य सुरक्षा के मुद्दों पर आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति धुरू ने लक्ष्य के सापेक्ष हुई कम खरीद पर सवाल उठाए हैं. अरुंधति ने कहा कि सरकारें हर साल सरकारी मंडियों से जान-बूझकर अनाज की कम खरीददारी करती हैं. इसके पीछे मंशा यह रहती है कि प्राइवेट प्लेयर्स को अनाज सस्ते दर पर मिल सके. खरीद के प्रति उदासीन रहने के कारण किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दर पर प्राइवेट पार्टियों को अनाज बेचना पड़ता है. यह किसानों का सीधे-सीधे नुकसान है.

बता दें कि प्रदेश में 15 अप्रैल से गेहूं की सरकारी खरीद शुरू की गई थी. तब लॉकडाउन चल रहा था. किसानों को मंडी तक पहुंचने के लिए कागज़ी कार्यवाही भी करनी पड़ती थी. इस साल सरकार ने 1925 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूं की खरीद की है.
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